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Date of publication : 11/10/2017 16:42
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कर्बला में औरतों का किरदार

ऐ मरजाना की औलाद सुन, झूठा तू और यज़ीद जैसा बद किरदार है हम अहले बैत अ.स. नहीं।


विलायत पोर्टल : मर्दों का हौसला बढ़ाना इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि कर्बला में औरतो का अहम किरदार रहा है, यहां तक कि कहा जा सकता है कि कुछ जांबाज़ों का कर्बला आ कर इमाम हुसैन अ.स. के लश्कर में शामिल होना औरतों की ही देन थी, जैसा कि ज़ुहैर इब्ने क़ैन के बारे में तारीख़ में मौजूद है कि वह मक्के से इमाम हुसैन अ.स. के क़ाफ़िले के पीछे पीछे थोड़ी दूर पर चल रहे थे, वह इमाम अ.स. के क़ाफ़िले से क़रीब नहीं आ रहे थे, फिर इमाम अ.स. ने अपने क़ासिद को भेज कर ज़ुहैर से मिलने को कहा, लेकिन ज़ुहैर के दिल में थोड़ा संकोच था, और फिर जब ज़ुहैर की बीवी ने उनके संकोच को देखा तो कहा, ज़ुहैर तुमको क्या हो गया है, पैग़म्बर स.अ. के बेटे ने तुमको बुलाया और तुम अभी तक सोंच रहे हो, आख़िरकार ज़ुहैर अपनी बीवी द्वारा दिए गए हौसले के कारण इमाम अ.स. के पास गए और अब जब इमाम अ.स. के ख़ैमे से वापस निकले तो चेहरे पर एक अलग ही ख़ुशी थी, आकर अपनी बीवी से ख़ुदा हाफ़िज़ी की और इमाम अ.स. के क़ाफ़िले में शामिल हो गए और उनका नाम हमेशा के लिए तारीख़ में दर्ज हो गया।
इसी तरह अब्दुल्लाह इब्ने उमैर कल्बी की बीवी थीं, इन्होंने जब अपने शौहर के इरादे को देखा तो अपने शौहर से कहा, आपकी क़िस्मत अब इतनी बुलंद हो गई है कि अल्लाह आपकी दिली आरज़ू पूरी करना चाहता है, अब आप ऐसा करें कि मुझे भी अपने साथ ले चलें।
इसी तरह जब इमाम हुसैन अ.स. के जांबाज़ साथियों को पता चला कि हज़रत जैनब स.अ. अपने भाई इमाम हुसैन अ.स. की तन्हाई को ले कर बहुत परेशान हैं तो सभी चाहने वालों ने इमाम अ.स. के ख़ैमे के बाहर क़सम खा कर शहज़ादी ज़ैनब स.अ. को यक़ीन दिलाया कि जब तर हमारे बदन में ख़ून की आख़िरी बूंद है हम इमाम अ.स. पर आंच नहीं आने देंगे, और इमाम हुसैन अ.स. की अनुमति के बाद अहले बैत अ.स. के घराने की औरतों ने उनका हौसला यह कह कर बढ़ाया कि ऐ वफ़ादारों हज़रत ज़हरा स.अ. के घराने की रक्षा करो।
सब्र और धीरज औरतें आमतौर पर बहुत ही जज़्बाती होती हैं, किसी भी ख़ुशी या ग़म का असर उन पर बहुत ज़्यादा होता है, जैसा कि हम अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में देखते रहते हैं कि अगर रोड पर कोई हादसा भी हो जाता है तो कैसे औरतें डर और सहम जाती हैं, लेकिन कर्बला की औरतों का सब्र और धीरज इस मंज़िल पर था कि वह अपने गोद के पाले हुए बच्चों और वो जिनके साथ इन्होंने सालों बिताए हर दुख दर्द में शामिल रहने वाले अपने शौहर की लाश पर भी न केवल सब्र का दामन हाथ से नहीं छोड़ा बल्कि दूसरों को भी मुसीबत के समय सब्र और धीरज रखने के लिए पैग़ाम देती रहीं।
