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Date of publication : 17/10/2017 18:32
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वहाबी द्वारा मजलिस का अपमान और उसका जवाब

यज़ीद का इमाम हुसैन अ.स. का क़त्ल करना ऐसा अमल है जिस से उसका फ़िस्क़ साबित और यक़ीनी हो जाता है, और इमाम हुसैन अ.स. हक़ीक़त में दीन की राह में शहीद हुए हैं जिसका सवाब और बदला अल्लाह उनको देगा।

विलायत पोर्टल :  2 साल पहले 4 नवंबर 2015 को सऊदी के इशारों पर अब्दुल्लाह हैदरी नाम के वहाबी ने एक लाइव टीवी प्रोग्राम पर शियों के अक़ाएद का खुल के मज़ाक़ उड़ाया और अपने बातिल विचारों से जो उस से बन सका उसने कहा, यहां तक कि पैग़म्बर स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अ.स. की याद में मनाई जाने वाली मजलिस को बदकारी का अड्डा तक बताया।
जब कि यह बात सारी दुनिया जानती हैं विशेष कर यह गुमराह वहाबी टोला कि इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी केवल शिया ही नहीं मनाते, बल्कि अहले सुन्नत से लेकर दुनिया भर के हर फ़िर्क़े और मज़हब के लोग इमाम हुसैन अ.स., उनके घर वालों और उनके असहाब की दर्दनाक शहादत पर अपने अपने एतेबार से अपने ग़म को ज़ाहिर करते और इन वहाबियों के पूर्वजों बनी उमय्या के अत्याचारों पर उनकी घोर निंदा करते है। इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी के जायज़ होने पर बात करने से पहले इस बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि सारे मुसलमान पैग़म्बर स.अ. के अमल को ज़िंदगी के हर मोड़ पर अंतिम फ़ैसला मानते हैं, इस बात को सभी मुसलमान क़बूल करते हैं।
अहले सुन्नत की किताबों के अनुसार इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी का इतिहास कोई नया नहीं है बल्कि पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी में भी इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी का ज़िक्र मिलता है, अहले सुन्नत की बड़ी और अहम किताबों में मिलता है कि पैग़म्बर स.अ. ने इमाम हुसैन अ.स. कि विलादत के बाद आपकी दर्दनाक शहादत की ख़बर सुनाई और बहुत देर तक रोए। उम्मे सलमा बयान करती हैं कि जिब्रईल पैग़म्बर स.अ. के पास आए उस समय इमाम हुसैन अ.स. मेरे पास थे, अचानक इमाम हुसैन अ.स. रोने लगे, पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया लाओ मुझे दे दो, आप ने इमाम हुसैन अ.स. को अपनी गोदी में ले कर सीने से लगा लिया, जिब्रईल ने इस मंज़र को देख कर पैग़म्बर स.अ. से पूछा क्या इमाम हुसैन अ.स. से बहुत ज़्यादा मोहब्बत करते हैं? पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हां बिल्कुल, जिब्रईल ने कहा, बहुत जल्द आपकी उम्मत उन्हें शहीद कर देगी, क्या जिस जगह आपके नवासे को शहीद किया जाएगा वहां की ख़ाक आपके दिखाऊं? आपने फ़रमाया हां, जिब्रईल ने उसी समय अल्लाह के हुक्म से कर्बला का मैदान आपको दिखाया, जब आप उस हालत से बाहर आए तो आपके हाथ में कर्बला की मिट्टी थी जो लाल थी। (तज़किरतुल ख़वास, सिब्ते इब्ने जौज़ी, बा तहक़ीक बह्रुल उलूम, पेज 250, मुसनदे अहमद, जिल्द 4, पेज 126-127, तारीख़े दमिश्क़, पेज 168)
