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Date of publication : 6/6/2017 17:1
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वाजिब और हराम रोज़े।

यौमुश-शक (वह दिन जिस में वह नहीं जानता कि शाबान का आख़िरी दिन है या रमज़ान का पहला


विलायत पोर्टल :
वह रोज़े जिनका रखना हम पर वाजिब हैं वह इस प्रकार हैं।
 1. रमज़ान के महीने के रोज़े ।
2. कफ़्फ़ारे के रोज़े ।
3. क़ज़ा रोज़ेम।
4. वह रोज़े जो नज़्र, अहद और क़सम के कारण वाजिब होते हैं ।
5. वह रोज़े जो इजारे (जिसमें इंसान किसी मरने वाले की तरफ़ से उसके वारिसों से पैसे लेकर रोज़ा रखता है) के कारण वाजिब होते हैं ।
6. एतेकाफ़ में बैठने वाले पर तीसरे दिन के रोज़ा।
7. हज में क़ुर्बानी के बदले रखे जाने वाले रोज़े।
वह रोज़े जिनका रखना हराम है इस प्रकार हैं।
1. ईदु-ल-फ़ितर के दिन रखा जाने वाला रोज़ा.
2. ईदे क़ुर्बान के दिन रखा जाने वाला रोज़ा.
3. अय्यामे तशरीक़ (ज़िल्हिज महीने की 11, 12, 13 तारीख़) में जो शख़्स मिना (मक्के में एक स्थान जहाँ हज के कुछ आमाल अंजाम दिए जाते हैं) में है उसके लिए रोज़ा रखना हराम है।
4. यौमुश-शक (वह दिन जिस में वह नहीं जानता कि शाबान का आख़िरी दिन है या रमज़ान का पहला) में रमज़ान कि नियत से रोज़ा रखना
5. ख़ामोशी का रोज़ा.
6. रोज़ा इफ़्तार न कर के रोज़े की नियत से कुछ न खा पी कर रोज़ा रख ले.
7. शौहर के मना करने के बाद भी बीवी का मुसतहब रोज़ा रखना.
8. बच्चों का रोज़ा रखना जिस से वालेदैन को तकलीफ़ पहुँचे.
9. बीमार इंसान जिस के लिए रोज़ा रखना हानिकारक हो.
10. मुसाफ़िर का उन जगहों के अलावा जहाँ अनुमति दी गई है रोज़ा रखना.


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