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Date of publication : 20/8/2016 22:2
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पैग़म्बरे इस्लाम और अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली से मोहब्बत।

अहलेबैत (अ.) के प्यार और उनकी दोस्ती पर ज़ोर देने वाली आयतों व रिवायतों के अलावा पैग़म्बरे इस्लाम स. की बहुत सी ऐसी हदीसें मौजूद हैं जिनमें हज़रत अली (अ.) से प्यार को बाजिब बताया गया है यहाँ तक कि........................


विलायत पोर्टलः हमने शिया के पारिभाषिक अर्थ की व्याख्या के संदर्भ में बयान किया था कि शिया के एक अर्थ पैग़म्बरे इस्लाम के अहलेबैत अ. और ख़ास कर हज़रत अली से दोस्ती और उनसे मोहब्बत करना भी हैं।
अहलेबैत (अ.) के प्यार और उनकी दोस्ती पर ज़ोर देने वाली आयतों व रिवायतों के अलावा पैग़म्बरे इस्लाम स. की बहुत सी ऐसी हदीसें मौजूद हैं जिनमें हज़रत अली (अ.) से प्यार को बाजिब बताया गया है यहाँ तक कि आपकी मोहब्बत को ईमान का आधार और आपकी दुश्मनी को मुनाफ़ेक़त व कपटाचार की निशानी बताया गया है।
सिव्ती ने इस आयत (و لتعرفنّهم فى لحن القول तुम कपटाचारियों को उनकी बातचीत के तरीक़े से पहचान लेते हो, - सूरा-ए- मुहम्मद आयत 30) की व्याख्या के संदर्भ में इब्ने मुर्दवैह और इब्ने असाकिर के हवाले से अबू सईद ख़दरी से यह रिवायत की है कि उन्होंने कहा कि लहनुल क़ौल (لحن القول) से मुराद हज़रत अली (अ.) की दुश्मनी है।
दूसरी रिवायत में जिसे इब्ने मुर्दवैह ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद से नक़्ल किया है यूँ बयान हुआ है
ما كنّا نعرف المنافقين على عهد رسول اللّه صلى الله عليه و آله الا ببغضهم علي بن ابيطالب عليه السلام
रसूले अकरम (स.) के ज़माने में हम (मुनाफ़िक़ों) कपटाचारियों को केवल अली (अ.) से उनकी दुश्मनी के आधार पर ही पहचान लेते थे। (दुर्रुल मनसूर भाग 7 पृष्ठ 443)
नेसाई ने अपनी किताब ख़साएसे अमीरुल मोमिनीन में (الفرق بين المؤمن و المنافق) मोमिन अर्थात आस्तिक और मुनाफ़िक़ अर्थात कपटाचारी के शीर्षक के अंतर्गत एक अलग अध्याय में रसूले इस्लाम से तीन हदीसें नक़्ल की हैं कि हज़रत ने फ़रमाया है: अली अ. से  मोमिन के अलावा कोई प्यार नहीं करेगा और मुनाफ़िक़ के अलावा आपका कोई दुश्मन नहीं होगा। (ख़साएसे अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब पृष्ठ 155-157)
ख़तीबे ख़्वारज़मी ने भी अपनी किताब अल-मनाक़िब के छटे अध्याय में हज़रत अली (अ.) और अहलेबैत (अ.) से मोहब्बत के बारे में मौजूद रिवायतों को जमा किया है और इस बारे में लगभग तीस हदीसे बयान की हैं।
    उनमें से कुछ रिवायतें इस तरह हैं।
1.    अली इब्ने अबी तालिब (अ.) से मोहब्बत सभी लोगों पर वाजिब है।
انّي افترضت محبّة علىّ بن ابى طالب على خلقي عامّة
