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Code : 187743
Date of publication : 7/6/2017 15:16
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आले सऊद के काले करतूत ।

ऐसे दरिंदों को मुसलमान तो दूर हम मुसलमान लोग इंसान भी मानने को तैय्यार नहीं।


विलायत पोर्टल :
  जिधर देखें उधर कुछ मुसलमान अपने ख़ून में नहाये दिखाई देते हैं, चाहे वह यमन, बहरैन हो या फिर सीरिया, लीबिया या मिस्र, इराक़ या फिर पाकिस्तान, जहाँ देखें उधर कुछ गिरती लाशें, कुछ बिलकते बच्चे और कुछ सिसकती मांएं, कुछ उजड़ी गोदें, कुछ सूनी मांगें, कुछ तबाह घर। जिन पर अत्याचार हो रहा है वह भी मुसलमान,और जो यह सब घिनौना खेल खेल रहा है वह भी बेशर्मी से ख़ुद को मुसलमान कह रहा है। सब से दुखी कर देने वाली बात यह है कि जहाँ भी इस प्रकार के घोर अत्याचार हो रहे हैं सब जगह कुछ ही ऐसे लोग हैं जो हर क्रूरता बर्बरता में लिप्त दिख रहे हैं, हम सब के लिए यह सोंचने की बात है कि अपने आप को सारे मुसलमानों का ठेकेदार कहने वाले दुष्ट पापी किस मुँह से अपने को मुसलमान कह रहे हैं..... किस अल्लाह, किस इस्लाम, किस क़ुर्आन और किस नबी या किस पीर ने ऐसा कहा है कि जो तुम्हारे सलीक़े से जीवन न बिताए उससे जीने का अधिकार छीन लिया जाए? यह हक़ तुम को किस ने दिया कि तुम किसी दूसरे के घर में जा कर ताँक झाँक करो ? बेशर्मी की हद तो देखिए कि अल्लाह की इबादत के लिए जिस के घुटने काम नहीं कर रहे वह पूरी रात हाथ में तलवार ले कर लाखों मुसलमानों के खून से होली खेलने वाले के साथ डिस्को करता रहा, और काबे की सेवा के नाम पर मुसलमानों से लूटी गई कमाई को इस तरह बर्बाद कर सकता है जिस के पास न ही दीन के नाम पर कुछ हो और न ही ग़ैरत के नाम पर...... कमाल की बात यह है कि अंत में हासिल भी कुछ नहीं हुआ, अपने जिस आक़ा की खुशी के लिए पूरी दुनिया के मुसलमानों की मेहनत से जुटाई हुई गाढ़ी कमाई को तबाह किया वह ख़ुश भी नहीं हुआ। कौन नहीं जानता कि कुछ देशों के मुसलमान कैसी कैसी परिस्तिथियों से गुज़रते हुए पूरे जीवन में एक बार अल्लाह के घर पर हाज़िरी देने आ पाते हैं, लेकिन यह ख़ुद को काबे का सेवक कहने वाले हर साल हज को इतना महंगा कर चुके होते हैं कि बेचारा मुसलमान हज का इरादा करे तो कैसे? अपने आक़ा को ख़ुश करने के लिए अपने मुसलमान भाइयों के ही ख़ून को किस प्रकार बहा रहे हैं, कौन यमन की हालत को नहीं जानता, क्या क्या अत्याचार नहीं किए इन लोगों ने, हद तो यह हो गई जो घायल हुए न उन्हें दवा देते न उन तक दवा पहुँचने देते और जंग के कारण भूखे लोगों को न ख़ुद कुछ खाने को देते और न ही खाना उन तक पहुँचने देते...... ऐसे दरिंदों को मुसलमान तो दूर हम मुसलमान लोग इंसान भी मानने को तैय्यार नहीं। किसने इन्हें यह हक़ दिया कि दूसरों के घर में जा कर उनके जीवन को जहन्नुम बना दें, बहरैन में किराए के टट्टू के द्वारा किस प्रकार आम जनता और उनके धार्मिक गुरू आयतुल्लाह ईसा क़ासिम पर अत्याचार कर रहे हैं.... इस्लाम और क़ुर्आन की शिक्षा के अनुसार घर से बेघर कर देने का अधिकार किसी को नहीं दिया गया, हाँ, ज़रूरतमंदों को पनाह देने के लिए ज़रूर कहा गया, लेकिन इन धर्म और इंसानियत के दुश्मनों ने हमेशा आतंकवाद को पनाह देने को अपना धर्म माना, कभी तालिबान तो कभी अल-नुसरा, कभी अलक़ाएदा तो कभी सिपाहे सहाबा, कभी जैशे मोहम्मद तो कभी एहरारुश-शाम और अब दाइश, इन सब की फ़ंडिंग का सिवाए इनके कोई ठिकाना नहीं। कभी किसी मज़लूम का समर्थन किया हो तो बताएं या कभी किसी नेक काम में कोई योगदान दिया हो, हाँ, अगर कहीँ हमला या धमाका या फायरिंग हो फिर ज़रूर कहीं न कहीं से इनसे तार जुड़े दिखाई देंगे। मुसलमानों के हमेशा से दुश्मन रहे इस्राईल का मुसलमानों के पहले क़िबले यानी बैतुल-मुक़द्दस पर क़ब्ज़े को पचास साल होने को है कोई बता दे कि ख़ुद को काबे का सेवक और मुसलमानों के ख़ादिम कहने वाले इन सऊदी अय्याशों ने कभी इस्राईल की निंदा की हो.... हाँ इनके ज़ायोनियों के साथ ख़ुफ़िया मीटिंग और उनके साथ व्यापार और मुसलमानों के खून बहाने की साज़िश के चर्चे ज़रूर मिलेंगें। सारे मुसलमानों से निवेदन कि इस खूँख़ार चेहरे को पहचानें, और फैसला लेने में ध्यान दें कि कौन सच में मुसलमानों का हमदर्द है और कौन काबे की सेवा के नाम पर मुसलमानों को लूट कर उन्हीं पैसों को हज की सुविधाएं बढ़ाने के बजाए उन्हीं के घर में एक ओर से धमाके, फायरिंग, किडनैपिंग और दूसरी ओर से मुसलमानों का क़त्ले आम करने वाले ज़ायोनियों के साथ दोस्ती करके कभी रेलमार्ग तो कभी रियाज़ से तल-अबीब के बीच सीधी उड़ान शुरू करने के सपने देख रहे हैं ताकि इनकी अय्याशियाँ बिना किसी रोक टोक के चलती रहे, और कौन सिर्फ मुसलमान होने के नाते अपने ऊपर हर प्रकार का प्रतिबंध झेलने के बावजूद मुसलमानों की हर तरह की मदद करने को तैय्यार है।


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