Tuesday - 2018 June 19
Languages
Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 190406
Date of publication : 11/11/2017 17:4
Hit : 2599

कौन है वह वहाबी परिवार जिसे हुसैन अ. ने हुर की तरह अपना बना लिया?

इस लेख में एक ऐसी औरत के इंटरव्यू को पेश किया जा रहा है कि जिसने जब इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाले ज़ुल्म के बारे सुना तो उसका दिल बेचैन हो गया

इमाम हुसैन अ.स. के मसाएब सुन कर शिया होने वाला इंडोनिशाई वहाबी परिवार
विलायत पोर्टलः इस लेख में एक ऐसी औरत के इंटरव्यू को पेश किया जा रहा है कि जिसने जब इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाले ज़ुल्म के बारे सुना तो उसका दिल बेचैन हो गया, उसकी सोई हुई अंतरात्मा जाग उठी और उसने शिया मज़हब क़बूल कर लिया। उसका कहना है कि एक बार मेरे कानों में एक मजलिस की आवाज़ पहुंची जिसमें इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाली मुसीबत को बयान किया जा रहा था, मैं सुन कर कांप गई, उससे पहले मेरे दिमाग़ में वहाबियत के विश्वास व अक़ाएद ही थे, जबकि मेरे पति शिया मज़हब क़ुबूल कर चुके थे, वह मुझसे शिया अक़ाएद के बारे में बताते, मुझे उनके सही होने का यक़ीन था लेकिन उसको क़ुबूल नहीं कर पा रही थी, कि तभी मेरे दिल में ईमान का चिराग़ रौशन हो गया।
यह बयान इंडोनेशिया की रहने वाली सीती वरदा अल-जन्नत का है, जिनके शौहर पहले ख़ुद शिया हुए फिर उनसे शिया मज़हब क़ुबूल करने को कहा, वह पहले क़ुबूल करने को तैय्यार नहीं थी, लेकिन बाद में क़ुबूल कर लिया, वह उस समय तक वहाबियत का प्रचार कर रही थीं और उन्होंने सोंचा भी नहीं था कि कभी शिया अक़ाएद को अपनाएंगी, लेकिन अब उनका बयान है कि शिया मज़हब अपना कर उनको जो सुकून और आराम मिला है उसे वह किसी दूसरी चीज़ से बदलने का तैयार नहीं हैं, और वह अपने आपको इमाम हुसैन अ.स. का क़र्ज़दार समझती हैं, उनके पति अहमद मरज़ूक़ी जो PHD कर रहे हैं उनका भी कहना है कि हम अल्लाह की इस नेमत पर शुक्र अदा करते हैं।
अब हम उनके इंटरव्यू का कुछ भाग यहां पेश कर रहे हैं।
जब उनसे पूछा गया कि क्या आप शादी से पहले शिया हो चुके थे, तो अहमद मरज़ूक़ी ने बताया कि शादी से पहले सुन्नी मज़हब था, और उस समय मैंने ईरान के इंक़ेलाब के बारे में सुना और इमाम ख़ुमैनी र.अ. की ओर काफ़ी आकर्षित हुआ और उनके विचारों को जानने के लिए उनकी किताबें पढ़ना शुरू कीं, उसी समय से मेरे अंदर शिया मज़हब की ओर झुकाव पैदा हो गया था लेकिन मैं शादी के समय शिया नहीं हुआ था।
यही सवाल जब उनकी बीवी से पूछा गया तो उन्होने कहा कि वह शादी से पहले वहाबी थीं, और सोंचा भी नहीं था कभी कि मैं शिया मज़हब क़ुबूल करूंगी, और शादी के समय यह तो पता था कि मेरी शादी जिससे हो रही है वह शिया मज़हब के बारे में खोज कर रहे हैं लेकिन यह नहीं सोंचा था कि वह शिया हो जाएंगे, मेरा कॉलेज जो कि वहाबियों का था वहां टीचर्स आदि क्लास के अलावा हम लोगों को बिठा कर वहाबियत के विचारों को बताते थे जिसके चलते मेरे अंदर थोड़ी थोड़ी कट्टरता आने लगी थी।
