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Date of publication : 2/8/2017 18:25
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इमाम रज़ा अ. ने मामून का उत्तराधिकारी बनना क्यों स्वीकार किया?

फ़रमाया, कि कलमए तौहीद की कुछ शर्तें हैं और मैं उन्हीं शर्तों में से एक हूँ।


विलायत पोर्टल :
  सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि इमाम ने ख़ुद उत्तराधिकारी बनना स्वीकार नहीं किया, और हर बार वह मामून को मना कर देते थे, फिर मामून ने जान से मार देने की धमकी देना शुरू की, जैसा की इतिहास में मौजूद है कि मामून ने इमाम को इस प्रकार धमकाया, ख़ुदा की क़सम अगर आप ने मेरी इस बात को स्वीकार नहीं किया (और मैं दिल से यही चाहता भी हूँ) तो आप को जान से मार दूँगा। (एललुश् शराए, मक़तेलुत-तालेबीन) इमाम ने अपनी शर्त रखते हुए इस प्रकार स्वीकार किया कि न किसी को काम पर रखूँगा न निकालूँगा, न क़ानून बनाने और तोड़ने में मेरा कोई किरदार रहेगा, मैं हर चीज़ से दूर दूर रहूँगा। इमाम ने अपनी इमामत के दौरान तीन अब्बासी हाकिमों हारून, अमीन, मामून के जीवन को देखा है, लेकिन अपने जीवन के सब से बुरे दौर को अपने वालिद इमाम काज़िम की शहादत के बाद से ही बताया है, हाँलाकि मामून सब के सामने अपने को शिया कहता और अल्वियों के साथ अच्छा व्यव्हार करता था, लोकिन इमाम इस मक्कार और पाखंडी की हर चाल जानते थे कि उसका मदीने से ख़ुरासान (ईरान) बुलाने का क्या कारण है। उयूनो अख़बारिर-रज़ा में शैख़ सदूक़ से नक़्ल हुआ है, जिस समय इमाम को मदीने से ख़ुरासान ले जाने के लिए मामून का भेजा हुआ सिपाही मदीना पहुँचा, इमाम मदीना छोड़ने से पहले मस्जिदे नबवी में गए ताकि पैग़म्बर स. से आख़िरी बार विदा हो लें, आप पैग़म्बर स. की क़ब्र के किनारे आँखो में आँसू लिए खड़े बातें कर रहे थे, आप कई बार क़ब्र पर गए फिर वापिस आए, और तेज़ आवाज़ में रो रहे थे और कह रहे थे मैं अपने जद की क़ब्र से दूर परदेस में शहीद किया जाऊँगा। इमाम ख़ुरासान में मामून की चाल को देख कर कि किस प्रकार मामून केवल अपने फ़ायदे के लिए सारे काम कर रहा है बहुत दुखी थे, आपके ग़ुलाम से रिवायत है कि, इमाम जुमे कि दिन जब मस्जिद से वापस होते तो फ़रमाते, अगर इस प्रकार की परिस्थिति मेरे शहीद हो जाने से बेहतर हो जाएगी तो जल्द से जल्द मुझे शहादत दे दे, इस बात से साफ़ ज़ाहिर हे कि इमाम उत्तराधिकारी बनने पर मजबूर थे वह किसी प्रकार भी इस पद से सहमत नहीं थे। (ज़िंदगी-ए- दवाज़दह मासूम, हाशिम अल-हुसैनी, जिल्द 2) उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करने का कारण इमाम और इतिहास के पन्नो के द्वारा यह बताया गया है कि, इमाम ने उस समय मामून का उत्तराधिकारी बनना स्वीकार किया जब देखा कि मना करने से ख़ुद इमाम और आप की पैरवी करने वालों की जान बिना किसी कारण के चली जाएगी, इसीलिए इमाम ने अपनी और अपने शियों की जान को बचाना ज़रूरी समझा, क्योंकि इस्लामी उम्मत को उस समय इमाम और उनके असहाब की ज़रूरत थी, इनको अभी जीवित रहना था ताकि लोगों की बुनियादी समस्याओं का हल बता सकें, बेशक लोगों को इमाम और उनके ऐसे असहाब की ज़रूरत हर दौर में रहती है जो उस दौर की समाजिक, धार्मिक और भी कई प्रकार की समस्या को हल करें, इसीलिए इमाम के लिए ज़रूरी था कि  हर वह क़दम उठायें  जिस से उनकी और उनके असहाब की जान बच सके ताकि दीन और उम्मत को बचाया जा सके, और हम सब ने