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Code : 190684
Date of publication : 2/12/2017 15:39
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इमाम ख़ुमैनी र.ह. की निगाह मे एकता का महत्व

बनी उमय्या और बनी अब्बास की हुकूमतों ने अपनी पूरी ताक़त और पूरे ख़ज़ाने शिया सुन्नी मतभेद पैदा कराने में झोंक दिए, वहीं से इस मतभेद की बुनियाद रखी गई और यही शुरूआती मतभेद कारण बने कि शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़ों की आम जनता एक दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में एक दूसरे से दूर होते चले गए


विलायत पोर्टल :  इमाम ख़ुमैनी र.ह. शिया और सुन्नी एकता की अहमियत को बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि, अगर मुसलमानों में एकता पाई जाती तो आज विदेशी ताक़तें हम पर हुकूमत न करतीं, मुसलमानों के आपसी फूट और इनके बीच पाए जाने वाले आपसी मतभेद की देन है कि साम्राज्यवादी शक्तियां हम पर हावी होती जा रही हैं, यह मुसलमानों का आपसी भेदभाव ही है जो कुछ जाहिलों द्वारा शुरू हुआ जिसका शिकार आज तक हम लोग हैं, सभी मुसलमानों पर आपसी एकता बनाए रखना वाजिब है।
इमाम ख़ुमैनी र.ह. ईरान की मिसाल देते हुए कहते हैं कि, इस समय हमारे ही देश को देख लीजिए ऐसे मोड़ पर खड़ा है कि या साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल में फसा रहें या अपने को इन नापाक ताक़तों के क़ब्ज़े से आज़ाद कराएं, लेकिन ध्यान रहे अगर आपसी एकता को बाक़ी न रखा गया तो हम कभी इन विदेशी ताक़तों के चंगुल से आज़ाद नहीं हो सकते। आप फ़रमाते थे कि इस्लाम में शिया सुन्नी के बीच किसी तरह का कभी भेदभाव नहीं रहा, इसलिए आज भी कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, हम सब के लिए एकता और इत्तेहाद का बाक़ी रखना ज़रूरी है क्योंकि हमारे इमामों ने आपसी एकता पर बहुत ज़ोर दिया है, और ध्यान रहे अगर कोई इस आपसी एकता को भंग करना और तोड़ना चाहे तो या वह जाहिल है या उसे ऐसा करने के लिए साम्राज्यवादी देशों की ओर से रक़म मिली है।
आप सुन्नी भाईयों से कहते थे कि हमारे सुन्नी भाईयों को इस्लाम दुश्मन देशों की ओर से नफ़रत फ़ैलाए जाने वाले प्रचारों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए, हम उनके भाई हैं वह हमारे भाई हैं।
इमाम ख़ुमैनी र.ह. फ़रमाते हैं कि दोनों फ़िर्क़ों के बीच पाये जाने वाले इस भेदभाव की जड़ इस्लाम के शुरूआती दौर में है, जिसमें बनी उमय्या और बनी अब्बास की हुकूमतों ने अपनी पूरी ताक़त और पूरे ख़ज़ाने शिया सुन्नी मतभेद पैदा कराने में झोंक दिए, वहीं से इस मतभेद की बुनियाद रखी गई और यही शुरूआती मतभेद कारण बने कि शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़ों की आम जनता एक दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में एक दूसरे से दूर होते चले गए, जबकि देखा जाए तो उस दौर में न सुन्नी पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत पर अमल कर रहे थे और न ही शिया अहलेबैत अ.स. की सुन्नत पर, क्योंकि हमारे इमाम अ.स. उनके यहां अगर कोई मर जाता था उसके जनाज़े में शामिल होते थे, उनकी नमाज़ों में जाते थे, लेकिन जैसे जैसे बनी उमय्या और बनी अब्बास की हुकूमत मज़बूत होती गई यह दोनों फ़िर्क़ें आपस में दूर होते चले गए।
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