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Code : 186550
Date of publication : 8/4/2017 16:51
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इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. का याहया इब्ने अक्सम से मुनाज़ेरा ।

तुम इस ख़ानदान के बारे में कुछ नहीं जानते, इनके घराने के बच्चे भी ज्ञान का समुद्र होते हैं अगर मेरी बात पर भरोसा नहीं तो इनकी परिक्षा ले लो, और जिस विद्वान को चाहो इनसे मुनाज़ेरे के लिए बुला लो, ताकि मेरी बात पर भरोसा कर सको।


विलायत पोर्टल : अब्बासी ख़लीफ़ा मामून ने इमाम रज़ा अ.स. की शहादत के फ़ौरन बाद तूस से बग़दाद आकर इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को एक ख़त लिख कर बग़दाद आने की दावत दी, यह अलग बात है कि यह दावत भी इमाम रज़ा अ.स. ही की तरह थी, मतलब दिखाने के लिए दावत थी लेकिन हक़ीक़त में ज़बरदस्ती बुलाया गया था। मामून ने इमाम अ.स. के बग़दाद आने के कुछ दिनों बाद महल से बुलावा भेजा, और वहाँ इमाम के सामने अपनी बेटी उम्मुल-फ़ज़्ल से शादी की पेशकश की। इमाम उसकी पेशकश सुनकर चुप रहे, मामून ने इस खामोशी को इमाम की सहमति समझते हुए शादी की तैयारी शुरू कर दी। उस ने इस अवसर पर एक जश्न का आयोजन किया, लेकिन बनी अब्बास ने विरोध करते हुए मामून से कहा यह क्या कर रहे हो? अभी अभी अली इब्ने मूसा (इमाम रज़ा अ.) का इन्तेक़ाल हुआ तथा ख़िलाफ़त अब्बासियों को वापिस मिली है और तुम फ़िर इसे आले अली अ.स. की तरफ पलटाना चाहते हो? क्या इन से हमारी वर्षों पुरानी दुश्मनी भूल गए? हम यह नहीं होने देंगे । मामून ने पूछा तुम क्या चाहते हो? उन्होंने कहा यह अभी बच्चा है, इसके पास इल्म और ज्ञान तक नहीं है। मामून ने जवाब दिया, तुम इस ख़ानदान के बारे में कुछ नहीं जानते, इनके घराने के बच्चे भी ज्ञान का समुद्र होते हैं अगर मेरी बात पर भरोसा नहीं तो इनकी परिक्षा ले लो, और जिस विद्वान को चाहो इनसे मुनाज़ेरे के लिए बुला लो, ताकि मेरी बात पर भरोसा कर सको। बनी अब्बास ने उस काल के विख्यात विद्वान याहया इब्ने अक्सम को इमाम से मुनाज़ेरे के लिए बुलाया, मामून ने इमाम के इल्म और ज्ञान को परखने के लिए अपने दरबार में मुनाज़ेरा रखा, याहया इब्ने अक्सम ने मामून की ओर देखते हुए प्रश्न करने की अनुमति माँगी। मामून ने कहा कि इमाम मोहम्मद तक़ी से अनुमति माँगो, याहया ने इमाम से अनुमति माँगी, इमाम ने फ़रमाया, जो कुछ भी पूछना चाहता है पूछ ले। याहया ने पूछा, वह इंसान जिस ने एहराम (हज के समय पहना जाने वाला ख़ास कपड़ा) पहना हुआ है वह अगर शिकार कर ले तो इसके बारे में अल्लाह का क्या हुक्म है? (याद रहे कि एहराम चाहे उमरा का हो या हज का, किसी भी जानवर या परिंदे का शिकार हराम है, और हज के अहकाम भी बहुत कठिन हैं यही कारण है कि याहया इब्ने अकसम ने हज के बारे में यह सोचते हुए प्रश्न पूछा कि इमाम को इसका जवाब नहीं मालूम होगा) इमाम मोहम्मद तक़ी ने फ़रमाया, पहले यह बता कि उस इंसान ने वह शिकार हरम के अंदर किया है या हरम से बाहर? वह इस बात को जानता था या नहीं कि शिकार करना हराम है? जान बूझ कर शिकार किया यह भूल कर? शिकार करने वाला किसी का ग़ुलाम था या आज़ाद? बालिग़ था या नाबालिग़? पहली बार शिकार किया या इस से पहले भी कर चुका था? चिड़िया का शिकार किया या किसी जानवर का? किसी छोटे जानवर का शिकार किया या बड़े का ? फिर से शिकार करने की इच्छा रखता है या अपने इस काम पर शर्मिंदा है? दिन में शिकार किया या रात में? हज के लिए पहने गए एहराम में शिकार किया या उमरा के एहराम मे? याहया इब्ने अकसम एक प्रश्न की इतनी शाखाओं को देख कर आश्चर्यचकित रह गया, उसके चेहरे पर असमर्थता के लक्ष्ण झलकने लगे उसकी हकलाहट से सभी दरबार वाले उसकी असमर्थता को भांप गए। मामून ने कहा इस नेमत पर अल्लाह का बहुत-बहुत शुक्र है जैसा मैंने सोंचा था वैसा ही हुआ। मामून ने अपने परिवार वालों की ओर देखते हुए कहा, क्या अब भी तुम लोगों को कोई शक है ?.....(अल-इरशाद, शेख़ मुफ़ीद, पेज 319-321, इसबातु-ल-वसिय्यत, मसऊदी, पेज 216) मुनाज़ेरे के बाद मामून के क़रीबी लोगों के अलावा सभी लोग वहाँ से चले गए, मामून ने इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. से कहा, मै आप पर क़ुर्बान, क्या मुमकिन है कि आप इन सभी शाखाओं के अलग अलग हुक्म को बयान कर दें? इमाम ने फ़रमाया, अगर एहराम पहने हुए इंसान ने हरम की सरहद से बाहर किसी बड़े परिंदे का शिकार किया है तो उसका कफ़्फ़ारा एक भेड़ की क़ुर्बानी है, और अगर हरम की सरहद के अंदर शिकार किया तो यही कफ़्फ़ारा दो गुना हो जाएगा। अगर परिंदे के बच्चे का शिकार हरम की सरहद के बाहर किया तो कफ़्फ़ारा बकरी का दो साल का बच्चा है, लेकिन अगर यही काम हरम की सरहद में किया है तो बकरी का दो साल का बच्चा और उस शिकार की क़ीमत दोनों कफ़्फ़ारे में देगा, अगर शिकार किसी जंगली जानवर जैसे ज़ेबरा का किया है तो कफ़्फ़ारे मे एक गाय है, अगर शिकार शुतुरमुर्ग़ है तो एक ऊँट की क़ुर्बानी करेगा । अगर शिकार हिरन का हो तो उसका कफ़्फ़ारा एक भेड़ है, इन में से कोई भी शिकार अगर हरम की सरहद के अंदर किया हो तो उसका कफ़्फ़ारा दो गुना हो जाएगा। (अल-इरशाद, शेख़ मुफ़ीद, पेज 322, इसबातु-ल-वसिय्यत, मसऊदी, पेज 217)


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