अहले सुन्नत के मशहूर इतिहासकार और उनके हिसाब से रिवायत के सही और ग़लत की ज़बरदस्त परख रखने वाले इब्ने साद से नक़्ल है कि, इमाम अली अ.स. अपने किसी सफ़र में कर्बला से गुज़र रहे थे, जब आप नैनवा के क़रीब पहुंचे तो अपने साथियों से पूछा इस जगह को क्या कहते हैं, किसी ने बताया इसे कर्बला कहा जाता है, इमाम अली अ.स. कर्बला का नाम सुनते ही वहीं बैठ कर रोने लगे, यहां तक कि आप के आंसुओं से आपकी दाढ़ी और ज़मीन का कुछ हिस्सा तर हो गया, फिर आपने फ़रमाया कि एक दिन मैं पैग़म्बर स.अ. के पास गया तो आप उस समय रो रहे थे, मैंने रोने का कारण पूछा तो आपने फ़रमाया, कुछ देर पहले जिब्रईल मेरे पास आए थे, वह मुझे ख़बर दे कर गए कि मेरे बेटे हुसैन अ.स. को फ़ुरात के किनारे शहीद किया जाएगा, और उस जगह को कर्बला कहा जाता है, फिर मुझे जिब्रईल ने वहां की ख़ाक दी जिसको सूंघ कर मैं अपने आंसुओं को न रोक सका। (तज़किरतुल ख़वास, पेज 50, तहज़ीबुत तहज़ीब, इब्ने हजर असक़लानी, जिल्द 2, पेज 300, मजमउज़-ज़वाएद, अबू बक्र अल-हैसमी, जिल्द 9, पेज 187)
इसी तरह अधिकतर सुन्नी उलमा और विद्वानों ने कर्बला के दर्दनाक हादसे को अपनी किताबों में लिख कर इमाम हुसैन अ.स. के इस क़दम पर सहमति जता कर समर्थन करते हुए यज़ीद को ज़ालिम और इमाम अ.स. का क़ातिल लिखा है, यहां तक कुछ ने तो माविया तक की ग़लतियों को भी ज़िक्र किया है। अबुल हसन अशअरी लिखते हैं कि जब यज़ीद के ज़ुल्म और अत्याचार हद से आगे बढ़ गए, तब इमाम हुसैन अ.स. ने अपने साथियों के साथ मिल कर कर्बला के मैदान में आ कर उसके अत्याचार का सामना करते हुए अपनी शहादत पेश की। (मक़ालातुल इस्लामिय्यीन व एख़तेलाफ़ुल मुसल्लीन, पेज 45)
अबुल फ़लाह हंबली का कहना है कि इमाम हुसैन अ.स. के घराने के 16 ऐसे लोग जिनके जैसा उस समय कोई नहीं था इमाम अ.स. के साथ शहीद हो गए, ख़ुदा इन लोगों को शहीद करने वालों और क़त्ल का हुक्म देने वाले और उनके क़त्ल के हुक्म पर सहमति जताने वालों को ज़लील करे। (शज़रातुज़ ज़हब मिन अख़बारिन मिन ज़हब, जिल्द 2, पेज 67) इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि, यज़ीद का इमाम हुसैन अ.स. का क़त्ल करना ऐसा अमल है जिस से उसका फ़िस्क़ साबित और यक़ीनी हो जाता है, और इमाम हुसैन अ.स. हक़ीक़त में दीन की राह में शहीद हुए हैं जिसका सवाब और बदला अल्लाह उनको देगा। (मोक़द्दम-ए-इब्ने ख़ल्दून, तर्जुमा मोहम्मद रवीन गनाबादी, जिल्द 1, पेज 417)
इब्ने ख़ल्दून ने यज़ीद को ज़ालिम बताते हुए इमाम अ.स. के कर्बला आने को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ क़दम उठाना लिखते हुए यज़ीद को अदालत से दूर बताया है। (मोक़द्दम-ए-इब्ने ख़ल्दून, तर्जुमा मोहम्मद रवीन गनाबादी, जिल्द 1, पेज 417) ...............................


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