अब्दुल्लाह इब्ने उमैर की बीवी को जब मालूम हुआ कि उनके शौहर शहीद कर दिए गए, आप उनकी लाश के सरहाने बैठीं, और बेताबी और रोने के बजाए उनके बदन पर लगे ख़ून और मिट्टी को साफ़ करते हुए कहती हैं, ऐ इब्ने उमैर जन्नत मुबारक हो।
हज़रत ज़ैनब स.अ. को जिस समय उनके गोद के पाले भतीजे हज़रत अली अकबर अ.स. की शहादत की ख़बर दी गई, जबकि वह ख़बर सुनते ही मरसिया पढ़ रही थीं ऐ मेरे दिल के टुकड़े, ऐ मेरे भय्या के जवान बेटे, ऐ मेरे दिल के सुकून..... लेकिन आप इमाम हुसैन अ.स. के पास जा कर जवान बेटे की शहादत पर उनकी हिम्मत और हौसले को बढ़ा रही थीं।
यही हज़रत ज़ैनब स.अ. थीं जब 11 मोहर्रम को अहले हरम को क़ैद कर के शहीदों की लाशों के किनारे से गुज़ारा जा रहा था और इमाम सज्जाद अ.स. की हालत अपने वालिद की बिना सर और बिना कफ़न की लाश को देख कर काफ़ी नाज़ुक हो गई थी उस समय शहज़ादी ज़ैनब स.अ. उनके पास जा कर कहती हैं कि, ऐ अपने जद और वालिद और भाईयों की आख़िरी निशानी मैं यह क्या हालत देख रही हूं, ख़ुदा की क़सम यह जो कुछ भी देख रहे हो यह अल्लाह और तुम्हारे वालिद और दादा के बीच एक वादा हुआ था उसी को निभाने के लिए मेरे भाई और तुम्हारे वालिद ने यह क़ुर्बानी दी है।
अम्र इब्ने जनादा की मां ने अपने शौहर की शहादत के बाद अपने बेटे को भी मैदान में भेज दिया, फिर अपने बेटे की शहादत के बाद अपने बेटे के कटे हुए सर को ले कर उसे ख़ूब प्यार किया, और फिर उसे दुश्मन की ओर फेक दिया, और यही वहब की मां ने भी किया, और इन दोनों बहादुर और बा हौसला औरतों ने यह कह कर सर को फेका कि हम जो अल्लाह की राह में दे देते हैं उसे वापस नहीं लेते।
इसी तरह जब हज़रत ज़ैनब स.अ. जब अपने चहीते भाई की लाश पर पहुंची तो आपने उनकी लाश को उठा कर अल्लाह की बारगाह में कहा कि ऐ अल्लाह हम अहले बैत अ.स. की इस क़ुर्बानी को क़ुबूल फ़रमा। यही शहज़ादी ज़ैनब स.अ. थीं जो इब्ने ज़ेयाद के दरबार में जब गईं तो उस नजिस इंसान ने आपसे सवाल किया यह जो अल्लाह ने तुम्हारे भाई और तुम्हारे घराने के साथ किया इसके बारे में क्या कहना है? शहज़ादी ने पूरी बहादुरी, सब्र, धीरज और हौसले के साथ फ़रमाया, मैं ने सआदत और नेकी के अलावा कर्बला में कुछ नहीं देखा।
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मैदान में आना कर्बला में औरतों ने अपनी जिस बहादुरी को पेश किया वह आज हर समाज की औरतों के लिए मिसाल है, कर्बला में यज़ीद की ओर से थोपी गई जंग से ले कर मदीना वापसी तक हर क़दम पर औरतों ने जहां सब्र और धीरज दिखाया वहीं ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मैदान में आ कर उसका विरोध भी किया है, जैसे अब्दुल्लाह इब्ने उमैर की बीवी से अपने शौहर की शहादत के बाद इमाम अ.स. की तन्हाई और मुसीबत देखी नहीं गई तो एक ख़ैमे में लगी लकड़ी ही को ले कर मैदान में निकल आईं, लेकिन इमाम अ.स. ने उन्हें रुकने का हुक्म दिया।
