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Code : 189143
Date of publication : 21/8/2017 18:29
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इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की ज़िंदगी पर एक निगाह

इमाम अ.स. ने हम लोगों को उस दिन सफ़र पर जाने से मना किया, जब इमाम अ.स. के घर से बाहर निकले तो हम्माद ने कहा क्योंकि मेरा सारा सामान जा चुका है इसलिए मैं आज जाऊंगा, लेकिन मैंने उस दिन जाने से मना कर दिया, हम्माद चले गए, उसी रात हम्माद अभी पहाड़ियों के बीच ही पहुंचे थे कि ऐसा सैलाब आया जिस में हम्माद डूब कर मर गए, आज भी उनकी वहीं पर क़ब्र मौजूद है।


विलायत पोर्टल :
  आप मदीना शहर में 195 हिजरी में पैदा हुए, आपके वालिद इमाम रज़ा अ.स. और वालिदा सबीका ख़ातून थीं, आपका नाम मोहम्मद, और आपके अलक़ाब जवाद, तक़ी, और मुर्तज़ा थे, और आपकी कुन्नियत अबू जाफ़र थी, आपके बेटे इमाम अली नक़ी अ.स. और मूसा मुबर्क़ा थे और दो बेटियां थीं जिनके नाम फ़ातिमा और अमामा थे।
आपके दौर के बादशाह आप ने मामून और मोतसिम अब्बासी के दौर में ज़िंदगी गुज़ारी, और हुकूमत के दबाव के चलते आपको मामून की बेटी उम्मुल फ़ज़्ल से शादी करनी पड़ी, और कुछ रिवायतों में यह भी है कि उम्मुल फ़ज़्ल ही ने आपको ज़हर दिया था, ध्यान रहे मामून की बेटी से इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के कोई औलाद नहीं थी और इमाम अली नक़ी अ.स. की वालिदा का नाम समाना था।
आपकी इमामत इस्लामी जगत के नामवर आलिम और इमाम अ.स. के सहाबी सफ़वान इब्ने यहया जिन्होंने अनेक हदीसें भी इमाम अ.स. से नक़्ल की हैं उनका बयान है कि, मैंने इमाम रज़ा अ.स. से पूछा कि आपके बाद कौन इमाम होगा इस बारे में अबू जाफ़र (इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स.) की पैदाइश से पहले जब हम लोग पूछते तो आप कहते थे कि अल्लाह मुझे एक बेटा देगा, अल्लाह का शुक्र कि उसने आप को बेटा दे कर हमारी आंखों की रौशनी बढ़ा दी, और अल्लाह न करे आपको कभी कुछ हो लेकिन अगर अभी आप दुनिया से चले गए तो आपके बाद हमारा इमाम कौन होगा? इमाम अ.स. ने अपने हाथ से इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की तरफ़ इशारा करते हुए कहा मेरे बाद मेरा यह बेटा तुम लोगों का इमाम होगा। मैंने कहा मौला आप पर क़ुर्बान हो जाऊं, इनकी उम्र तो अभी केवल 3 साल है, इमाम रज़ा अ.स. ने फ़रमाया, उम्र के कम होने से उसकी इमामत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा, हज़रत ईसा अ.स. की उम्र तो इस से भी कम थी जब उन्होंने अपनी नबुव्वत का ऐलान किया था। (इरशादे शैख़ मुफ़ीद, जिल्द 2, पेज 266) एक दूसरी रिवायत में मोअम्मर इब्ने ख़ल्लाद जो शिया रावियों में से एक हैं उन्होंने नक़्ल किया है कि, मैंने ख़ुद इमाम रज़ा अ.स. से सुना है कि आप ने इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि यह अबू जाफ़र अ.स. मेरे बाद मेरे जानशीन होंगे, हम पैग़म्बर स.अ. के अहले बैत अ.स. हैं, हमारे छोटे, बड़ों से इमामत जैसे ख़ुदाई मनसब और इस्लामी उलूम मीरास में पाते हैं। (इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की इमामत के बारे में और भी बहुत सारी दलीलों और रिवायतों को पढ़ने के लिए बिहारुल अन्वार की जिल्द 50 को पढ़ा जा सकता है)
इमाम अ.स. की विशेषताएं
