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Date of publication : 27/7/2017 18:42
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मेरा बचपन मेरी ज़बानी।

वह हमारे लिए ऐसी आयतों की तिलावत करतीं जिनमें हमारे लिए सबक़ हो, जैसे पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के जीवन से संबंधित आयतें, हम ने बचपन में सब से पहले अपनी मां की ज़बान से हज़रत मूसा अ., हज़रत इब्राहीम अ. और कुछ दूसरे नबियों के जीवन पर आधारित क़िस्सों को सुना था, तिलावत करते समय जैसे ही किसी नबी का नाम आता वह उनकी ज़िंदगी और सीरत को हमारे लिए विस्तार से बयान करती

विलायत पोर्टल :
हम दो मां से आठ भाई बहन हैं, मेरे वालिद की पहली बीवी से केवल बेटियां थीं, उनके गुज़र जाने के बाद मेरे वालिद ने दूसरी शादी की (जो मेरी मां हैं) हम पांच भाई बहन थे, इन पांचों में से मैं दूसरा बेटा था, इस बीच 2 बच्चों का इन्तेक़ाल भी हुआ, उनको भी अगर शामिल कर लिया जाए तो सारे बच्चों में मेरा चौथा नंबर था, लेकिन उन दोनों के इन्तेक़ाल के बाद मैं घर की दूसरी बड़ी औलाद था, मुझ से बड़ी बहन मेरे वालिद की पहली बीवी से थीं जो मुझ से काफ़ी बड़ी थीं। मेरे मां बाप काफ़ी विनम्र स्वभाव के थे, मेरी मां एक पढ़ी लिखी और समझदार ख़ातून थीं, जिनको शायरी का भी शौक़ था, आप क़ुर्आन से पूरी तरह परिचित थीं, और अच्छी आवाज़ की मालिक थीं। हम लोग जब छोटे थे, सब एक जगह बैठते और हमारी वालिदा क़ुर्आन की तिलावत करतीं, वह क़ुर्आन को बहुत अच्छी आवाज़ और अच्छे तरीक़े से पढ़ती थीं, वह हमारे लिए ऐसी आयतों की तिलावत करतीं जिनमें हमारे लिए सबक़ हो, जैसे पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के जीवन से संबंधित आयतें, हम ने बचपन में सब से पहले अपनी मां की ज़बान से हज़रत मूसा अ., हज़रत इब्राहीम अ. और कुछ दूसरे नबियों के जीवन पर आधारित क़िस्सों को सुना था, तिलावत करते समय जैसे ही किसी नबी का नाम आता वह उनकी ज़िंदगी और सीरत को हमारे लिए विस्तार से बयान करती थीं। हाफ़िज़ जैसे महान शायर के शेर उन्हें ज़बानी याद थे, संक्षिप्त में कहा जाए तो वह एक बहुत विनम्र, समझदार और बाक़ी सभी मांओ की तरह अपने बच्चों का बेहद ख़्याल रखने वाली ख़ातून थीं। मेरे वालिद अपने ज़माने के नामचीन आलिमों में से थे, वह बहुत शांत स्वभाव के थे, और अपने मदरसे के समय से ही बहुत कम बातचीत करते थे, मेरे वालिद तबरेज़ शहर के होने के कारण तुर्की ज़बान बोलते और मेरी मां फ़ारस शहर से होने के कारण फ़ारसी बोलतीं, इसी कारण हम लोगों ने बचपन से ही फ़ारसी और तुर्की दोनों ज़बानें सीख ली थीं, मेरे घर का माहौल बहुत ही ख़ूबसूरत और दिलकश था, यह और बात है कि हालात अच्छे न होने के कारण हम ज़्यादा लोग होने के सबब एक छोटे से घर में ही रहते थे। मैं 10 से 13 साल की उम्र से ही अम्मामा और क़बा पहनता था, मैंने मदरसे जाना ही इसी लिबास में शुरू किया था, केवल गर्मी के मौसम में बिना अम्मामे के जाता था, और जैसे सर्दी का मौसम आता मेरी मां अपने हाथों से मेरे सर पर अम्मामा बांधती थीं, मेरी मां आलिमे दीन की बेटी और कई आलिमे दीन की बहन थीं, इसी कारण उन्हें अम्मामा बांधना अच्छे से आता था, मेरे लिए कठिन था