जब सीती वरदा अल-जन्नत और उनके पति से उनके शिया होने के बारे में पूछा गया तो सीती वरदा ने बताया कि हमारी शादी को कुछ समय बीत चुका था तब मुझे समझ में आया कि मेरे शौहर शिया मज़हब से काफ़ी प्रभावित हैं, और उनके विचारों के बारे में अध्धयन कर रहे हैं, उनको भी मालूम हो चुका था कि मेरा झुकाव वहाबियत की ओर है, मेरे परिवार वाले इस विषय को लेकर डरे हुए थे, मेरी ख़ाला का बेटा जो मेरे पति का दोस्त था उसने मेरे पति से इस विषय को लेकर बात की, मेरे परिवार वाले इसलिए चिंतित थे क्योंकि वहाबियत के विचारों के अनुसार बहुत सारी जाएज़ चीज़ें भी हराम हैं जैसे घर में टीवी का रखना, सरकारी नौकरी करना और भी बहुत चीज़ें इसी तरह हैं, तो ऐसे में आने वाले समय में मेरे और मेरे पति के बीच बहस और तकरार लाज़मी थी, अभी थोड़ा समय ही बीता था कि मेरे पति ने शिया होने का ऐलान कर दिया, अब आप ख़ुद सोंचिए मैं एक वहाबी विचारों की होकर जिसने सालों शियों के विरुध्द लेक्चर और तक़रीरें सुनी हो कैसे एक शिया के साथ ज़िंदगी गुज़ार सकती थी, मेरे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं।
हमारी कई बार आपस में बहस हुई, अधिकतर मुझे उनके विचारों से तकलीफ़ होती थी, मेरे पति मुझे बार बार शियों की किताबें पढ़ने के लिए कहते, शियों की लॉजिकल बातों और सही विचारों को मेरे लिए बयान करते थे और मुझसे हमेशा यही कहते कि जो बातें वह बताते हैं मैं उन पर ध्यान दूं उनके बारे में सोंचूं, मैंने भी कुछ दिनों बाद उनकी बातों पर ध्यान देना और उनके बारे में सोंचना शुरू कर दिया, कुछ दिन सोंचने के बाद मेरे पति की बातें की बातें मेरे दिमाग़ से निकल ही नहीं रही थीं, मैंने बहुत सोंचा लेकिन अपने पति की बातों का कोई जवाब न दे सकी।
जब यह पूछा गया कि कब तक यह हालात चलते रहे तो इस पर उन्होंने कहा यह सब काफ़ी दिनों तक चलता रहा फिर एक दिन मेरे पति ने मुझे एक सी डी सुनने के लिए दी, मैंने पूछा सी डी में क्या है, उन्होंने कहा सुनो इसको, मैं आज तक उस दिन को भूल नहीं पाई, मैंने सी डी सुनने के लिए लगाई, उसमे  इमाम हुसैन अ.स. के मसाएब थे, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हो रहा है, ऐसा लग रहा कि ख़ुदा हमारे दिल में ईमान के नूर को डाल रहा है, मुझ से इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमियत सुन कर रहा नहीं गया, और मैंने सच्चे दिल से शिया मज़हब को क़ुबूल कर लिया, और उसी दिन से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारते आशूरा पढ़ने की पाबंद हो गई, और अब मेरा अक़ीदा यह है कि अगर इमाम हुसैन अ.स. न होते तो शिय मज़हब बाक़ी न रहता, मेरी नज़र में मुर्दा अंतरात्मा का दोबारा ज़िंदा करने का नाम हुसैन अ.स. है, क्योंकि मेरे पति की इतनी दलीलें वह काम नहीं कर सकीं जो इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमियत के बयान ने कर दिखाया, मेरे पति का भी यही कहना है कि मेरी हिदायत पाने में भी इमाम हुसैन अ.स. की अहम भूमिका है।
फिर उन्होंने यह भी बताया कि, इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी के प्रभाव से वहाबी हैरान हैं, यहां तक कि कुछ साल पहले इंडोनेशिया जैसे देश में जो कि शांतिपूर्वक देश है वहाबियों के एक गिरोह ने डंडे, तलवारों और चाक़ुओं से एक मजलिस में आए मोमेनीन पर हमला कर दिया था, और उन वहाबियों ने हुकूमत में अपनी पहुंच का प्रयोग करते हुए अज़ादारी को बंद भी करवा दिया था।


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :