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Date of publication : 25/10/2017 18:43
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इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की बरकतें

इमाम हुसैन अ.स. अपने ज़ाएरीन की ओर देखते हैं, उनमें से जिस की भी आंख से उनके लिए आंसू निकल रहे होते हैं आप उन लोगों की गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ करते हैं, और इमाम अ.स. अपने वालेदैन से भी अपने उस ज़ाएर की मग़फ़ेरत की दुआ करने के लिए कहते हैं, फिर इमाम हुसैन अ.स. फ़रमाते हैं कि अगर मेरा ज़ाएर मिलने वाले सवाब और अज्र को जान जाए तो हमारी मुसीबत पर रोने से ज़्यादा मिलने वाले सवाब पर ख़ुश होगा।


विलायत पोर्टल :  हमारे दिलों में सभी मासूमीन अ.स. का बेहद सम्मान है, इन हस्तियों की जिसको जितनी मारेफ़त होगी उतना दिलों में सम्मान बढ़ता जाएगा, लेकिन इन सभी हस्तियों में इमाम हुसैन अ.स. की वह हस्ती है जिनके लिए आपके चाहने वाले जुनून की हद तक पहुंचे हुए हैं, क्योंकि आपने कर्बला के जलते मैदान में दीन के लिए जो कारनामा अंजाम दिया उसकी आज तक कोई मिसाल दिखाई नहीं देती। आज के समय में क्योंकि हम उनके वुजूद की बरकतों से महरूम हैं इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि उनकी क़ब्र पर जा कर उनको वसीला बना कर अल्लाह से दुआ करें यह उस घराने के हैं जिनके नाम पर मांगने वालों को अल्लाह ख़ाली हाथ वापस नहीं लौटाता।
इमाम रज़ा अ.स. फ़रमाते हैं कि, हर इमाम अ.स. का उनके चाहने वालों की गर्दन पर हक़ होता है जिसको उनके चाहने वालों को उनकी क़ब्रों की ज़ियारत कर के अदा करना चाहिए, और जो भी उनके सम्मान को ध्यान में रखता हुआ उनकी ज़ियारत को जाएगा क़यामत में उनकी शफ़ाअत उसको नसीब होगी। दूसरी ओर अगर हम इमामों के ज़ियारत नामों में ध्यान दें और उसको पूरे ध्यान से पढ़ें तो उसमें अल्लाह के भेजे गए नबियों और उसके वलियों का ज़िक्र मिलेगा, ज़ियारते आशूरा और दूसरी ज़ियारतों को ध्यान से पढ़ने से एक बात साफ़ हो जाती है कि इमामों ने इन ज़ियारतों द्वारा मोमिन और दीन के अहकाम के पाबंद चाहने वालों की तरबियत करनी चाही है, इसीलिए अपने चाहने वालों को ज़ियारत द्वारा यह तालीम दी कि अल्लाह से हुसैन अ.स. जैसी ज़िंदगी और हुसैन अ.स. जैसी मौत और इस दुनिया में और आख़ेरत में उन्हीं का साथ मागों।
اللهم اجعل محیای محیا محمد و آل محمد ، و مماتی ممات محمد و آل محمد ... و ان یجعلنی معکم فی الدنیا و الاخره
इमाम सादिक़ अ.स. से सवाल किया गया कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करने वाले का सबसे कम असर क्या है? आपने फ़रमाया, सबसे कम असर और बरकत यह है कि अल्लाह उसके माल, और उसके घर वालों को हर बुरे समय से बचाएगा ताकि वह अपने घर वापस पहुंच सकें, और क़यामत में भी अल्लाह उसको अपने अज़ाब से बचाएगा। (सवाबुल आमाल, शैख़ सदूक़, पेज 116)
इस दुआ और उम्मीद के साथ किअल्लाह हम सबको इस दुनिया में इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की तौफ़ीक़ दे और क़यामत में उनकी शफ़ाअत नसीब करे, हम यहां पर उनकी ज़ियारत से अपनी ज़िंदगी में होने वाले असर और प्रभाव को बयान करेंगे।
ज़ाएर के नफ़्स को सुकून पहुंचाना ज़ियारत के अंदर सबसे अहम जो पहलू है वह इंसान के आकर्षण को बढ़ाना है, इसका मतलब यह है कि इंसान उसी ज़ियारत को पढ़ते पढ़ते उसके नफ़्स और उसके दिल की जो भी मुश्किलें और परेशानियां होती हैं सब अल्लाह की बारगाह मे कह देता है, ज़ाएर इसी ज़ियारत के माध्यम से अहले बैत अ.स. को वसीला बनाते हुए अल्लाह की बारगाह में अपने को क़रीब करता है और फिर उनको वसीला बना कर अल्लाह से दुआ करते हुए अपनी मुश्किलों का हल भी मांगता है, यही कारण है कि ज़ियारत के बाद ज़ाएर अपने नफ़्स और अपने दिल जो परेशानियों और मुश्किलों से भरा हुआ था उसे ख़ाली महसूस करता है, यही वह सुकून है जो हमें ज़ियारत के माध्यम से इमामों की क़ब्रों पर जा कर हासिल होता है।
ख़ुदा की पनाह का एहसास इस हदीस को पहले भी नक़्ल किया जा चुका है कि इमाम सादिक़ अ.स. से सवाल किया गया कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करने वाले का सबसे कम असर क्या है? आपने फ़रमाया, सबसे कम असर और प्रभाव यह है कि अल्लाह उसके माल उसके घर वालों को हर बुरे समय से बचाएगा ताकि वह अपने घर वापस पहुंच सकें, और क़यामत में भी अल्लाह उसको अपने अज़ाब से बचाएगा। (सवाबुल आमाल, शैख़ सदूक़, पेज 116)
ख़ुदा के वुजूद का एहसास ज़ैद इब्ने शह्हाम का बयान है कि मैंने इमाम सादिक़ अ.स. से पूछा कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के बारे में आपका क्या कहना है? आपने फ़रमाया कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करने वाला उस इंसान जैसा है जिसने आसमान पर जा कर अल्लाह के वुजूद को महसूस किया हो। इब्ने शह्हाम कहते हैं कि फिर मैंने पूछा, मौला आपकी ज़ियारत के बारे में क्या कहना है? इमाम अ.स. ने फ़रमाया कि मेरी ज़ियारत करना ऐसा है जैसे किसी ने पैग़म्बर स.अ. की ज़ियारत की हो। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 281)
परेशानियों का दूर होना इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया, तुम लोगों के बीच एक ऐसे शख़्स की क़ब्र है जिसकी ज़ियारत को जाने वाले के क़रीब आई हर परेशानी दूर हो जाती है, उसकी हर ज़रूरत पूरी हो जाती है। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 337)
इसी तरह आपने अबू सबाह कनानी से फ़रमाया, बेशक तुम्हारे बीच ऐसे शख़्स की क़ब्र है जिस पर जाने वाले हर परेशान और दुखी इंसान की मुश्किलों को अल्लाह दूर कर देता है, उसकी ज़रूरतों को पूरा कर देता है, और अल्लाह ने उनकी क़ब्र पर चार हज़ार फ़रिश्तों को इमाम हुसैन अ.स. की शहादत से क़यामत तक तैनात कर रखे हैं जो उन पर आंसू बहाते हैं, और जो उनकी ज़ियारत को जाता है वापसी पर उसके घर तक ख़ुदा हाफ़िज़ी के लिए जाते हैं, और अगर वह बीमार हुआ तो उसको देखने के लिए जाते हैं और अगर कोई मर गया तो उसके जनाज़े को कांधा देने जाते हैं। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 337)
रोज़ी और उम्र का बढ़ना इमाम बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया, हमारे शियों को इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र की ज़ियारत का हुक्म दो, क्योंकि उनकी ज़ियारत रोज़ी और उम्र के बढ़ने का कारण है, और इंसान की ज़िंदगी से हर तरह की मुश्किल और परेशानियों को दूर कर देती है। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 289) गुनाहों की मग़फ़ेरत इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया कि, जो शख़्स भी इमाम हुसैन अ.स. की उनके हक़ की मारेफ़त रखते हुए और उनकी इमामत को दिल से मानते हुए ज़ियारत करे अल्लाह उसके पिछले और आने वाले सभी गुनाह को माफ़ कर देगा। (काफ़ी, शैख़ कुलैनी, जिल्द 4, पेज 582)
इसी तरह जाबिर जोफ़ी की एक बहुत लंबी रिवायत में इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल हुआ है कि जब तुम इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत कर के वापस होते हो तो एक आवाज़ आती है अगर तुम वह आवाज़ सुन लो तो पूरी उम्र इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र पर गुज़ार दोगे, आवाज़ देने वाला कहता है कि ऐ अल्लाह के बंदे मुबारक हो तुमने बहुत बड़ा फ़ायदा हासिल किया और अपने दीन को महफ़ूज़ कर लिया, तुम्हारे पिछले सभी गुनाह माफ़ कर दिए गए। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 295)