कि अपने घर बाक़ी भाई बहनों से अलग कपड़ों में दिखूं, लेकिन आपस में थोड़ा बहुत हंसी मज़ाक़ करके संभाल लेता था। मेरा शुरू से ही रूहानी लिबास पहनना किसी ख़ास मक़सद से नहीं था, बल्कि उसका अहम कारण यह था कि मेरे वालिद रज़ा पहेलवी (ईरान का बादशाह) के हर काम का विरोध करते थे, उसका कहना था कि पूरे ईरान में एक ही जैसे कपड़े पहने जाएं जिसे वह यूरोप से देख कर आया था, वरना ईरानियों का अपना एक ख़ास लिबास था जिसे वह पहनते थे लेकिन उसने पैंट शर्ट और टाई और सर पर हैट इस तरह के पहनावे को ईरान में शुरू करवाया, मेरे वालिद को यह पहनावा बिल्कुल भी पसंद नहीं था, यही कारण है कि मेरे लिए उन्होंने यह रूहानी पहनावा चुना, यह और बात है कि मेरे वालिद और मेरी मां और ख़ुद मेरी सोंच भी आलिमे दीन बनने ही की थी। मेरी आंखें कमज़ोर थीं, कोई इस बात को नहीं जानता था यहां तक ख़ुद मुझे भी नहीं पता था, बस यह समझता था कि मुझे कुछ धुंधला दिखता है, फिर कुछ साल बाद मुझे समझ आया कि मेरी आंखें कमज़ोर हैं, मेरे वालेदैन ने मेरे लिए चश्मे का बंदोबस्त किया, मेरे जब चश्मा लगा उस समय मेरी उम्र 13 साल की थी, शुरू में स्कूल में मुझे बहुत तकलीफ़ हुई, क्योंकि मुझे टीचर का चेहरा और बोर्ड पर लिखी हुई चीज़ें नहीं दिखाई देती थीं, जिस से मेरी पढ़ाई पर भी थोड़ा बहुत असर पड़ रहा था। स्कूल के उन्हीं दिनों में रेडियो पर मशहूर ख़तीब आक़ा फ़लसफ़ी की मजलिस आना शुरू हुई थी, मैं उनको सुनता और (बचपन में) उन्हीं की तरह मैं भी पढ़ता, मैं स्कूल की किताबों को उन्हीं के तरीक़े से पढ़ता था, और यह मेरे उस्ताद और वालेदैन को बहुत पसंद था। स्कूल के बाद मैं कॉलेज नहीं गया, बल्कि कॉलेज की विषय को मैं ख़ुद से रात में पढ़ा करता था, 12 साल की उम्र से मैं भविष्य के बारे में सोंचने लगा था और चूंकि पहले ही मैं इरादा कर चुका था कि मुझे आलिमे दीन बनना है इसलिए अब पूरा ध्यान केवल उसी तरफ़ रहता था। सबसे अहम यह बात कि कभी तालिबे इल्म होना या अम्मामा अबा और क़बा पहनना मेरे बचपने में रुकावट नहीं बना, मतलब यह कि मैं अम्मामा भी लगाता था और जब दिल करता था इस रूहानी लिबास को उतार कर दोस्तों के साथ खेलता और फिर घर वापिस आ जाता, फिर जब वालिद के साथ मस्जिद जाता तो अम्मामा पहन के जाता, और मदरसे भी जब जाता तो इसी रूहानी लिबास में ही जाता था। मशहद में एक बहुत ही आलीशान लाइब्रेरी थी, तालिबे इल्मी के शुरूआती दौर में क़रीब 15-16 साल की उम्र में मैं वहां जा कर किताबें पढ़ता था, चूंकि यह लाइब्रेरी इमाम रज़ा अ.स. के रौज़े से कुछ दूरी पर थी इसलिए कभी कभी अज़ान की आवाज़ धीरे आने और पढ़ाई में व्यस्त होने की वजह से अज़ान के बाद नमाज़ के समय इमाम अ. के हरम पहुंच पाता था, किताबों से मुझे बचपन ही से लगाव था, और अब मैं 60 साल का हो चुका हूं (उस समय आयतुल्लाह ख़ामेनेई की उम्र 60 साल थी), अब आप में से कुछ मेरे बच्चों और कुछ मेरे पोतों के जैसे हैं, लेकिन अभी भी आप में से बहुत से नौजवानों से ज़्यादा किताबें पढ़ता हूं। यह भी सुनिये, अभी अल्लाह के अहकाम मुझ पर वाजिब भी नहीं हुए थे लेकिन फिर भी मैं रोज़े अरफ़ा के आमाल अंजाम देता था, इस दिन का ज़िक्र इस लिए क्योंकि इस दिन के आमाल काफ़ी ज़्यादा