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Date of publication : 26/8/2016 23:34
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क्या शिया मज़हब के वुजूद में आने का कारण ईरानी हैं?!!!

कुछ लेखकों ने शिया समुदाय को ईरानियों के विचारों की पैदावार बताया है यह दृष्टिकोण कुछ ओरियनटालिस्टों द्वारा सामने आया और उसे कुछ कट्टर व पक्षपाती अहले सुन्नत तथा कुछ राष्ट्रवादी ईरानी बुद्धिजीवियों का समर्थन भी हासिल है इसना अशरी शियों के अक़ीदे में, दूसरे मुद्दों की तरह इमामत का मुद्दा भी किताब, सुन्नत, इमामों की हदीसों और स्पष्ट बौद्धिक प्रमाणों से लिया गया है और अगर इंसाफ़ से काम लिया जाए तो यह कहना पड़ेगा कि तशय्यो ही मौलिक इस्लाम है। इस सूरत में यह कहना कि ईरानियों ने मुसलमानों से बदले व प्रतिशोध की खातिर शिया समुदाय को बनाया है, शिया समुदाय पर बहुत बड़ा आरोप और झूठ गढ़ना है.........................


विलायत पोर्टलः कुछ लेखकों ने शिया समुदाय को ईरानियों के विचारों की पैदावार बताया है यह दृष्टिकोण कुछ ओरियनटालिस्टों द्वारा सामने आया और उसे कुछ कट्टर व पक्षपाती अहले सुन्नत तथा कुछ राष्ट्रवादी ईरानी बुद्धिजीवियों का समर्थन भी हासिल है।
(ओरियनटालिस्टों में से कैंट गोबिनो, एडवार्ड ब्राउन और अहले सुन्नत उल्मा में से अहमद अमीन मिस्री अपनी किताब फ़जरूल इस्लाम में और ईरानी राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों में से डाक्टर परवेज़ सानेई क़वानीन और शख़्सियत नामक किताब के लेखक का नाम लिया जा सकता है। देखें ख़िदमाते मुतक़ाबिले इस्लाम व ईरान भाग 1 पृष्ठ 128-131।)।उन लोगों ने अपने काल्पनिक दृष्टिकोण के स्पष्टीकरण में जो बातें बयान की हैं वह कुछ इस तरह हैं:अ) इमामत के मुद्दे में उत्तरपत्र व विरासत का अख़ीदा जो शिया मज़हब का मौलिक अक़ीदा है, अरब वासियों के बीच नहीं पाया जाता था लेकिन ईरानियों के बीच प्रचलित था और ईरान की साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था का आधार यही कार्यप्रणाली थी।ब) ईरानियों के यहाँ शिया इमामों के प्रति ख़ास सम्मान के पीछे राष्ट्रीवादी भावना निहित है क्यूँकि इमाम हुसैन (अ.ह) की सादी तीसरे यज़्दगिर्द की बेटी के साथ हुआ था और शियों के इमाम उन्हीं के वंश से हैं इस तरह शिया इमामों का सम्बंध ईरान से जुड़ा है।स) इस्लामी सेना के हाथों ईरान के हार जाने के बाद अपमान के आभास ने ईरानियों के दिल में अरब मुसलमानों के प्रति द्वेष पैदा हो गया इसलिए वह उनसे बदले व प्रतिशोध की फ़िक्र में लगे रहे और अपने इस उद्देश्य को उन्होंने इमामत के बारे में शियों के विशेष मूल तत्वों को वुजूद में लाने से हिसिल कर लिया। शिया और सुन्नी मूल तत्वों के मतभेद का स्रोत यही इमामत का मुद्दा है।इस मनगढ़ंत परिकल्पना की समीक्षा के संदर्भ में कुछ बातों को यहाँ पेश किया जा रहा है:1.    इमामत में वसीअत का बयान पैग़म्बरे इस्लाम स. की हदीसों में मौजूद है। जैसा कि इससे पहले भी गुज़र चुका है और हज़रत अली (अ.ह) की हदीसों में भी यह उल्लेख मौजूद है। इस आधार पर यह अक़ीदा इस्लाम के मौलिक स्रोंतों से हासिल किया गया है और ईरान की साम्राज्यवादी व्यवस्था से इसका कोई सम्बंध नहीं है।(आयते इनज़ार के सम्बंध में हदीस यौमुद्दार, इतिहास व हदीसों की किताबों में प्रसिद्ध है।)2.    भौगोलिक दृष्टि से इस्लाम के शुरू में शियों के महत्वपूर्ण क्षेत्र, हिजाज़, इराक़ और यमन थे न कि ईरान। और हज़रत अली (अ.ह) के ज़माने में आपके अधिकतर शियों का सम्बंध अरब की ज़मीन से था जैसा कि जमल की जंग, सिफ़्फ़ीन और नहेरवान में आपके अधिकतर सैनिक अरब के ही रहने वाले थे।