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Code : 184294
Date of publication : 22/11/2016 18:35
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सऊदी अरब अपने कारनामोंं पर पर्दा डालने के लिए दूसरों पर आरोप लगा रहा है।

सऊदी अरब से जुड़े राजनीतिक हल्कों ने हालिया दिनों में ईरान विरोधी गतिविधियों का लक्ष्य क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान पर दबाव डालना है।
विलायत पोर्टलः सऊदी अरब से जुड़े राजनीतिक हल्कों ने हालिया दिनों में ईरान विरोधी गतिविधियों में वृद्धि कर दी है। इन गतिविधियों का लक्ष्य क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान पर दबाव डालना है। सऊदी अरब और उसके तथाकथित क्षेत्रीय घटक निराधार दावे करके ईरान को क्षेत्र के लिए एक चुनौती के रूप में पेश करने की कोशिश में हैं। अलबत्ता यह गतिविधियां जायोनी शासन और क्षेत्र से बाहर बड़ी शक्तियों की नीति के परिप्रेक्ष्य में हो रही हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में संयुक्त अरब इमारात और कई अरब देशों ने पिछले सप्ताह सऊदी अरब के दिशा-निर्देशन पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में ईरान के विरुद्ध एक पत्र पेश किया था जिसमें क्षेत्रीय देशों के आंतरिक मामलों में ईरान के हस्तक्षेप का दावा किया गया था। अलबत्ता ईरान विरोधी गतिविधियां इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी में भी, जो सऊदी अरब के कड़े प्रभाव में हैं, दिखाई देनी लगी हैं। इसी संबंध में फार्स खाड़ी की सहकारिता परिषद में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समिति के प्रमुख ने कहा है कि हम ओआईसी से ईरान की सदस्यता को समाप्त करने की कोशिश में हैं। तारिक़ आले शैख़ान ने दावा किया कि ईरान यमन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। साथ ही उन्होंने सभी इस्लामी देशों का आह्वान किया कि वे ईरान को सभी इस्लामी संगठनों से अलग-थलग करने की दिशा में कदम उठाएं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अरब देशों के आंतरिक मामलों में ईरान का हस्तक्षेप तनाव उत्पन्न होने और अस्थिरता का कारण बना है। साथ ही काहेरा में सऊदी अरब के दूतावास ने भी ईरान पर आरोप मढ़ते हुए दावा किया है कि इस्लामी रिपब्लिक ईरान क्षेत्र में शत्रुतापूर्ण शैलियों को जारी रखे हुए है। सऊदी अरब दो लक्ष्यों से ईरान विरोधी नीतियां अपनाये हुए है। उसका पहला लक्ष्य यह है कि वह यमन में अपने युद्ध और पाश्विक कार्यवाहियों को कानूनी दर्शाये। सऊदी अरब की कोशिश है कि वह यह बताये कि रियाज के अनुसार, ईरान का हस्तक्षेप क्षेत्र में अस्थिरता और तनाव की वजह है जबकि सऊदी अरब का दूसरा लक्ष्य फार्स खाड़ी के तटवर्ती देशों और ईरान के संबंधों में दराड़ उत्पन्न करना है। बहरहाल सऊदी अरब ने ईरान की इस्लामी रिवाल्यूशन की सफलता के बाद भी इराक़ के तानाशाह सद्दाम का समर्थन करके यही नीति अपनाई थी और आज भी वह ईरान विरोधी नीति अपनाये हुए है और वह ईरान को अरब देशों के लिए संयुक्त खतरा बताने की चेष्टा में है। ईरान के परमाणु समझौते के संबंध में भी सऊदी अरब ने जो नीति अपनाई थी उसे भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
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तेहरान रेडियो


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