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Date of publication : 11/6/2017 16:39
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इमाम हसन अ.स. की नैतिक अच्छाईयां।

मैं ख़ुद अल्लाह की बारगाह में एक ज़रूरतमंद हूँ, मुझे शर्म आती है कि मैं ख़ुद अल्लाह की बारगाह में एक ज़रूरतमंद होते हुए किसी को ख़ाली हाथ वापिस लौटाऊं

विलायत पोर्टल :
इमाम सज्जाद अ.स. फ़रमाते हैं कि इमाम हसन अ.स. अपने दौर के सब से बड़े आबिद, ज़ाहिद और महान इंसान थे, आप पैदल हज करने जाते और कभी कभी नंगे पांव जाते, आप मौत, क़यामत और पुले सिरात को याद करके हमेशा रोते थे, आप जब भी अल्लाह की इबादत के लिए मुसल्ले पर खड़े होते आपका बदन लरज़ जाता, जन्नत और जहन्नुम का जब भी ज़िक्र आता आप साँप काटे हुए इंसान की तरह तड़प कर अल्लाह से जन्नत का सवाल करते और जहन्नुम से पनाह मांगते थे। इमाम के ऐसे ही कुछ नैतिक गुणों को संक्षेप में यहाँ बयान किया जाएगा।
 आप की परहेज़गारी
आप का ध्यान हमेशा अल्लाह की ओर होता, जिस के असर को इमाम के वुज़ू करते समय देखा जा सकता था, और जब बुज़ू करते आपके चेहरे का रंग उड़ जाता और बदन लरज़ने लगता, और जब आप से इस बारे सवाल किया गया आपने फ़रमाया कि, जो भी अल्लाह की बारगाह में हाज़िरी देना चाहता है उसकी ऐसी ही हालत होनी चाहिए, इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल हुआ है कि आप ने फ़रमाया, इमाम हसन अ.स. अपने दौर के सबसे अधिक अल्लाह की इबादत करने वाले इंसान थे, आप मौत और क़यामत के हालात को याद करके रो रो कर बेहाल हो जाते थे, आप ने पैदल और नंगे पांव कुल 25 हज अंजाम दिए।
आप की बहादुरी
आप की बहादुरी के लिए बस यही कह देना बहुत है कि आप शेरे ख़ुदा इमाम अली अ.स. के हाथों तरबियत पाए, यह केवल इमाम अली अ.स. की ही बहादुरी थी कि आप उस समय तक दुश्मन की ओर पीठ नहीं करते थे जब तक उसे उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा देंते थे, इमाम हसन अ.स. बचपन ही से पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के साथ जंग में रहते और फिर आप ने अपने वालिद इमाम अली अ.स. से जंग के हुनर सीखे तो ज़ाहिर है अरब के सब से बहादुर इंसान से बहादुरी के गुंण सीखने के बाद आप की बहादुरी भी उसी पैमाने पर होगी।
आप की विनम्रता
आप बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे, जिसे आपके मुश्किलों और कठिनाईयों का सामना करने और आपके जाहिल दुश्मनों के द्वारा दी गई पीड़ा के मुक़ाबले भलि भाँति देखा जा सकता है, जैसा कि इतिहास में मौजूद है कि, एक बार शाम से आया एक शख़्स इमाम को देखते ही भला बुरा कहने लगा, जब वह चुप हुआ इमाम ने उसे सलाम किया और कहा, शायद तुम इस शहर में अजनबी हो अगर घर की ज़रूरत हो तो घर की व्यवस्था कर दूँ, अगर पैसे की ज़रूरत हो तो वह ले लो, अगर भूखे हो तो चलो खाना खिला दूँ, यह सब सुनने और इमाम की विनम्रता देखने के बाद वह बहुत शर्मिंदा हुआ और रोने लगा, और फिर कहा अभी तक आप और आप के वालिद के जितना (मआज़ल्लाह) मेरी निगाह में कोई बुरा नहीं था लेकिन अब आप दोनों से अधिक मेरी निगाह में कोई अच्छा नहीं है।
आप की सख़ावत
आप की सख़ावत और दान के बारे में हदीसों में मिलता है कि कभी कोई ज़रूरतमंद आपके दरवाज़े से ख़ाली नहीं गया, आप कभी किसी भी ज़रूरतमंद को मना नहीं करते, यही कारण है कि आप को करीमे आले ताहा कहा जाता है। जब आप से पूछा गया कि किसी ज़रूरतमंद को ख़ाली हाथ क्यों नही लौटाते, आप ने फ़रमाया मैं ख़ुद अल्लाह की बारगाह में एक ज़रूरतमंद हूँ, मुझे शर्म आती है कि मैं ख़ुद अल्लाह की बारगाह में एक ज़रूरतमंद होते हुए किसी को ख़ाली हाथ वापिस लौटाऊं, और आप यह भी फ़रमाते, एक जवान के जीवन का सब से अच्छा दिन यह है कि उस से कोई ज़रूरतमंद सवाल करे।
आप की सख़ावत में विनम्रता
रिवायत में है कि इमाम हसन अ.स. ऐसी जगह से गुज़र रहे थे कि जहां कुछ फ़क़ीर ज़मीन पर कुछ रोटी के टुकड़े लिए बैठे खा रहे थे, इमाम को देख कर कहा ऐ पैग़म्बर की बेटी के बेटे आएं आप भी हमारे साथ खाएं, इमाम रुके और फ़रमाया कि अल्लाह घमंडियों को पसंद नहीं करता और फिर उन लोगों के साथ बैठ कर खाना खाया और उन्हें अपने घर दावत पर बुला कर खाना खिलाया और खाने के बाद उन्हें नए कपड़े दिए, और फिर कहा मुझ से बेहतर आप लोगों का अमल है क्योंकि आप के पास जो कुछ था वह सब हमारे सामने पेश कर दिया लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका, इस से इमाम की सख़ावत और विनम्रता को अच्छी तरह समझा जा सकता है।


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