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Date of publication : 17/1/2017 19:52
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इराक़ी बल ने आईएस के क़ब्ज़े से आज़ाद कराई हज़रत यूनुस पैग़म्बर की मज़ार।

इराक़ी सेना ने मूसिल में स्थित पैग़म्बर हज़रत यूनुस के मज़ार को आतंकवादी गुट आईएस के चंगुल से आज़ाद करा लिया है।

विलायत पोर्टलः
इराक़ी सेना ने मूसिल सिटी में अपनी प्रगति जारी रखते हुए इस शहर में हज़रत यूनुस के मज़ार को आतंकियों के कंट्रोल से आज़ाद करा लिया है। सेना ने वहां पर इराक़ का राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया है। इराक़ी सेना के आतंकवाद निरोधक दल के प्रवक्ता सबाह नोमान ने कहा कि हमने हज़रत यूनुस के मज़ार से आंतंकियों को खदेड़ दिया है और वहां पर इराक़ का राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया गया है। उन्होंने कहा कि इराक़ी सेना सोमवार को पूर्वी मूसिल के दो अन्य क्षेत्रों पर नियंत्रण प्राप्त करने में सफल रही। हज़रत यूनुस का मज़ार मूसिल में स्थित है जहां पूरी दुनिया से मुसलमान और ईसाई दर्शन के लिए जाते हैं। ज्ञात रहे कि वर्ष 2014 में आईएस के आतंकियों ने मूसिल के कुछ क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करने के कुछ ही सप्ताह बाद हज़रत यूनुस के मज़ार को नष्ट कर दिया था। आईएस की इस घृणित कार्यवाही पर पूरी दुनिया से कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।
हज़रत यूनुस का संक्षिप्त परिचय
हज़रत यूनुस ईश्वरीय दूत अर्थात नबी थे जिनका क़ुरआने मजीद में उल्लेख है। हज़रत यूनुस हज़ारों साल पहले इराक़ के नैनवा में रहते थे। उन्होंने वर्षों तक लोगों को एक ईश्वर की ओर बुलाया लेकिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी। जिससे तंग आकर उन्होंने अपने समाज वालों को ईश्वरीय दंड की खबर दी और कहा कि तुम सब का विनाश होगा और तुम सब ईश्वर के प्रकोप का शिकार होकर खत्म हो जाओगे यह कह कर वह वहां से निकल गये। हज़रत यूनुस अभी नैनवा क्षेत्र से बाहर भी नहीं निकले थे कि उस नगर पर ईश्वरीय प्रकोप के चिन्ह प्रकट हो गये, चारों ओर अंधेरा छा गया और वहां के लोग डर गए और उन्हें यक़ीन हो गया कि हज़रत यूनुस जो कुछ कहते थे वह सब सच था और अब उनका भी वही हाल होने वाला है जो इस से पहले की जातियों का हुआ था और जिनकी कहानियां उन्होंने सुनी थी। उनकी समझ में आ गया कि उन्हें यूनुस के ईश्वर की पनाह में जाना चाहिए और उससे माफी मांगनी चाहिए तभी वह इस प्रकोप से बच सकते हैं । वह सब एक बड़े से मैदान में इकट्ठा हुए और माओं से उनके बच्चे और जानवरों से भी उनके बच्चे अलग कर लिये और दोनों को एक दूसरे से दूर रखा। पूरे मैदान में रोने और चीखने की आवाज़े गूंजने लगीं , सारे लोग रो रोक कर गिड़गिड़ाकर माफी मांगने लगे और ईश्वर ने उन्हें माफ कर दिया। वह सब अपने अपने घरों को लोट गये और हज़रत यूनुस को तलाश करने लगे उधर जब हज़रत यूनुस को पता चला कि उन लोगों पर प्रकोप नहीं आया और सब के सब आराम से हैं तो शर्म के मारे वह बस्ती में वापस लौटे ही नहीं और एक पानी के जहाज़ पर सवार होकर वहां से दूर जाने लगे। पानी का जहाज़ तूफान में घिर गया और डूबने लगा, सब ने फैसला किया कि जहाज़ का बोझ कम किया जाए, सामान फेंकने के बाद लोगों की बारी आयी और इसके लिए तैय यह किया गया कि पर्ची डाली जाए और जिसका नाम निकले वह पानी में कूद जाए, पर्ची डाली गई तो हज़रत युनुस का नाम निकला, जहाज़ वालों ने कहा नहीं, यह तो बड़े सम्मानी व्यक्ति मालूम होते हैं और बूढ़े भी हैं, फिर से पर्ची डाली जाए, फिर डाली गई पर्ची और फिर उन्हीं का नाम निकला इस तरह से तीन बार किया गया और हर बार उन्हीं का नाम निकला। यह देख कर हज़रत यूनुस समझ गए कि इसमें कोई राज़ है और यही ईश्वर की इच्छा है। वह समझ गए कि उनकी गलती है, और वह ईश्वर की अनुमति के बिना उस बस्ती से चले आये। यह समझते ही उन्होंने समुद्र में छलांग लगा दी और उनके छलांग लगाते ही एक मछली ने उन्हें निगल लिया। मछली के पेट में हज़रत यूनुस ने ईश्वर से अपनी इस गलती से लिए क्षमा मांगी । उनकी उस समय की दुआ कुरआने मजीद में लिखी है। ईश्वर ने उनकी तौबा कूबूल की और मछली ने तट पर लाकर उन्हें उगल दिया। मछली के पेट में रहने की वजह से वह बहुत कमज़ोर हो चुके थे। कुछ दिन तट पर ही रहे और फिर ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वह फिर से अपनी उसी बस्ती में जाएं।
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तेहरान रेडियो


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