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Date of publication : 15/10/2017 15:30
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अफ्रीक़ा के वहाबी जवान का शिया होना

मेरे वालिद जो वहाबी थे और मेरा दोस्त जो शिया था दोनो के बीच बहुत ज़्यादा फ़र्क़ था, जिसमें सबसे बड़ा यह कि मेरा दोस्त मेरे सवालों से थकता नहीं था हर सवाल का बहुत आराम और हौसले के साथ जवाब देता था, और मुझे शियों मे यह चीज़ सबसे अच्छी लगी, लेकिन मैं अपने वालिद से दीन के बारे में कुछ भी पूछता था वह उसे बिदअत और कुफ़्र कह कर जवाब देने से भागते थे। दूसरा फ़र्क़ यह कि अगर मुझे कोई काफ़िर या मुशरिक कहता था तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आता था, लेकिन मेरे जो मुंह में आया मैंने अपने दोस्त को कहा वह हमेशा हंस के जवाब देता था।

विलायत पोर्टल : डाक्टर सबीती अंगूई, कॉन्गो देश के रहने वाले एक 30 साल के जवान हैं, जो ईरान के क़ुम शहर में अल-मुस्तफ़ा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, वह अपने शहर मोया न दीतो के सबसे पहले शिया हैं। इस शिया जवान आलिम मे बताया कि कॉन्गो की आबादी लगभग 80 मिलियन है, जिसमें 80% कैथोलिक ईसाई और 15% मुसलमान हैं, जिसमें से 10% सुन्नी और 5% शिया हैं। कॉन्गो की सरकारी ज़बान फ़्रेंच है और इस देश के लोग 425 लह्जों में बातचीत करते हैं। कॉन्गो उन देशों में से है जो बहुत अधिक समय तक यूरोपीय साम्राज्य के अधीन रहा है, और आज भी अनेक तरीकों से यूरोपीय साम्राज्य इस देश में दख़ल देता रहता है, लेकिन पिछले 30 साल से शिया फ़िर्क़ा अपने मज़हबी कामों को खुल कर अंजाम दे रहा है।
इस अफ़्रीक़ी जवान ने बताया कि ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के बाद सैय्यद मोहाजिर नाम के राजदूत हमारे देश में आए, और अपनी counseling द्वारा उन्होंने हमारी यूनिवर्सिटी में जगह बनाई, और फिर हमारे जवानों को शिया फ़िर्क़े और उसके विचारों को समझाया, तो इस प्रकार ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की बरकत से शिया मज़हब और शिया अक़ाएद हमारे देश तक पहुंचे। मैं शिया नहीं था, और शिया मज़हब से बेहद नफ़रत करता था, और क्योंकि मैं एक वहाबी घराने में पैदा हुआ था और मेरे वालिद वहाबी मस्जिद में जुमे की नमाज़ पढ़ाते थे इसलिए बचपन से ही यही सीखा था कि शिया काफ़िर होते हैं, और वहाबी अब्दुल वहाब की पैरवी करते हैं और अपने अलावा हर मज़हब को वह काफ़िर कहते हैं। वह अपने अलावा दूसरे सभी मज़हब के ख़ून बहाने को जाएज़ समझते हैं, उनका अक़ीदा यह है कि दूसरे मज़हब के लोगों की जान ले कर अपने को गुनाहों से पाक किया जा सकता है और जन्नत के सभी दरवाज़े भी खुल जाते हैं। वह शियों की ओर झुकाव को बिदअत और कुफ़्र कहते हैं, मैं यह सुन सुन कर बड़ा हुआ हूं कि शिया अली (अ.स.) की पूजा करते हैं इसलिए वह काफ़िर हैं ।
मैंने 2008 में डिप्लोमा किया उसके बाद वालिद के ज़ोर देने पर मुझे यूनिवर्सिटी में दाख़िला लेना था, क्योंकि मेरे शहर में मेडिकल पढ़ाई की सुविधा नहीं थी इसलिए मैं दूसरे शहर जाने पर मजबूर हो गया। मैं जिस यूनिवर्सिटी में था वहां कॉन्गो की सरकार के सेक्युलर होने के कारण केवल 3 या 4 ही मुसलमान थे, मैंने यूनिवर्सिटी में एक मुस्लिम लड़के से दोस्ती कर ली जिसके बाद ही से मेरे शिया होने की शुरुआत हुई। यूनिवर्सिटी ही में अपने एक शिया दोस्त के बारे में यह अफ़्रीक़ी जवान बताता है कि एक दिन हम नमाज़ पढ़ने गए, वुज़ू करते समय मैंने देखा कि उसके और मेरे वुज़ू में काफ़ी फ़र्क़ था, हम वुज़ू में चेहरे, हाथ और पैर को धोते हैं लेकिन मेरे दोस्त ने केवल चेहरा और हाथ धोया लेकिन पैर पर केवल हाथ फेरा, मेरे दिमाग़ में यह सवाल पैदा हुआ कि यह कैसा वुज़ू है, फिर जब नमाज़ के लिए गए तो मैंने देखा कि उसने अपनी जेब से कुछ निकाला बाद में सज्दा करते देख मुझे समझ आया कि यह किस लिए था, मेरे लिए उसका वुज़ू और उसकी नमाज़ बहुत अजीब थी। नमाज़ बाद मैं घर आ गया लेकिन मेरे दिमाग़ में केवल उसका वुज़ू और नमाज़ घूम रहा था, मैंने इरादा किया कि कुछ भी हो कल मैं उससे कहूंगा कि उसका वुज़ू और नमाज़ बातिल है और फिर से नमाज़ पढ़ने के लिए कहूंगा। अगले दिन मैंने उस से कहा कि कल तुम्हारा वुज़ू और नमाज़ ग़लत थी, उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा कर कहा कि मैं शिया हूं और मेरा वुज़ू और नमाज़ सही है।
