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Date of publication : 22/8/2017 16:58
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वहाबी जवान का शिया होना

मैंने अल-ग़दीर में मौजूद रिवायतों और हदीसों की सच्चाई जानने के लिए अपनी किताबों को भी पढ़ना शुरू कर दिया, मुझे अपनी किताबों में वह हदीसें और रिवायतें मिलती जा रही थीं, यानी अल्लामा अमीनी ने सारी हदीसें और रिवायतें वहाबी और सुन्नी किताबों से लिखी थीं, लेकिन अभी भी दिल में कुछ शक बाक़ी था।


विलायत पोर्टल :
शिया मज़हब क़बूल करने वाले हमीद शीरानी ने क़ुर्आन और मआरिफ़ चैनल पर अपने शिया होने के पूरे सफ़र के बारे में अमीर मेहरदाद ख़ुस्रवी के साथ बातचीत में कहा कि, वहाबियों का अक़ीदा है कि जब तक इस्लाम में शिया मज़हब रहेगा तब तक इस्लाम पाक नहीं रह सकता, वह इमामत, क़ब्रों की ज़ियारत और शहादत जैसे मतालिब में हेरफेर करते हैं, वह मनोविज्ञान द्वारा हम पर हावी होते हैं, वहाबी अधिकतर कम पढ़े लिखे होते हैं, लेकिन जो पढ़े लिखे होते हैं वह अपने आस पास की ख़बरों को बहुत अच्छे से जानते हैं। इस शिया होने वाले जवान ने कहा, वहाबियत का मक़सद यह है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करें, और अधिकतर वहाबियत की ओर खिंचने वाले लोग सुन्नी होते हैं, यही कारण है कि वहाबी टोला सुन्नियों को अपने से क़रीब करने के लिए उन्हें अपना भाई कहते हैं ताकि अपने टोले को बढ़ाया जा सके, जबकि सच्चाई यह है कि उनके दिलों में सुन्नियों के लिए भी केवल नफ़रत है और उनके ख़ून बहाने और नामूस के साथ ज़ियादती को भी जाएज़ समझते हैं। फिर वह कहते हैं कि, वहाबियों का कहना है कि हम इस्लाम को एक पाक रोटी की तरह पूरे इस्लामी जगत के सामने पेश करना चाहते हैं, जबकि हक़ीक़त यह है कि वहाबियत ख़ुद इस्लामी जगत का एक नापाक टुकड़ा है। इस वहाबी जवान ने अपने शिया होने का पूरा सफ़र इस तरह बयान किया कि, मैं किरमान शहर किसी काम से गया था, वहां मैंने एक शिया को देखा वह अपनी दुकान पर वहाबी किताबों से ली गई कुछ हदीसें दीवारों पर चिपकाए हुए था, जिनमें से पैग़म्बर स.अ. की एक हदीस पर मेरी नज़र पड़ी, जिसमें आप ने फ़रमाया था कि जो शख़्स बिना अपने ज़माने के इमाम अ.स. को पहचाने मर जाए उसकी मौत जेहालत की मौत होगी, एक और हदीस जो हदीसे सक़लैन के नाम से है वह भी देखी, जब मैं इन हदीसों को पढ़ रहा था तो दिल ही दिल में कह रहा था कि यह शिया लोग भी कैसे कैसे झूठ बोलते हैं, आख़िर कोई शिया किसी वहाबी किताब को हाथ लगाएगा, मैंने उसी समय सोंच लिया था कि मैं इन हदीसों के बारे में अपनी किताबों में ज़रूर देखूंगा। शीरानी कहता है कि, मैं पूरे पक्के इरादे से वहां से वापस हुआ कि मैं वहाबी और सुन्नी दोनों की किताबों में यह हदीसें देखूंगा कि सच में यह हदीसें हमारी किताबों में हैं या शियों ने झूठ फैला रखा है, मैंने वहाबियों की अहम किताबों में ढ़ूंढ़ना शुरू किया, और मेरी तलाश कामयाब हुई और सच में वहाबी किताबों में यह हदीस मौजूद थीं, फिर मुझे एहसास हुआ कि केवल शिया ही गुमराही से बचने