2.    अगर सारे इंसान अली इब्ने अबी तालिब (अ.) की मोहब्बत व प्यार पर सहमत हो जाते तो अल्लाह तआला जहन्नम को न बनाता।
لو اجتمع الناس علي حبّ على بن ابيطالب لما خلق اللّه النّار
3.    अगर कोई इंसान इतने दिनों तक इबादत करे जितने दिन जनाबे नूह अपनी क़ौम के बीच रहे थे और ओहद के पहाड़ के बराबर दीन के कामों में सोना दान दे, हज़ार बार पैदल हज करने जाए और सफ़ा व मरवः के बीच इबादत की हालत में क़त्ल भी कर दिया जाए लेकिन वह हज़रत अली (अ.) से प्यार न करता हो तो वह जन्नत की ख़ुशबू भी नहीं पहुँच सकती है और वह कदापि जन्नत में नहीं जाएगा।
4.    जो इंसान अली (अ.) से मोहब्बत करे उसने पैग़म्बरे इस्लाम स. से प्यार किया है और जो इंसान उनसे दुश्मनी रखे वह पैग़म्बरे इस्लाम स. का दुश्मन है।
من احبّ عليّا فقد احبّنى و من ابغض عليا فقد أبغضنى
5.    मलकुल मौत (यमराज) जिस तरह नबियों और पैग़म्बरों पर दया करते हैं इसी तरह हज़रत अली (अ.) के चाहने वालों पर भी रहम करते हैं (अर्थात उनकी रूह आराम से निकालते हैं)।
ان ملك الموت يترحّم على محبّي على بن ابيطالب كما يترحّم على الانبياء
6.    जो इंसान यह ख़्याल करे कि वह पैग़म्बरे इस्लाम स. और जो कुछ आप अल्लाह तआला की ओर से ले कर आए हैं उन सब पर ईमान रखता है लेकिन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.) का दुश्मन है तो वह  झूठा है और मोमिन नहीं है।
من زعم انه امن بي و بما جئت به و هو يبغض عليا عليه السلام فهو كاذب ليس بمؤمن
     शबलंजी शाफ़ेई ने निम्नलिखित दो हदीसों को सही मुस्लिम और तिरमिज़ी के हवाले से लिखा है।
1.    मुस्लिम ने रिवायत की है कि हज़रत अली (अ.) ने फ़रमाया हैः
कि मुझसे कोई मोहब्बत नहीं करेगा मगर यह कि वह मोमिन हो और मुझसे कोई दुश्मनी नहीं करेगा मगर यह कि वह मुनाफ़िक़ हो।
والذى فلق الحبّة و برأ النسمة انّه لعهد النبي الاميّ بأنّه لا يحبّني الاّ مؤمن و لا يبغضني الاّ منافق
2.    तिरमिज़ी ने अबू सईद ख़दरी से यह रिवायत नक़्ल की है उन्होंने कहा हैः
كنّا نعرف المنافقين ببغضهم عليّاً
हम मुनाफ़िक़ों को अली (अ.) की दुश्मनी के आधार पर पहचानते थे। (नूरुल-अबसार पृष्ठ 160)
हज़रत अली (अ.) की मोहब्बत के वाजिब होने के बारे में रसूले इस्लाम स. से प्रसारित हदीसें बहुत ज़्यादा हैं जिनको यहां बयान करना सम्भव नहीं है। इसलिए हम इन्हीं दो हदीसों पर संतोष कर रहे हैं।
उल्लिखित रिवायतों के आधार पर सच्चे मुसलमान हज़रत अली (अ.) की मोहब्बत को अपने ऊपर वाजिब समझते थे लेकिन जो लोग दुनिया के ग़ुलाम के और काम-वासना के पुजारी थे हालांकि वह दिखावे में अपने को मुसलमान कहते थे और मुसलमानों के बीच रहते थे मगर उनके दिल में हज़रत अली (अ.) के प्रति नफ़रत मौजूद थी जिसे वह कभी कभी प्रकट भी करते रहते थे इसी लिए हज़रत अली (अ.) से प्यार और दुश्मनी ईमान और मुनाफ़ेक़त व कपटाचार की पहचान बन गई।


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