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Code : 188908
Date of publication : 7/8/2017 18:56
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नबी और इमाम मासूम होने के बावजूद क्यों इस्तेग़फ़ार करते थे?

उसका ऐसा करना यह बताता है कि वह उसने पास बैठे लोगों का आदर और सम्मान करते हुए एक मुबाह और जाएज़ काम के लिए भी शर्मिंदगी ज़ाहिर की और माफ़ी माँगी।

विलायत पोर्टल : 
जवाब: अगर एक बड़े हाल में कम वाल्ट का बल्ब हो तो केवल बड़े आकार की वस्तुएँ और चीज़े ही दिखाई देंगी, लेकिन अगर इसी हाल में अधिक वाल्ट का बल्ब लगा दिया जाए और रौशनी से पूरा हाल भर जाए तो काग़ज़ के छोटे छोटे टुकड़े और भी दूसरी बारीक चीज़ें भी दिख जाएंगी। आम इंसानों का नूर और रौशनी कम है, जिसके कारण वह केवल अपने बड़े पाप और गुनाहों के देखते हैं, लेकिन नबी और इमाम के अंदर यह ईमानी नूर बहुत अधिक होता है इसी कारण अगर उनका एक सेकेण्ड भी अल्लाह की इबादत और याद से ख़ाली रह गया तो वह अल्लाह की बारगाह में रोते गिड़गिड़ाते और इस्तेग़फ़ार करते। या एक और मिसाल, जिस इंसान के पैर में दर्द हो रहा हो उसका पैर फैलाना न हराम है न मकरूह, लेकिन हम देखते हैं कि ऐसा इंसान पैर फैलाने के समय सभी बैठे हुए लोगों से माफ़ी माँगते हुए पैर को फैलाता है, उसका ऐसा करना यह बताता है कि वह उसने पास बैठे लोगों का आदर और सम्मान करते हुए एक मुबाह और जाएज़ काम के लिए भी शर्मिंदगी ज़ाहिर की और माफ़ी माँगी। या एक और मिसाल, कभी कभी टी.वी. में समाचार सुनाने वाले अचानक खाँसी आ जाने के कारण सभी दर्शकों से माफ़ी माँगते हैं, जबकि खाँसी का आना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन चूँकि वह अपने आप को सभी दर्शकों के सामने पाता है इस लिए माफ़ी माँगता है। अल्लाह के सच्चे और पवित्र बंदे चाहे वह नबी इमाम की शक्ल में हों या आम आदमी की, वह अल्लाह की इस हद तक मारेफ़त और पहचान रखते हैं कि अगर सारे इंसान और जिन्नात की इबादत भी इनको दे दी जाए तब भी यह अल्लाह की बारगाह और दरबार में अपने आप को ही क़ुसूरवार समझते हुए तौबा और इस्तेग़फ़ार करते रहेंगे।


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