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Date of publication : 1/6/2017 18:16
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कैसे यक़ीन हो कि रमज़ान में की गई दुआओं से हमारे गुनाह माफ़ हो गए?

ख़ुदाया तू ही वह है जिसने अपनी रहमत और मग़फ़ेरत के दरवाज़ों को अपने बंदों के लिए खोल दिया है और उसका नाम तौबा रखा है और फ़रमाया है, अल्लाह की ओर वापिस पलट आओ, और सच्चे दिल से तौबा करो.

विलायत पोर्टल : 
अल्लाह ने क़ुर्आन में फ़रमाया, जिस ने तौबा की और नेक आमाल अंजाम दिए अल्लाह उसके गुनाहों को नेकियों में बदल देगा, अल्लाह हमेशा माफ़ करने वाला और मेहेरबान है। (सूरए फ़ुरक़ान, आयत 70) अल्लामा तबातबाई इस आयत के बारे में लिखते हैं, अगर किसी से कोई गुनाह हो गया, लेकिन वह अगर यह तीन काम कर ले तो न केवल क़यामत में वह अल्लाह के अज़ाब से बच जाएगा बल्कि उसके गुनाह नेकियों में बदल जाएंगे, वह काम यह हैं
1. तौबा,
2. नेक अमल,
3. ईमान।
तौबा का मतलब यह है कि इंसान अपने गुनाह पर शर्मिंदा हो कर सच्चे दिल से अल्लाह की बारगाह में लौट आए, और फिर नेक अमल के द्वारा तौबा को बाक़ी रखें, यही कारण है कि अल्लामा तबा तबाई फ़रमाते हैं कि नेक अमल के साथ की जाने वाली तौबा तौबए नसूह (अल्लाह की पसंदीदा तौबा) कहलाती है, इमाम सादिक़ अ.स. तौबए नसूह वाली आयत (सूरए तहरीम, आयत 8) की इस प्रकार विश्लेषण करते हैं तौबए नसूह का मतलब यह है कि इंसान तौबा करने के बाद फिर गुनाह की ओर न जाए। (मीज़ानुल-हिकमह, जिल्द 1, पेज 552) इस तौबा के बाद इंसान गुनाह की ओर नहीं जाता, और जब इस विशेष तौबा को इंसान अंजाम दे लेता है फिर नेक अमल अंजाम करने के लिए कठिनाई नहीं होती। और ऐसी ही तौबा जो नेक अमल के साथ हो इंसान की बुराईयों को भी अच्छाईयों में बदल देती है, इसीलिए अगर कोई अपने पिछले गुनाहों को माफ़ करवा कर उन्हें नेकियों की शक्ल में देखना चाहता है उसको अपने पिछले गुनाहों पर शर्मिंदा हो कर नेक अमल की ओर ध्यान देना होगा। आख़ेरत में कामयाबी की उम्मीद, हक़ के रास्ते पर बाक़ी रहने और पिछली ग़लतियों के सुधारने में तौबा का अहम भूमिका है, जीवन में अधिकतर ऐसा होता है कि इंसान ग़लती और गुनाह कर बैठता हैं, अगर तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए तो वह मायूस हो जाएगा और हमेशा के लिए रास्ता भटक जाएगा। यही कारण है कि इस्लामी शिष्टाचार के अनुसार तौबा इंसान की तरबियत के लिए बहुत महत्व रखती है, इसी लिए यह दीन सभी गुनहगारों से पिछली ग़लतियों को सुधार कर तौबा करते हुए नेक अमल करने का हुक्म देता है। इमाम सज्जाद अ.स. ताएबीन नामी मुनाजात में अल्लाह की बारगाह में इस प्रकार गिड़गिड़ा कर दुआ करते हैं, ख़ुदाया तू ही वह है जिसने अपनी रहमत और मग़फ़ेरत के दरवाज़ों को अपने बंदों के लिए खोल दिया है और उसका नाम तौबा रखा है और फ़रमाया है, अल्लाह की ओर वापिस पलट आओ, और सच्चे दिल से तौबा करो.....