इमाम हुसैन अ.स. की ख़ास नज़र इमाम सादिक़ अ.स. से हदीस है कि, इमाम हुसैन अ.स. अपने ज़ाएरीन की ओर देखते हैं, उनमें से जिस की भी आंख से उनके लिए आंसू निकल रहे होते हैं आप उन लोगों की गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ करते हैं, और इमाम अ.स. अपने वालेदैन से भी अपने उस ज़ाएर की मग़फ़ेरत की दुआ करने के लिए कहते हैं, फिर इमाम हुसैन अ.स. फ़रमाते हैं कि अगर मेरा ज़ाएर मिलने वाले सवाब और अज्र को जान जाए तो हमारी मुसीबत पर रोने से ज़्यादा मिलने वाले सवाब पर ख़ुश होगा। (अमालिए शैख़ तूसी, पेज 55)
इसी तरह इमाम हुसैन अ.स. फ़रमाते हैं कि जो शख़्स अपनी ज़िंदगी में मेरी ज़ियारत करने आएगा उसके मरने के बाद मैं उसकी ज़ियारत को जाऊंगा। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी, जिल्द , पेज 16)
अल्लाह की रहमत का शामिल होना इमाम सादिक़ अ.स. से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के सवाब के बारे में पूछा कि अगर कोई बिना किसी घमंड और तकब्बुर के इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत करने जाए तो उसका क्या सवाब है? आप ने फ़रमाया, उसके लिए एक हज़ार अल्लाह की बारगाह में क़ुबूल हुए हज और उमरे का सवाब है, और अगर वह आख़ेरत में नाकाम होगा तो इस ज़ियारत के नतीजे में कामयाब हो जाएगा और वह हमेशा अल्लाह की रहमत उसकी ज़िंदगी में शामिल होगी। (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 328)
मासूमीन अ.स. की दुआ में शामिल होना माविया इब्ने वहब इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल करते हैं कि इमाम अ.स. ने फ़रमाया, ऐ माविया इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत को डर के कारण मत छोड़ना, क्योंकि डर की वजह से ज़ियारत छोड़ देने पर ऐसा अफ़सोस होगा कि उनके पहलू में क़ब्र बनाने की तमन्ना करोगे, क्या तुमको यह पसंद नहीं कि पैगंम्बर स.अ. इमाम अली अ.स. हज़रत ज़हरा स.अ. और सभी मासूमीन अ.स. तुम्हारे लिए दुआ करें? (मुन्तख़ब कामिलुज़-ज़ियारात, इब्ने क़ौलवैह, पेज 199)
पैग़म्बर स.अ. इमाम अली अ.स. और हज़रत फ़ातिमा स.अ. के पड़ोस में जगह मिलना इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया, जो भी चाहता है कि उसे पैग़म्बर स.अ. इमाम अली अ.स. और हज़रत फ़ातिमा स.अ. के पड़ोस में जगह मिले उसको इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत नहीं छोड़नी चाहिए। (वसाएलुश-शिया, शैख़ हुर्रे आमुली, जिल्द 10, पेज 23)
इसी तरह पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया कि मैं अहद करता हूं कि क़यामत में इमाम हुसैन अ.स. के ज़ाएर से मुलाक़ात के साथ साथ उसकी मदद करूंगा, और क़यामत की कठिन और सख़्त जगहों से उसे बचा कर जन्नत में दाख़िल करवाऊंगा। जहन्नम की आग से छुटकारा इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया जो भी इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत केवल अल्लाह के लिए करेगा, अल्लाह उसको जहन्नम की आग, और क़यामत के अज़ाब के डर से बचाएगा, और अल्लाह से नेक दिल और पाक ईमान के साथ की जाने वाली हर दुआ क़ुबूल होती है। (वसाएलुश-शिया, शैख़ हुर्रे आमुली, जिल्द 10, पेज 324) .............................


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