एक बात जो सभी क़बूल करते हैं वह यह कि इमाम अ.स. की जो मारेफ़त रखते हैं वह आसानी से इमाम अ.स. को उनके इल्म से पहचान लेते हैं, लेकिन कभी कभी ग़फ़लत की नींद सोने वालों को जगाने के लिए मोजिज़े और करामत की ज़रूरत होती है, इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. क लिए मोजिज़े और करामत का पेश करना इसलिए और ज़रूरी हो गया था क्योंकि आपको बचपन में इमामत मिली, इसलिए कुछ लोगों के लिए आपकी इमामत को क़बूल करना थोड़ा सख़्त था, इसी वजह से इमाम अ.स. ने अपनी ज़िंदगी में बहुत करामात पेश कीं जिनमें से कुछ की ओर इशारा कर रहे हैं।
1- मशहूर रावी अली इब्ने असबात कहते हैं कि, इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को मिना की ओर आते देखा, मैं बहुत ध्यान से उनकी ओर देखने लगा ताकि मिस्र को लोगों को आपके चेहरे के बारे में बता सकूं, मैंने देखा इमाम अ.स. सज्दे में सर रख कर कह रहे हैं कि अल्लाह ने जो दलील नबुव्वत की बयान की है वही दलील इमामत के लिए भी है, अल्लाह ने क़ुर्आन में फ़रमाया, हम ने बचपने में उनको नबुव्वत दी..... इसी कारण अल्लाह अपनी ओर से दिए जाने वाले मंसब में ख़ुद अपने हिसाब से चुनता है, जैसा कि उसने ख़ुद ऐलान किया है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 50, पेज 37)
2- उमय्या इब्ने अली अल-क़ैसी नाम का रावी कहता है कि मैं और हम्माद इब्ने ईसा इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के घर मदीना गए, ताकि इमाम अ.स. से ख़ुदा हाफ़िज़ी कर लें, इमाम अ.स. ने हम लोगों को उस दिन सफ़र पर जाने से मना किया, जब इमाम अ.स. के घर से बाहर निकले तो हम्माद ने कहा क्योंकि मेरा सारा सामान जा चुका है इसलिए मैं आज जाऊंगा, लेकिन मैंने उस दिन जाने से मना कर दिया, हम्माद चले गए, उसी रात हम्माद अभी पहाड़ियों के बीच ही पहुंचे थे कि ऐसा सैलाब आया जिस में हम्माद डूब कर मर गए, आज भी उनकी वहीं पर क़ब्र मौजूद है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 50, पेज 43)
3- इब्ने हदीद नामी शख़्स बयान करता है, कुछ लोगों के साथ हज के सफ़र पर गया, रास्ते में हमारे क़ाफ़िले को लूट लिया गया, हम लोग जब मदीने पहुंचे तो रास्ते में इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. से मुलाक़ात हो गई, हम लोग इमाम अ.स. के साथ उनके घर गए और पूरी घटना इमाम अ.स. को बता दी, इमाम अ.स. ने कुछ कपड़े हम लोगों के लिए मंगवाए और कुछ दीनार दिए और कहा कि जिसके जितने लूटे गए हैं उनको उतने दे दो, मैंने जब वह दीनार बांटे तो न ही एक दीनार कम पड़ा और न ही एक दीनार बचा। इसी तरह और भी बहुत सारी करामतें और इमाम अ.स. के मोजिज़े इतिहास में मौजूद हैं जिनके लिए बिहारुल अनवार की जिल्द 50 पढ़ी जा सकती है।
इमाम अ.स. की शहादत इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. मामून की हुकूमत तक मदीने ही में थे, और उसकी हलाकत तक मदीने ही में रहे, लेकिन जैसे ही मोतसिम हुकूमत में आया, इमाम अ.स. को आपकी बीवी उम्मुल फ़ज़्ल के साथ बग़दाद बुला भेजा, और कुछ रिवायत की बुनियाद पर मोतसिम ही ने उम्मुल फ़ज़्ल के हाथों इमाम अ.स. को ज़हर दिलवा कर शहीद करवाया, आप ज़ीक़ादा की आख़िरी तारीख़ को शहीद हुए, आपकी क़ब्र काज़मैन शहर इराक़ में है।


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