इमामत और विलायत की रक्षा को जिस तरह हज़रत ज़ैनब स.अ. और उम्मे कुलसूम स.अ. ने पेश किया है रहती दुनिया तक उसकी मिसाल नहीं मिल सकती, आप सोचें जिसने अपने बेटों को ख़ून में लतपथ देखा हो, अपनी गोद के पाले हुए कड़ियल जवान अली अकबर अ.स. जो शक्ल, सूरत, बातचीत में पैग़म्बर स.अ. की तरह थे उनके सीने में बर्छी का घाव देखा हो, अपने 32 साल के भाई के कटे हुए हाथ और टुकड़े टुकड़े बदन देखा हो और हद तो यह हो गई जिसकी आंखों के सामने उसके भाई के गले को काट दिया गया हो उसके दिल पर कितने ज़ख़्म होंगे, कितना दर्द होगा लेकिन इन सब के बावजूद तारीख़ गवाह है कि न केवल हज़रत ज़ैनब स.अ. और उम्मे कुलसूम स.अ. बल्कि हज़रत रबाब जिन्होंने अपने 6 महीने के बच्चे को प्यास से तड़पता देखा और आख़िर में तीर से शहीद होते देखा या और अहले बैत अ.स. के घराने की दूसरी औरतें, इन लोगों ने किस तरह हर मुसीबत को सहन करते हुए यज़ीद और इब्ने ज़ेयाद के दरबार में उन्हीं के लोगों के बीच उनको ज़लील और बे इज़्ज़त किया और इमामत और विलायत की रक्षा की, जिसके गवाह हज़रत ज़ैनब स.अ. के ख़ुतबे हैं।
अहले बैत अ.स. की रक्षा कर्बला में मौजूद औरतों के बयान से उनका अहले बैत अ.स. की रक्षा को ले कर उनकी कोशिशों को अच्छी तरह ज़ाहिर करता है, जैसाकि जुनादा इब्ने काब की बीवी ने हज़रत जुनादा की शहादत के बाद अपने बेटे को मैदान की ओर रवाना किया उसके बाद वह ख़ुद यह शेर पढ़ती हुई मैदान की ओर चल दीं जिसका तर्जुमा यह है, मैं एक बूढ़ी बे सहारा और कमज़ोर औरत हूं, लेकिन मैं अपने वार से तुम लोगों को मार कर हज़रत ज़हरा स.अ. के बेटे की रक्षा करूंगी।
ज़ुहैर इब्ने क़ैन की बीवी ने ज़ुहैर के हौसले को इस हद तक बुलंद कर दिया था कि वह आशूर के दिन इमाम हुसैन अ.स. से यही कह रहे थे कि अगर हज़ार बार भी मर के ज़िंदा किया जाऊं तब भी अल्लाह और उसके रसूल स.अ. के दुश्मनों से लड़ता रहूंगा ताकि आपकी और आपके अहले बैत अ.स. की जान बचा सकूं।
ज़ख़्मियों की देखभाल कर्बला में एक और अहम काम जो औरतों मे किया वह उन सख़्त हालात में ज़ख़्मियों की देखभाल थी, जैसाकि हज़रत ज़ैनब शबे आशूर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ.स. के पास बैठी उनकी देखभाल कर रही थीं, और इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के बाद जो क़ैद कर के अहले बैत अ.स. के इस क़ाफ़िले पर मुसीबत ढ़हाई गई उसमें भी बच्चों को बहलाने में कर्बला की औरतों का अहम किरदार रहा है, इसी तरह जिस समय ख़ैमों में आग लगाई गई सभी औरतें और बच्चे घबरा कर ख़ैमों से बाहर निकल गए, हज़रत ज़ैनब स.अ. ही वह ख़ातून थीं जिन्होंने जलते ख़ैमे से बीमार इमाम अ.स. को निकाला था।