इतिहास में देखा भी कि इमाम के इस पद को स्वीकार करने के बाद वह अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहे लेकिन फिर भी दीन और दीन के कुछ सच्चे सिपाहियों के लिए यह पद स्वीकार किया। इमाम के इस पद को स्वीकार करने के पीछे एक और कारण यह भी था कि लोग पैग़म्बर स. के घराने को राजनीति के मैदान में मौजूद पाएँ ताकि वह इस घराने को भुला न सकें, और यह न सोंचे जैसा कि उस समय मशहूर कर दिया गया था कि यह घराना केवल शिक्षा संबंधित मामलों के हल के लिए है, राजनीतिक मुद्दों में इनका कोई किरदार नहीं है, शायद यही कारण था कि इमाम ने इब्ने अरफ़ह के सवाल के जवाब में कि आप ने मामून का उत्तराधिकारी बनना क्यों स्वीकार किया तो आप ने इसी बात की ओर इशारा किया कि मैंने उसी उद्देश्य के लिए स्वीकार किया जिस मक़सद से मेरे दादा अली अ.स. ने शूरा (सक़ीफ़ा) में क़दम रखा था, इन सब कारणों से हट कर भी अगर ध्यान दिया जाए तो इमाम ने इस पद पर रहते हुए मामून के असली चेहरे को दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिया, जैसा कि बाद की घटनाओं से साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि इमाम, मामून के नापाक इरादों को जानते थे कि मामून कुछ भी हो मुझे ज़रूर क़त्ल करेगा। यही कारण है कि इमाम रज़ा अ.स. ने मामून की गंदी राजनीति को सबके सामने ज़ाहिर करना शुरू कर दिया जिसके बारे में मामून ने सोंचा भी नहीं था, जिसकी ओर इशारा किया जा रहा है।
1. इमाम जब तक मदीने में थे मामून के बार बार कहने पर भी उत्तराधिकारी बनना स्वीकार नहीं कर रहे थे, ताकि मामून की ओर से की जाने वाली ज़बरदस्ती सब को पता चल जाए, यहाँ तक कि कुछ इतिहास विशेषज्ञों के अनुसार इमाम को मदीने से मर्व (शहर का नाम) तक ज़बरदस्ती लाया गया, इमाम बार बार आने से इसीलिए मना कर रहे थे ताकि सब यह जान जाएँ कि मामून इमाम को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाना चाहता बल्कि उसका बुलाने का मक़सद मुझे क़त्ल करना है।
2. मामून ने इमाम से चाहा था कि अगर वह चाहें अपने साथ अपने बच्चों को भी लेते आएं लेकिन इमाम अपने साथ किसी को भी यहाँ तक अपने बेटे इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को भी नहीं लाए, क्योंकि इमामत की निगाह मामून के इरादे को देख रही थी।
3. नेशापूर में इमाम ने हज़ारों लोगों के सामने अपना महबूब चेहरा दिखा कर यह हदीस इरशाद फ़रमाई, कि अल्लाह का फ़रमान है, कलमा ए तौहीद (ला इलाहा इल्लल्लाह) मेरा क़िला है, और जो मेरे क़िले में आ गया वह महफ़ूज़ हो गया, उस समय बीस हज़ार लोगों ने इमाम की पाक ज़ुबान से सुनते ही इस हदीस को लिख लिया, ध्यान देने की बात यह है कि इमाम ने न ही कोई दीन के अहकाम बयान किए न ही लोगों के जीवन से जुड़ी कोई समाजी बात, न ही नमाज़ रोज़े की बात की न ही तक़वा और परहेज़गारी की, और आप एक राजनीतिक सफ़र पर थे फ़िर भी न ही राजनीतिक से जुड़ी बात की न ही निजी जीवन से संबंधित कोई बात, हदीस नक़्ल करने के बाद इमाम की सवारी आगे बढ़ गई, आप के चाहने वाले या अभी आप की ओर देख रहे थे या हदीस लिख रहे थे या हदीस ही के बारे में सोंच रहे थे कि अचानक इमाम की सवारी फिर रुकी और आपने अपने मुबारक सर को महमिल से बाहर निकालते हुए फ़रमाया, कि कलमए तौहीद की कुछ शर्तें हैं और मैं उन्हीं शर्तों में से एक हूँ। (सीरए पीशवायान, पेज 490-495)


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