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Date of publication : 18/8/2016 9:22
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शिया मज़हब कब से वुजूद में आया? (3)

तिहासिक और हदीस से सम्बंधित प्रमाण इस बात के गवाह हैं कि रसूले इस्लाम स. के ज़माने में कुछ लोग शिया के नाम से पहचाने जाते थे, अगरचे इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान दो भागों में बटे हुए थे कुछ लोग सुन्नी और कुछ लोग शिया थे, बल्कि इससे मुराद यह है कि कुछ लोग हज़रत अली अ. से अपनी मोहब्बत का ऐलान करते थे और..............


विलायत पोर्टलः पिछले दो लेखों में हमने 3 दृष्टिकोण बयान किए अब हम यहां बयान करेंगे कि कौन सा नज़रिया सही है।

शिया मज़हब कब से वुजूद में आया? (1)

शिया मज़हब कब से वुजूद में आया? (2)


उल्लिखित तीनों दृष्टिकोणों के बीच तशय्यो के वुजूद में आने के बारे में तीसरा दृष्टिकोण सबसे सही है, हालांकि शहीद सद्र (र.ह) के दृष्टिकोण कि आपने केवल तशय्यो की उत्पत्ति को ही रसूले इस्लाम स. के ज़माने से सम्बंधित जाना है और शियों के नाम से सामने आने वाले लोगों के इतिहास को रसूले इस्लाम के ज़माने के बाद बताया है, स्वीकार करना मुश्किल है, क्यूँकि इतिहासिक और हदीस से सम्बंधित प्रमाण इस बात के गवाह हैं कि रसूले इस्लाम स. के ज़माने में कुछ लोग शिया के नाम से पहचाने जाते थे, अगरचे इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान दो भागों में बटे हुए थे कुछ लोग सुन्नी और कुछ लोग शिया थे, बल्कि इससे मुराद यह है कि कुछ लोग हज़रत अली अ. से अपनी मोहब्बत का ऐलान करते थे और आपके व्यवहार व चरित्र  को रसूले इस्लाम स. का व्यवहार व चरित्र मानते थे इसलिए आपको अपने लिए आदर्श मानते थे।
उस्ताद मुहम्मद कुर्द अले ने अपनी किताब ख़ुतातुश्शाम में इस बारे में यह कहा है: पैग़म्बर के ज़माने में ही कुछ बड़े सहाबा हज़रत अली (अ.) के दोस्तों के रूप में पहचाने जाते थे जैसे सलमान फ़ारसी जिनका बयान है कि :हमने इस बात पर पैग़म्बरे इस्लाम की बैअत की है कि हम मुसलमानों के शुभचिंतक रहेंगे और अली इब्ने अबी तालिब (अ.) का अनुसरण करेंगे और उनसे प्यार करेंगे या अबू सईद ख़दरी कहते थे कि लोगों को पाँच ज़िम्मेदारियों के अंजाम देने का आदेश दिया गया था जिसमें से उन्होंने ने चार को अंजाम दे दिया लेकिन एक को छोड़ दिया। जिन चार पर अमल किया है वह यह हैं: नमाज़, ज़कात, रमज़ान के महीने का रोज़ा और ख़ान-ए-काबा का हज और एक ज़िम्मेदारी जिसे उन्होंने छोड़ दिया है अली इब्ने अबी तालिब (अ.) की विलायत है इसी तरह जनाबे अबूज़र ग़फ़्फ़ारी, अम्मारे यासिर, हुज़ैफ़ा यमानी, ख़ुज़ैमा बिन साबित अंसारी, अबू अय्यूब अंसारी, ख़ालिद बिन सईद और क़ैस बिन साद भी इन्हीं लोगों में शामिल हैं। (ख़ुतातुश्शाम भाग 6 पृष्ठ 252-252, अल-इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबुल-अरबआ भाग 1 पृष्ठ 238)
अबू हातिम राज़ी अपनी किताब अज़-ज़ीनः में लिखते हैं कि शिया शब्द रसूले इस्लाम स. के ज़माने में चार सहाबा के लिए आम था जिनके नाम यह हैं: सलमान फ़ारसी, अबूज़र ग़फ़्फ़ारी, मिक़दाद बिन असवद और अम्मारे यासिर। (आयानुश्शिया भाग 1 पृष्ठ 18-19)
फिरकुश-शिया के लेख़क भी लिखते हैं: सलमान फ़ारसी, अबूज़र ग़फ़्फ़ारी, मिक़दाद बिन असवद और अम्मार बिन यासिर वह पहले लोग थे जिन्हें शिया कहा जाता था। (फिरकुश-शिया पृष्ठ 17-18)
सारांश यह हुआ कि शिया समुदाय और उसके इतिहास के बारे में निम्नलिखित बातों का पता चलता है:
 1.    तशय्यो अर्थात हज़रत अली (अ.) की बिला फ़स्ल और पैग़म्बरे इस्लाम की ओर से नियुक्त इमामत व ख़िलाफ़त पर विश्वास।
 2.    तशय्यो अर्थात हज़रत अली (अ.) से मोहब्बत को वाजिब मानना।
 3.    तशय्यो अर्थात हज़रत अली (अ.) को दूसरे समस्त सहाबा से सर्वश्रेष्ठ मानने का विश्वास।
 4.    रसूले अकरम (स.) के ज़माने में कुछ सहाबा अली के शिया (अ.) के नाम से प्रसिद्ध थे।
 5.    रसूले अकरम (स.) के देहांत के बाद आपके उत्तराधिकारी और मुसलमानों के इमाम व रहबर के बारे में रसूले इस्लाम के सहाबियों के बीच मतभेद पैदा हुआ और कुछ मुहाजेरीन व अंसार ने हज़रत अली (अ.) का समर्थन किया
जिसके नतीजा में शिया एक मज़हब के रूप में लोगों के सामने प्रकट हुआ।
    अंतिम तथ्य इतिहास की स्वीकृत और निश्चित वास्तविकताओं में से है इसलिए उसके लिए किसी इतिहासिक प्रमाणपत्र और किताब के हवाले की आवश्यकता नहीं है। चौथे तथ्य के प्रमाण इससे पहले वर्णन किए जा चुके हैं


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