 शिया शब्द सुनना था कि मुझे ग़ुस्सा आ गया, और उसको पहले से अपने शिया होने को न बताने की वजह से बहुत बुरा भला कहा, और यह भी कहा कि मैंने अपने वालिद से सुना है कि शिया काफ़िर होते हैं। लेकिन मेरे दोस्त ने मेरी पूरी बात को बड़ी विनम्रता से सुना और फिर कहा कि तुम अभी मेडिकल स्टूडेंट हो आगे चल के लोगों की मदद करोगे उनका इलाज करोगे, लेकिन मरने के बाद क़यामत में तुम से यह नहीं पूछा जाएगा कि तुम्हारे बाप क्या क्या करते थे बल्कि तुम से यह पूछा जाएगा कि अपनी जवानी को कैसे अपने दीन के लिए ख़र्च किया। उसकी इस बात से मेरे दिमाग़ में यह ख़्याल आने लगा कि मैं एक मज़हबी घर में पैदा हुआ हूं लेकिन मैंने अपने दीन के बारे में और सच्चाई तक पहुंचने के सिलसिले में कोई तहक़ीक़ नहीं की।
मैंने उस से पूछा तुम क्यों शिया हो कर काफ़िर हो गए, उसने कहा कि तुमको अभी शिया मज़हब के बारे कुछ भी पता नहीं है इसलिए ऐसा कह रहे हो, फिर उसने मुझे एक किताब पढ़ने के लिए दिया जिसमें शिया मज़हब के अक़ाएद उनके विचारों के बारे में विस्तार से लिखा था, मैंने उस किताब को 3 दिन में पढ़ लिया, मुझे उस किताब में ऐसी बातें दिखीं जिसको मैंने कभी अपने वालिद से नहीं सुना था, उस किताब में उन सभी आरोपों को जो शिया मज़हब पर लगाए जाते रहे हैं उनका दलीलों के साथ जवाब दे कर बे बुनियाद साबित किया गया था, लेकिन मुझे उसे पढ़ कर यक़ीन नहीं हुआ, मैंने उस से कहा इस किताब का लिखने वाला शायद शिया था जिसकी वजह से उसने ऐसा लिखा है, मैंने उस से आमने सामने बैठ कर बात करने के लिए कहा ताकि मैं पूरी तरह से यक़ीन कर सकूं, और इस बार उसने मुझे अपना क़ुर्आन दिया, मैंने देखा कि बिल्कुल वैसे ही था जैसे हम लोगों के पास था।
मेरे वालिद जो वहाबी थे और मेरा दोस्त जो शिया था दोनो के बीच बहुत ज़्यादा फ़र्क़ था, जिसमें सबसे बड़ा यह कि मेरा दोस्त मेरे सवालों से थकता नहीं था हर सवाल का बहुत आराम और हौसले के साथ जवाब देता था, और मुझे शियों मे यह चीज़ सबसे अच्छी लगी, लेकिन मैं अपने वालिद से दीन के बारे में कुछ भी पूछता था वह उसे बिदअत और कुफ़्र कह कर जवाब देने से भागते थे। दूसरा फ़र्क़ यह कि अगर मुझे कोई काफ़िर या मुशरिक कहता था तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आता था, लेकिन मेरे जो मुंह में आया मैंने अपने दोस्त को कहा वह हमेशा हंस के जवाब देता था।
आम तौर से वहाबियों का अक़ीदा यह है कि पैग़म्बर स.अ. ने अपनी वफ़ात से पहले किसी को अपनी जानशीन (उत्तराधिकारी) नहीं बनाया, मैंने जब इस बात को अपने दोस्त से बताया उसने गद़ीर की पूरी घटना मेरे सामने बयान कर दी, जिस में पैग़म्बर स.अ. ने इमाम अली अ.स. को ग़दीर में सारी उम्मत के सामने अपना जानशीन बनाया, मैंने जब इस तरह के दस्तावेज़ को देखा तो मैंने शिया होने का इरादा कर लिया। शिया होने के बाद मैंने अपने शिया दोस्त की तरह नमाज़ पढ़ना शुरू कर दिया, उसने मुझे ऐसी दुआएं याद कराईं जिन्हें पढ़ कर मुझे बहुत सुकून और आराम का एहसास होता, उस शिया जवान ने अपने मज़हब की इस तरह तबलीग़ की कि मैं उसका सम्मान करने लगा। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद मैं अपने शहर वापस चला गया और अपने शिया होने को उन लोगों से छिपाए रखा, क्योंकि अगर कह देता कि अहले बैत अ.स. की मोहब्बत मेरे दिल में आ गई तो वह लोग ज़रूर मेरे साथ कुछ ग़लत करते। फिर बहुत सारी मुश्किलें झेलने के बाद मैं ईरान के लिए रवाना हुआ और वहीं पढ़ाई करने लगा।
आख़िर में यह अफ़्रीक़ी जवान कहता है कि शियों को नमाज़ और दूसरी इबादतों की अहमियत को समझना चाहिए, और क्योंकि आज पूरी दुनिया में शियों पर ज़ुल्म हो रहा है उनको तरह तरह से परेशान किया जा रहा है इसलिए उनको अपना सुकून नमाज़ और दुआओं में तलाश करना चाहिए।
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