अब इस के बाद भी कोई तौबा से ग़ाफ़िल हो तो उसके लिए कोई बहाना नहीं बचता। हदीसों में तौबा के बारे में बहुत ताकीद की गई है जिसे इस हदीस से समझा जा सकता है, इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं, अल्लाह अपने बंदे की तौबा से उस इंसान से भी अधिक ख़ुश होता है जिसका अंधेरे जंगल में खोया हुआ सामान मिल जाए, या फ़रमाया, जो इंसान सच्चे दिल से तौबा कर ले वह इस प्रकार है जैसे उसने गुनाह ही न किया हो, और जो बार बार तौबा कर के गुनाह करता रहे उसने तौबा का मज़ाक़ उड़ाया। (तफ़सीरे नमूना, जिल्द 24, पेज 295) हक़ीक़त में तौबा गुनाहों पर इस प्रकार शर्मिंदा होना है कि फिर उस गुनाह का इरादा न करें, अगर गुनाह माफ़ी के क़ाबिल हैं तो जल्द से जल्द इस्तेग़फार कर लेना चाहिए, और इस प्रकार तौबा के चार हिस्से बनते हैं,
1. शर्मिंदगी,
2. फिर से गुनाह न करने का इरादा,
3. गुनाहों की पूर्ति करना,
4. तौबा और इस्तेग़फ़ार करना।
इस प्रकार तौबा केवल इस्तेग़फ़ार, या पिछले कामों पर शर्मिंदा होता, या गुनाह न करने का इरादा नहीं है बल्कि हमारे गुनाह के कारण अगर किसी का नुक़सान हुआ है उसकी पूर्ति भी ज़रूरी है, यह उचित नहीं है कि सबके सामने किसी पर झूठा इल्ज़ाम लगा कर अकेले में तौबा कर लें, बल्कि उस इंसान से माफ़ी माँगनी पड़ेगी जिस पर झूठा इल्ज़ाम लगाया है, या इसी प्रकार वह नमाज़, रोज़े और दूसरी इबादतें जो तौबा से पहले छोड़ी हैं तौबा के बाद उनको जितना हो सके पूरी लगन के साथ अंजाम देना पड़ेगा। कुछ रास्ते हैं जिनसे इंसान कुछ हद तक समझ सकता है कि उसकी तौबा क़ुबूल हुई या नहीं...... 1. दुआ और तौबा के बाद एक ख़ास प्रकार की ख़ुशी का एहसास करना, या यूँ कहा जाए, गुनाहों की गंदगी से पाक होने का एहसास करना।
2. जितना इंसान अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हो कर गिड़गिड़ाएगा उतनी ही जल्दी उसकी तौबा क़ुबूल होगी, यानी इस्तेग़फ़ार और तौबा के समय जितनी अधिक इंसान की रूह और आत्मा प्रभावित होगी उतनी ही तौबा के क़ुबूल होने की संभावना बढ़ जाएगी।
3. अल्लाह के वादों पर जितना अधिक भरोसा होगा उतना ही उसकी इनायत और मेहेरबानी बढ़ेगी, इसी लिए उस पर भरोसे को बढ़ाया जाए ताकि उसकी रहमत और मग़फ़ेरत की उम्मीद और मज़बूत हो जिस से पूरे मन से तौबा की जाए।
4. तौबा के बाद गुनाह का इरादा न आता हो और हर पल केवल अल्लाह की मर्ज़ी के अनुसार ही क़दम उठे। इमाम ख़ुमैनी फ़रमाते हैं, रमज़ान के बाद जितना अपने अंदर बदलाव का एहसास हो समझ लो उतना ही अल्लाह की मेहमानी से लाभ उठाया है, और अगर थोड़ा भी बदलाव का एहसास नहीं हुआ तो रमज़ान से कुछ भी लाभ नहीं उठाया। (इस बारे में और अधिक पढ़ने के लिए जामेउस-सादात, मुल्ला अहमद नराक़ी, और तरजुमतुल-अख़लाक़, मरहूम शुब्बर की किताबों में देखें)


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