हैं, अगर कोई पूरे आमाल करना चाहे तो ज़ोहरैन की नमाज़ के बाद से मग़रेबैन की नमाज़ तक हो पाएंगे। मुझे याद है कि मैं अपनी वालिदा के साथ घर के छोटे से आंगन में एक किनारे चटाई वग़ैरा बिछा कर आमाल करता था, मेरी वालिदा दुआ, मुनाजात और मुस्तहब आमाल की भी बहुत पाबंद हैं, चूंकि रोज़े अरफ़ा के आमाल खुली जगह मुस्तहब हैं इसलिए हम लोग घर के छोटे से आंगन में बैठ कर आमाल करते थे, मुझे याद है एक साल बहुत गर्मी थी, शायद गर्मी या पतझड़ को मौसम था दिन बहुत लंबे होते थे, लेकिन हम सभी भाई बहन अपनी वालिदा के साथ आंगन मे बैठ कर दुआ, मुनाजात और नमाज़ें पढ़ते थे, मेरी जवानी इसी तरह मानवियत और दुआ व मुनाजात के साथ गुज़री है। मैं शायद 15 या 16 साल का था जब शहीद नव्वाब सफ़वी मशहद आए थे, उन्होंने मुझे काफ़ी हद तक अपनी ओर आकर्षित कर लिया था, और जो भी उस समय मेरी उम्र के थे सभी शहीद नव्वाब सफ़वी की ओर बहुत आकर्षित थे, शहीद नव्वाब सफ़वी में ज़बरजस्त जोश और जज़्बा था, और आप में ख़ुलूस, सच्चाई और बहादुरी भी काफ़ी थी, और उनकी यही सब अच्छाइयां देख कर मेरे अंदर भी उसी तरह का जज़्बा उभर गया था। वह दौर हमारे संघर्ष का था, मेरी जवानी भी उसी संघर्ष के दिनों ही में गुज़री, और उस समय ईरान में चारो तरफ़ ऐसा डर फैला था कि अपने क़रीबी रिश्तेदारों और दोस्तों के सामने भी सियासी बातें करने से डरता था, यहां तक कि कोई काग़ज़ का टुकड़ा भी न किसी को दे सकता था और न ले सकता था, इतना ज़्यादा हुकूमत का दबाव था कि थोड़े से शक की बिना पर भी किसी को भी गिरफ़्तार कर लेते थे और किसी के भी घर में घुस कर हमला कर देते थे। हमारे घर पर भी कई बार हमला हुआ, कई बार तलाशी ली गई, मेरे वालिद के घर और मेरे घर से कई बार हमारे नोट बुक भी उठा कर ले गए, कभी वापस किया कभी नहीं, कभी उमनें से कुछ वापस किया, जिसकी वजह से मेरे बहुत सारे इल्मी नोट्स बर्बाद हो गए। मैं 6 बार गिरफ़्तार हुआ, जिसमें से एक बार जेल में रखा गया और एक बार जिलावतन किया गया, ऐसे हालात क़रीब 3 साल तक चलते रहे, हम ईरानियों की ज़िंदगी उस समय बहुत मुश्किल हालात में थी। मैंने उन संघर्ष के दिनों में काफ़ी साल तक मशहद में जवानों के लिए क़ुर्आन की तफ़सीर की क्लास रखी, उसी तफ़सीर की क्लास में जब मैं बनी इस्राईल से संबंधित आयतों पर पहुंता तो मैंने बनी इस्राईल और यहूदियों के बारे में कुछ बातें बतानी शुरू कर दीं, कुछ ही दिनों बाद मुझे बहाने से गिरफ़्तार कर के जेल में डाल दिया, मुझे रिमांड पर लेकर सवाल जवाब किए जिन में से एक बात यह भी कही कि तुम इस्राईल और यहूदियों के विरुध्द लोगों को भड़काते हो। ध्यान दिया आपने, अगर किसी ने क़ुर्आन की तफ़सीर करते हुए बनी इस्राईल के बारे कुछ तफ़सीर बयान की तो उस से भी जवाब तलब किया जाता था कि तुम ने क्यों बनी इस्राईल के बारे मे आयत की तफ़सीर बयान कर के इनकी बुराई की, यानी सियासी हालात इस हद तक ख़तरनाक थे और हुकूमत के लोग इतना ज़्यादा लोगों के बारे में बुरे विचार रखते थे कि मामूली शक कि बिना पर भी गिरफ़्तार करके रिमांड पर ले लेते थे। (21 जनवरी 1998 में आयतुल्लाह ख़ामेनेई की नौजवानों और जवानों के साथ बीच बातचीत)
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