3.    इतिहासिक दस्तावेजों से यह मालूम होता है कि जब ईरानियों ने इस्लाम स्वीकार किया तो चूँकि उस समय सुन्नी मज़हब और राजनीति का वर्चस्व था इसलिए वह भी सुन्नी ही हो गए, उसके बाद उनके बीच धीरे धीरे शिया धर्म प्रचलित हुआ। जिसके विभिन्न कारण हैं। उसका एक कारण यह भी था कि इराक़ या हिजाज़ जैसे अरब क्षेत्रों से जो शिया ईरान पहुँचे थे वही लोग ईरान में शिया धर्म के प्रचार का कारण बने। इसलिए याक़ूत हमवी ने मोजमुल बलदान में लिखा है: इस शहर को हज्जाज इब्ने यूसुफ़ के ज़माने में तलहा इब्ने अहवस ने आबाद किया था, इससे पहले यह सात गाँव थे जो कमनदान के नाम से मशहूर थे, इसका विस्तार यह है कि अब्दुर-रहमान इब्ने मुहम्मद इब्ने अशअस इब्ने क़ैस जो हज्जाज की ओर से सीसतान का गवर्नर था उसने  हज्जाज के विरूद्ध विद्रोह कर दिया जब वह हज्जाज से पराजित होकर काबुल की ओर भाग गया तो साद बिन मालिक बिन आमिर अश्अरी के बेटे जो उसकी सेना में शामिल थे, वह क़ुम के क्षेत्र में आए और कमनदान नामक सात गाँवों पर उनका वर्चस्व हो गया, धीरे धीरे उनके चचेरे भाई भी उनके पास पहुँच गए, फिर उसका नाम कमनदान से बदलकर “क़ुम” हो गया, उन भाईयों में से एक अब्दुल्लाह बिन साद भी थे और वह इमामिया मज़हब के मानने वाले थे और उनकी संतान कूफ़ा में थी वह भी क़ुम स्थांनतिरित हो गए यही लोग क़ुम में शिया समुदाय के प्रसार का कारण बने।(बहसुन फ़िल मिलले वन्नहेल 6/145-146, आयानुश्शिया 1/26, अश-शिया वत्तशय्यो 64-71)मुहम्मद अबू ज़ोहरा ने इस बारे में यह कहा है किः ईरानियों ने अरब वासियों के हाथों शिया समुदाय को स्वीकार किया और वह शिया मज़हब के ईजाद करने वाले कदापि नहीं हैं बहुत सारे उल्माए इस्लाम जो शिया मज़हब के प्रचारक थे वह अमवी और अब्बासी ख़लीफ़ाओं के डर से फ़ार्स ख़ुरासान और इस्लामी राज्य के दूसरे क्षेत्रों में जाकर आबाद हो गए और इन्हीं के कारण शिया समुदाय को प्रचलित होने का अवसर मिला, बनी उमय्या के शासन के पतन से पहले इन क्षेत्रों में शियत प्रचारित हो चुकी थी।(अल-इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) वल मज़ाहेबुल अरबआ 545)4.  इस दृष्टिकोण के ग़लत होने की एक प्रमाण यह भी है कि शियों के बारह इमाम (अ.ह) सब के सब वंशानुसार अरब थे शियों के बहुत सारे उल्मा का सम्बंध अरब परिवारों से था जैसे आले आयुन, आले अतीयह, बनी दराह, शेख़ मुफ़ीद (र.ह), सय्यद मुर्तज़ा (र.ह, मुहक्क़िक हिल्ली (र.ह), अल्लामा हिल्ली (र.ह), इब्ने ताऊस (र.ह), इब्ने इदरीस(र.ह), फ़ाज़िल मिक़दाद (र.ह), शहीद अव्वल(र.ह), शहीद सानी (र.ह) आदि। जबकि सुन्नियों के चारों इमामों में से कोई एक भी अरब नहीं था बल्कि अरब वासियों के मवाली थे। इसी तरह सेहाहे सित्ता के लेखक और दूसरे बहुत से सुन्नी मुतकल्लेमीन, मुहद्देसीन (हदीसों के विशेषज्ञ) और दिग्गज फ़ुक़्हा भी अरब नहीं थे।(आयानुश्शिया 1/32, नश्अतुत्तशय्यो 47-97)5.  इस दृष्टिकोण के अनुसार होना यह चाहिए था कि ईरानी इमाम ज़ैनुल आबेदीन की माँ जनाबे शहरबानो का सम्मान दूसरे अइम्मा (अ.ह) की माँओं से अधिक करते जो ईरानी नहीं थीं जब कि ऐसा नहीं है बल्कि शायद इमामे ज़माना (अ.ह) की माँ जनाबे नरजिस ख़ातून का सम्मान उनसे भी अधिक होता है जब कि उनका सम्बंध रूम से है इसके अतिरिक्त इमाम हसन (अ.ह) और अमीरुल मोमिनीन (अ.ह) के बारे में यह दावा बिल्कुल निराधार है चूंकि इस दावे से केवल जनाब शहरबानो और इमाम हुसैन (अ.ह) के वंश से अइम्मा (अ.ह) का सम्मान साबित किया जा सकता है।