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Code : 188992
Date of publication : 12/8/2017 18:29
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शहीदों के बच्चों के साथ बर्ताव

अली इब्ने अबी तालिब अ. ने मेरे शौहर को एक मिशन पर भेजा जिसमें वह शहीद हो गए, और अब यह छोटे छोटे यतीम बच्चे हैं जिनका ख़र्च उठाने में मैं असमर्थ हूँ, जिसके कारण मैं दूसरों के घर काम करके बच्चों को पाल रही हूँ।


विलायत पोर्टल :
इमामे अली अ. ने एक बार एक औरत को अपने कंधे पर पानी का मश्क रखे ले जाते हुए देखा, आप उसकी सहायता के लिए उसके पास गए और मश्क ले कर उसके घर पहुंचा दिया, चलते समय आप के उसके जीवन और उसकी कठिनाइयों के बारे में प्रश्न पूछने पर उसने कहा कि, अली इब्ने अबी तालिब अ. ने मेरे शौहर को एक मिशन पर भेजा जिसमें वह शहीद हो गए, और अब यह छोटे छोटे यतीम बच्चे हैं जिनका ख़र्च उठाने में मैं असमर्थ हूँ, जिसके कारण मैं दूसरों के घर काम करके बच्चों को पाल रही हूँ। इमामे अली अ. वापस आ गए, और पूरी रात परेशानी में गुज़ार दी, अगले दिन सुबह आप खाने पीने का कुछ सामान ले कर उसके घर गए, रास्ते में कई लोगों ने सहायता करने को कहा लेकिन आप हर बार यही कहते कि क़यामत में मेरे आमाल का बोझ कौन उठाएगा? उसके घर पहुँच कर दरवाज़ा खटखटाया उस औरत ने पूछा कौन? आप ने जवाब दिया वही जिस ने कल मश्क उठाने में सहायता की थी, तुम्हारे बच्चों के लिए कुछ खाने पीने का सामान लाया हूँ। उसने दरवाज़ा खोला और कहा, अल्लाह तुम से ख़ुश और राज़ी रहे, और मेरे और अली के बीच फ़ैसला करने की अनुमति दे। इमामे अली अ. घर में गए और पूछा कि रोटी पकाओगी या बच्चों को संभालोगी? उसने कहा रोटी मैं जल्दी पका लूँगी, तुम बच्चों को संभालो। वह औरत आटा गूँधने में व्यस्त हो गई और आप अपने साथ लाए हुए गोश्त से कबाब बना कर खजूर के साथ बच्चों को खिलाने लगे, आप हर बच्चे को एक बाप की तरह बहुत प्यार से खिलाते और कहते मेरे बेटे अली को माफ़ कर दो। जब वह औरत आटा गूँध चुकी इमामे अली अ. ने तंदूर में आग जलाई, तभी एक औरत घर में आई जो इमामे अली अ. को पहचानती थी, उसने जैसे ही इमामे अली अ. को देखा उस औरत से कहा, यह क्या कर दिया तू ने, यह मुसलमानों के ख़लीफ़ा हैं। जैसे ही उस ने यह सुना अपनी कही हुई बातों पर शर्मिंदा होते हुए कहने लगी ऐ अमीरुल मोमिनीन अ. मैं आप से शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ़ कर दीजिए। इमाम ने फ़रमाया, तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के कामों में हमारी हुकूमत के कर्मचारियों की असफ़लता पर मैं तुम से शर्मिंदा हूँ। (बिहारुल अनवार, जिल्द 9, पेज 536)


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