इमाम सज्जाद स.अ. फ़रमाते हैं कि, हज़रत ज़ैनब स.अ. तमाम परेशानियों के बावजूद कर्बला से शाम तक पूरे ध्यान से सभी भूखे प्यासे बच्चों, बेसहारा औरतों की देखभाल कर रही थीं, एक दिन रास्ते में ही किसी जगह पर वह बैठ कर नमाज़े शब पढ़ रही थीं, मैंने बैठ कर नमाज़ पढ़ने की वजह पूछी तो उन्होंने फ़रमाया, 3 दिन से बच्चों की भूख देख कर अपना खाना भी मैं बच्चों को दे देती हूं, आज बदन में ताक़त नहीं रही इसलिए बैठ कर नमाज़ पढ़ रही हूं।
कर्बला के पैग़ाम को पह़ुंचाना सबसे अहम और मुश्किल काम कर्बला की औरतों का यह था कि कर्बला का पैग़ाम और इमाम हुसैन अ.स. की इन क़ुर्बानियों के मक़सद को सभी लोगों तक पहुंचाए, हालांकि यह सभी औरतें वह थीं जिनमें से किसी ने अपने बेटे को ख़ून में लतपथ देखा था तो किसी ने अपने शौहर का जनाज़ा तो किसी ने अपने भाई की लाश, लेकिन कर्बला की सभी औरतों ने कर्बला के इम्तेहान ख़त्म होने के बाद से मदीने तक अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए हर छोटे बड़े मौक़े का फ़ायदा उठाया और कर्बला के पैग़ाम और इमाम हुसैन अ.स. के मक़सद को सभी लोगों तक पहुंचाया।
हज़रत ज़ैनब स.अ. की तक़रीर और ख़ुत्बे बिल्कुल उनके वालिद इमाम अली अ.स. की तरह एकदम सटीक होते, आप अल्लाह की तारीफ़ और पैग़म्बर स.अ. और इमाम अली अ.स. पर दुरूद और सलवात पढ़ कर इस बात को सबके सामने ज़ाहिर करतीं कि, मुसलमान होने का दावा करने वाले इन ज़ालिमों ने उस इंसान को क़त्ल किया और उन औरतों और बच्चों को क़ैदी बनाया जिन के घर से शरीयत चली।
शहज़ादी ज़ैनब स.अ. ने इसी तरह इब्ने ज़ेयाद के दरबार में जब ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया तो इस तरह शुरू किया कि, उस अल्लाह का शुक्र है कि जिसने हमारे घराने को पैग़म्बर स.अ. जैसा नबी दे कर इज़्ज़त दी, और हर तरह की गंदगी और नजासत को हम से दूर रखा, जो झूठा और मक्कार था वह ज़लील और बे इज़्ज़त हो गया, और ऐ मरजाना की औलाद सुन, झूठा तू और यज़ीद जैसा बद किरदार है हम अहले बैत अ.स. नहीं। सबसे ज़्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि यज़ीद की हुकूमत को बे नक़ाब करने और शहीदों की मुसीबत को दुनिया वालों के सामने लाने के लिए हज़रत ज़ैनब स.अ. ने जो क़दम उठाए उनमें से एक अहम इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी है, आपने मदीना आ कर भी इमाम अ.स. के मक़सद को लोगों तक पहुंचाने की अपनी मुहिम को जारी रखा, और लोगों तक कर्बला के पैग़ाम और कर्बला में कर्बला वालों के जमा होने के मक़सद को एक एक शख़्स तक पहुंचाया।
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