अगर ईरानी केवल इस लिए अपने इमामों का सम्मान करते हैं कि सासानी परिवार से उनका सम्बंध है तो उन्हें बनी उमय्या के परिवार का भी इसी तरह सम्मान करना चाहिए था क्यूँकि वलीद बिन अब्दुल मलिक के ज़माने में क़तीबा बिन मुस्लिम की एक जंग में यज़्दगिर्द की एक नवासी ”शाह आफ़रीद” बंदी बना ली गई थी जिससे वलीद ने विवाह कर लिया था और उससे यज़ीद बिन वलीद पैदा हुआ था जो “यज़ीदे नाक़िस” के नाम से मशहूर है इस तरह यज़ीद बिन वलीद का वंश भी सासानी परिवार से मिलता है।सासानी परिवार से यज़ीद बिन वलीद का सम्बंध, इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.ह) के सम्बंध से कहीं अधिक मज़बूत है क्यूँकि कुछ इतिहासकारों ने शहरबानो बिन्ते यज़्दगिर्द से इमाम हुसैन (अ.ह) की शादी को रद्द किया है लेकिन किसी इतिहासकार ने वलीद बिन अब्दुल मलिक के विवाह के बारे में किसी तरह का शक नहीं किया है।(ख़दमाते मुतक़ाबिले इस्लाम व ईरान 1/141-143)6.  इसना अशरी शियों के अक़ीदे में, दूसरे मुद्दों की तरह इमामत का मुद्दा भी किताब, सुन्नत, इमामों की हदीसों और स्पष्ट बौद्धिक प्रमाणों से लिया गया है और अगर इंसाफ़ से  काम लिया जाए तो यह कहना पड़ेगा कि तशय्यो ही मौलिक इस्लाम है। इस सूरत में यह कहना कि ईरानियों ने मुसलमानों से बदले व प्रतिशोध की खातिर शिया समुदाय को बनाया है, शिया समुदाय पर बहुत बड़ा आरोप और झूठ गढ़ना है।7. इतिहासिक दस्तावेज गवाह हैं कि ईरानियों ने अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी के साथ इस्लाम स्वीकार किया था और इस में डर मजबूरी या दहशत का कोई दख़ल नहीं था ईरानियों के इस्लाम स्वीकार करने और इस्लामी सेना के सामने  झुकने का कारण यह था कि ईरानी एक ओर तो इस्लामी मूल तत्वों व शिक्षाओं की सच्चाई से प्रभावित हो रहे थे और दूसरी ओर वह सासानी बादशाहों के अत्याचार से उकता चुके थे या दूसरे शब्दों में एक ओर तो न्याय एंव निष्पक्षता व बराबरी पर आधारित इस्लामी क़ानून व नियम और दूसरी ओर सासानियों के वर्गीकरण और भेदभाव वाली व्यवस्था के अत्याचार की बुनियाद पर ईरानियों ने इस्लाम स्वीकार किया और इसी लिए उन्होंने ने इस्लामी सेना का मुक़ाबला भी नहीं किया अगर यह सूरत न होती तो ईरान को इतनी आसानी से जीतना सम्भव नहीं था और यह कि इस्लामी सेना के हाथों ईरान की पराजय के बाद भी ईरानी इस्लाम स्वीकार करने के बारे में आज़ाद थे और जिज़या दे कर ज़रतुश्ती धर्म पर बाक़ी रह सकते थे जिस तरह दूसरे समुदायों के मानने वाले इस्लामी शासन में इसी अंदाज़ से रहते थे इस्लाम स्वीकार करने के लिए  मजबूर नहीं थे, एडवार्ड ब्राउन ने इस बारे में लिखा है:इस्लाम ने ज़रतुश्ती धर्म पर किस तरह वर्चस्व हासिल किया इस बारे में अनुसंधान करना इससे कहीं कठिन है कि अरब वासियों ने सासानियों की ज़मीन पर किस तरह वर्चस्व प्राप्त किया था। सम्भव है कोई यह कल्पना करे कि इस्लामी मुजाहेदीन अपने जीते हुए देशों और राष्ट्रों को दो रास्तो मे से एक रास्ते के चयन पर मजबूर करते थे। एक क़ुरआन दूसरे तलवार लेकिन यह ख़्याल सही नहीं है क्यूँकि दहरिया, यहूदी और ईसाई अपने अपने धर्मों पर बाक़ी थे और केवल जिज़या  (टैक्स) देने पर मजबूर थे और यह तरीक़ा पूरी तरह से इंसाफ़ पर आधारित था क्यूँकि ख़िलाफ़त की ग़ैर मुस्लिम जनता जंगों में भाग लेने और ख़ुम्स व ज़कात देने से माफ़ थी जब कि पैग़म्बरे इस्लाम स. की उम्मत पर यह चीजें वाजिब हैं।(तारीख़े अदबियाते ईरान, 1/297,  ईरानियों के शिया होने के दूसरे कारणों और इस बारे में ग़लत दृष्टिकोणों पर की जाने वाली टिप्पणीयों को जानने के लिए पढ़ें :ख़दमाते मुतक़ाबिले इस्लाम व ईरान। 1/ 128-154)


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