के लिए इन हदीसों को हमेशा सामने रखते हैं, इसके बाद से मेरे दिमाग़ में केवल यही शक रहता कि कहीं मैं वहाबियों जैसी नमाज़ पढ़ कर अपनी नमाज़ें ख़राब तो नहीं कर रहा हूं, फिर मैंने हिम्मत जुटा कर कुछ शिया उलमा की मदद से शियों की किताबों को पढ़ना शुरू किया, उन लोगों ने शुरू में मुझ से जिन मामलों में मतभेद पाया जाता है उस बारे में बात नहीं की, बल्कि शुरू में केवल अक़्ल और इमामत के बारे में बात की। उसने ज़ोर देते हुए कहा कि जिन किताबों ने मुझे शिया होने में सबसे ज़्यादा मदद की वह नहजुल बलाग़ा, अल्लामा अमीनी की अल-ग़दीर, तीजानी समावी की कियाबें और शबहाए पेशावर हैं, सबसे पहले मैंने अल-ग़दीर पढ़ना शुरू की, उसे पढ़ कर बहुत ग़ुस्सा आया, मैंने किताब को पटकते हुए पक्का इरादा किया कि मैं इस किताब की रद्द में किताब लिखूंगा, मैंने अल-ग़दीर में मौजूद रिवायतों और हदीसों की सच्चाई जानने के लिए अपनी किताबों को भी पढ़ना शुरू कर दिया, मुझे अपनी किताबों में वह हदीसें और रिवायतें मिलती जा रही थीं, यानी अल्लामा अमीनी ने सारी हदीसें और रिवायतें वहाबी और सुन्नी किताबों से लिखी थीं, लेकिन अभी भी दिल में कुछ शक बाक़ी था। फिर शीरानी ने कहा कि, एक रात मैं सहीफ़ए सज्जादिया की 33वीं दुआ पढ़ रहा था, पढ़ते पढ़ते मुझे नींद आ गई, वह दुआ इस बारे में थी कि, ऐ अल्लाह मेरे पैरों को हमेशा नेकियों और अच्छाइयों की ओर ले जा, मैंने ख़्वाब देखा कि शियों के मोहल्ले में हूं, अली नाम का एक लड़का मुझे जगा रहा है, मेरे जागते ही उसने कहा उठो वुज़ू करो और नमाज़ पढ़ो, मैं उठा तो देखा कि शियों की जमाअत हो रही है, मैं अपने तरीक़े से पढ़ने जा रहा था तभी किसी ने मुझ से अब तुमको वहाबियों की तरह नमाज़ पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, शियों की तरह से नमाज़ पढ़ो, मैंने उन्हीं लोगों के साथ खड़े हो कर नमाज़ पढ़ ली, लेकिन बहुत चिंता हो रही थी, तभी देखा कि पास में खड़े एक शिया आलिम मुझे देख कर मुस्कुरा रहे हैं, उनकी मुस्कुराहट मेरे लिए ऐसी थी जैसे जलती हुई आग पर पानी डाल दिया गया हो, ध्यान देने की बात की बात यह है कि ठीक उसी समय मैं अपने दोस्त की आवाज़ सुन कर जाग गया, और वह सारी चीज़ें जो मैंने ख़्वाब में देखी थीं वह सब बिल्कुल उसी तरह मेरे साथ पेश आईं। फिर वह कहता है कि, इस घटना के बाद मैं ख़्वाब की ताबीर की किताब के लिए लाइब्रेरी गया, लेकिन मेरे जल्दी सुबह जाने की वजह से लाइब्रेरी अभी खुली नहीं थी, तभी मैंने एक शिया आलिम को देखा, मैंने उन से पूछा कि क्या आप ख़्वाब की ताबीर बता सकते हैं, उसने मुझे एक क़ुर्आनी सेंटर जाने को कहा, और कहा वहां कुछ उलमा मौजूद हैं उनसे अपने ख़्वाब के बारे में बताओ, जब मैंने उनको अपने ख़्वाब के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे ख़्वाब की ताबीर नहीं है बल्कि एक ख़ास मक़सद की ओर इशारा है, फिर उन उलमा ने कहा तुम ख़ुद ध्यान दो कि किस हक़ीक़त की तलाश में थे, मैं उसी समय उठा और इमाम अली अ.