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Date of publication : 7/4/2017 10:29
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इमाम मोहम्मद तक़ी अ. का क़ुरआन की ग़लत तफ़सीर करने वालों से मुक़ाबला।

इमाम मोहम्मद तक़ी अ. ने अपनी ज़िंदगी में दीन की राह में जो अहेम काम अंजाम दिए हैं उनमें से एक अल्लाह की पाक किताब क़ुरआन करीम की ग़लत और तर्कहीन तफ़सीर (व्याख्या) करने वालों का विरोध और फ़िर उसकी सही तफ़सीर बयान करना था

विलायत पोर्टलः इमाम मोहम्मद तक़ी अ. ने अपनी ज़िंदगी में दीन की राह में जो अहेम काम अंजाम दिए हैं उनमें से एक अल्लाह की पाक किताब क़ुरआन करीम की ग़लत और तर्कहीन तफ़सीर (व्याख्या) करने वालों का विरोध और फ़िर उसकी सही तफ़सीर बयान करना था।
एक दिन मोतसिम की सभा में कुछ विद्वानों ने क़ुर्आन की एक आयत की रौशनी में शरीयत के एक हुक्म को बयान किया, इमाम मोहम्मद तक़ी अ. वहीं मौजूद थे आ ने उसी समय उन लोगों को उनकी ग़लती बताते हुए उस आयत की सही व्याख्या की और लोगों तक सही हुक्म को पहुँचाया, मोहम्मद इब्ने मसऊद समरक़ंदी ने उस सभा को पूरे विस्तार से इस तरह लिखा है कि, मोतसिम अब्बासी की हुकूमत में उसके कुछ लोगों ने चोर को पकड़ा और हुकूमत से उसको किस तरह की सज़ा देनी है इसके बारे में सवाल पूछा, मोतसिम ने इस संवेदनशील घटना के लिए सलाहकारों की मीटिंग बुलाई और उस समय के कुछ मशहूर विद्वानों को बुला कर उस को सज़ा देने के लिए शरीयत का हुक्म पूछा, उन सभी ने यह कहा कि क़ुर्आन इस बारे में सबसे अच्छी सलाह और हुक्म को बताएगा, और फिर क़ुर्आन की इस आयत को पढ़ा गया, अल्लाह और उसके रसूल से जंग करने वालों और जो इस ज़मीन पर फ़ितना और फ़साद को बढ़ावा देते हैं उनकी सज़ा यह है कि उनको मौत की सज़ा या सूली पर लटका दिया दिया जाए या उनके दाहिने हाथ और बायें पैर या बायें पैर और दाहिने हाथ को काट दिया जाए या उन्हें देश से निर्वासित कर दिया जाए। (सूरए माइदह, आयत 33)
उन लोगों ने मोतसिम के इन्ही सज़ा में से किसी एक को अपनाने को कहा, मोतसिम ने उसी सभा में मौजूद इमाम मोहम्मद तक़ी अ. से अपना मशविरा देने को कहा, इमाम ने पहले तो मना किया लेकिन उसके आग्रह पर कहा, इन लोगों ने अल्लाह की किताब क़ुर्आन के हुक्म को ग़लत समझा और उसके मतलब को ग़लत तरह से बयान किया, इस आयत से अल्लाह के हुक्म को समझने के लिए अधिक समझ की ज़रूरत है, और यह भी ज़रूरी है कि उसके सारे पहलुओं को भी देखा जाए, इसलिए कि जुर्म और गुनाह जितना बड़ा होगा उसकी सज़ा भी उतनी ही बड़ी होगी, और इस मामले के भी अनेक पहलू हैं और हर पहलू का अलग हुक्म है,
1.    अगर इन लोगों ने केवल रास्ते को असुरक्षित किया है, न किसी का क़त्ल किया और न किसी प्रकार की लूटपाट की तो इन लोगों की सज़ा केवल जेल भेजना है, और क़ुर्आन की आयत में जिलावतन करने का यही मतलब है।
2.    अगर रास्ते को असुरक्षित करने के साथ किसी बे गुनाह को क़त्ल भी किया लेकिन लूटपाट नहीं की ऐसे लोगों के लिए मौत कि सज़ा है।
3.    अगर रास्ते को असुरक्षित किया, बे गुनाह का क़त्ल भी किया, और लूटपाट भी की, ऐसे लोगों को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, यानी पहले उनके हाथ पैर (जिस प्रकार ऊपर आयत में बयान हुआ है) काटने चाहिए और फिर सूली पर चढ़ा देना चाहिए।
मोतसिम को इमाम अली नक़ी अ. के द्वारा क़ुर्आन की इस आयत की तफ़सीर पसंद आयी और उसने अपने सिपाहियों से इमाम द्वारा बयान किए गए हुक्म के अनुसार अमल करने को कहा।
(तफ़सीरे अय्याशी, जिल्द     1, पेज 315)


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