स. की शख़्सियत पर ईमान ले आया, और अब मुझे एहसास होने लगा था कि मुझे यह एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। उसने अपने शिया होने की पूरी घटना बयान करने के बाद यह भी बताया कि उसे किस प्रकार वहाबियों द्वारा तकलीफ़ पहुंचाई गई, वह बयान करता है कि, मेरे शिया होने के बाद वहाबियों ने मुझे मारा और मुझे और मेरे घर वालों को धमकाया, लेकिन जब उनको लगने लगा कि अब धमकी से कोई फ़ायदा होने वाला नहीं है तो इन वहाबियों ने मुझे पैसों की यह कह कर लालच दी कि जितना पैसा शियों ने तुमको दिया है हम उसका दुगना देंगे लेकिन तुम वापस पुराने अक़ाएद और विचारधारा की तरफ़ पलट आओ, मैंने कहा यह कोई खेल तमाशा नहीं हैं, मैं हक़ीक़त की तलाश में था जिस तक पहुंच चुका हूं। इसके बाद शीरानी ने बताया कि, हालांकि मेरे घर वालों ने मुझे छोड़ दिया था लेकिन वह हमेशा मेरे बारे में परेशान रहते थे कि कहीं वहाबी मुझे मार न डालें, जिसके चलते मेरे वालेदैन ने मुझ से कहा कि तुम यहां से कहीं दूर चले जाओ, मेरे हालात घर छोड़ कर किसी दूसरी जगह शिफ़्ट होने के नहीं थे, लेकिन पैग़म्बर स.अ. का हिजरत का हुक्म भी मेरे सामने था, जिस पर अमल करते हुए मैं एक शहर से दूसरे शहर इधर उधर भटकने लगा, एक दिन मैं क़ुम शहर से गुज़र रहा था, तो सोंचा हज़रत मासूमा स.अ. के मज़ार पर चलूं, वहां आकर देखा लोग उनके वसीले से अपनी अपनी दुआएं मांग रहे हैं, मुझ से देख कर रहा नहीं गया मैं भी जा कर अपनी हाजतें तलब करने लगा, आश्चर्य की बात यह है कि मैं जैसे ही हज़रत मासूमा स.अ. के मज़ार से बाहर आया एक ब्लूचिस्तान का रहने वाला मिल गया, उस से जान पहचान हो गई, उसको जब मैंने अपने बारे नें बताया तो उसने एक ही फ़ोन से मेरा अपने शहर से यहां शिफ़्ट होने का मामला हल करा दिया, और फिर मैं हज़रत मासूमा स.अ. के शहर में रहने लगा। इसके बाद यह शिया होने वाला जवान बताता है कि, क़ानूनी एतेबार से तो अब मैं अपना शहर छोड़ कर क़ुम का नागरिक हो गया था लेकिन अब मेरे रहने और सर छिपाने की मुश्किल थी, घर न होने की वजह से मैं अपने बीवी बच्चों को अपने शहर सीस्तान ब्लोचिस्तान से क़ुम नहीं ला पा रहा था, मैं फिर हज़रत मासूमा स.अ. के मज़ार पर गया और कहा, ऐ करीमए-अहलेबैत अ.स. मैंने आपसे केवल अपनी एक परेशानी के हल मांगने का सोंचा था लेकिन मेरे सामने अब एक और मुश्किल है, मैंने बीबी के हरम में दुआ मांगी और जैसे ही बाहर निकला, एक शख़्स मेरी बातचीत का अंदाज़ देख कर मेरे वतन के बारे में पूछने लगा, फिर बहुत ज़ोर दे कर पूछा कि यहां क़ुम में क्या कर रहे हो, फिर मैंने उसको भी पूरी घटना बताई, मेरी पूरी बात सुनने के बाद वह मुझे एक टी.वी. इंटरव्यू के लिए ले गया, और फिर उस इंटरव्यू के तुरंत बाद एक शख़्स उसी समय मुझ से मिलने के लिए ज़ोर देने लगा, उसने मुझ से मिलने के बाद मुझ से अपने घर रहने को कहा, इस तरह से अहले बैत अ.स. के वसीले से मेरी हर मुश्किल दूर होती चली गई। इस पूरे इंटरव्यू को नीचे दिए गए लिंक पर भी देखा जा सकता है।
http://bonyana.com/1808/1393/03/01/%D9%88%D9%87%D8%A7%D8%A8%DB%8C/


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