Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 190710
Date of publication : 3/12/2017 17:19
Hit : 1311

आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में एकता

इस दुनिया में एक अरब से अधिक इंसान हैं जो अल्लाह, पैग़म्बर स.अ., नमाज़, रोज़ा, हज, काबा, क़ुर्आन और बहुत से दीनी अहकाम के बारे में एक ही अक़ीदा रखते हैं, इन मे से कुछ लोग आ कर कुछ मामलों में मतभेद करें एक दूसरे से जंग करें ताकि जो अल्लाह और उसके रसूल के विरोधी लोग हैं वह मुसलमानों से अपनी दुश्मनी अच्छे से निभा सकें क्या यह बुध्दिमानी है?


विलायत पोर्टल :  इस्लामी फ़िर्क़ों में एकता एक पवित्र नारा है, इस बात में कोई शक नहीं कि आज अगर पैग़म्बर स.अ. होते तो हम सब को एकता की ओर दावत देते, हर तरह के मतभेद और आपसी फूट से रोकते, हम अगर पैग़म्बर स.अ. से मोहब्बत करते हैं तो हमें चाहिए उनकी इस आरज़ू और चाहत को पूरा करें। यह इस्लामी जगत के सबसे महान लीडर और एकता और इत्तेहाद के सबसे बड़े प्रचारक आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान का एक टुकड़ा है, हम इस लेख में एकता की अहमियत और ज़रूरत को आपकी निगाह से बयान करेंगे।
इस्लामी फ़िर्कों में एकता, समय की ज़रूरत सभी इस्लामी फ़िर्क़ो को चाहिए कि एक दूसरे का हाथ थाम कर इस्लाम के बड़े लक्ष्य और आदर्शों को पूरा करने एक दूसरे का सहयोग करें, हमारे दुश्मन की दिली चाहत है कि इस्लामी फ़िर्क़ों में फूट डाल कर उन्हें एक दूसरे के आमने सामने खड़ा करके तमाशा देखे, हम में से किसी को भी दुश्मन की इस मक्कारी और शातिर चाल का शिकार नहीं होना चाहिए, वह शियों को सुन्नियों, सुन्नियों को शियों के मुक़ाबले खड़ा करने की घटिया मानसिकता रखते हैं ताकि इन लोगों के दिलों में एक दूसरे के विरुध्द नफ़रत पैदा हो सके।
अक़ीदों का अपमान इस्लामी सिस्टम का विरोध मैं इस बात पर ज़ोर दे कर कहता हूं कि इस्लामी सिस्टम और मेरे, दोनों के हिसाब से ख़तरे का निशान, किसी के भी मज़हब से जुड़े लोगों और जगहों का अपमान है, जो भी अपनी जेहालत के कारण हो या कट्टरता के कारण चाहे सुन्नी हो या शिया अगर वह एक दूसरे के अक़ीदों और उसके अक़ीदे से जुड़े लोगों का अपमान करता है तो वह जान ले कि वह हमारे दुश्मन का सबसे अच्छा खिलौना है, दुश्मन के खिलौने ऐसा करने वाले लोग ही हैं, यही ख़तरे का निशान है, शिया सुन्नी जो भी अपने मज़हबी प्रोग्राम करते हैं और अपने अपने रस्मो रिवाज के हिसाब से अपनी आदतों के हिसाब से दीनी काम करते हैं बेशक उन्हें करना चाहिए लेकिन इस ख़तरे के निशान को ध्यान में रखना चाहिए कि कहीं हमारे प्रोग्रामों में जान बूझ कर या अंजाने में एक दूसरे के अक़ीदों और मज़हबी शख़्सियतों के विरुध्द कोई अपशब्द किसी तरह की कोई अपमानित भाषा का प्रयाग न हो, क्योंकि यही वह चीज़ है जिस पर हमारा दुश्मन करोड़ों डॉलर ख़र्च कर रहा है और हम अपनी जेहालत और नादानी की कारण फ़्री में उसका काम कर रहे हैं।
शिया सुन्नी भेदभाव से दुश्मन का दुरुपयोग जो लोग शिया सुन्नी एकता की बात करते हैं वह मुसलमानों के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि वह मुसलमानों के दोस्त हैं और उनकी भलाई चाहते हैं, उनका मक़सद यह है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों की निगाह में एक दूसरे का सम्मान और आपसी भाईचारा हमेशा बना रहे, मुझे कोई बताए कि इसका क्या फ़ायदा है कि अलग अलग फ़िर्क़े के मुसलमान एक दूसरे के सामने दुश्मन बन कर खड़े हो कर एक दूसरे को तकलीफ़ पहुंचाएं, दूसरी ओर से दुश्मन आ कर दोनों गिरोह को घेर कर मार दे, क्या यह सही है? अगर आज हमारा कहना है कि शिया सुन्नी एकता बनाए रखें, तो इसका मतलब यह है कि शिया शिया रह कर और सुन्नी सुन्नी रह कर एक दूसरे के हाथ को थामे रहें, हमने यह कब कहा कि शिया सुन्नी एकता का मतलब यह है कि सभी सुन्नी शिया हो जाएं, जिसको शिया होना है वह अपनी मर्ज़ी से हो हमारे आलिमों की किताबें पढ़ कर उनसे बहस करने के बाद हो, हम यह कभी नहीं कहते कि सुन्नी अपने मज़हब को बदल दें, हमारा कहना यह है कि शिया सुन्नी हमेशा अक़्ल का इस्तेमाल करें, जैसा कि इंक़ेलाब के समय हमारे देश में लोगों ने किया, हमें दुश्मन को किसी भी तरह के दुरुपयोग का मौक़ा नहीं देना चाहिए, और हमारे एकता को पूरे सप्ताह मनाने का मतलब यही है।
इस्लामी जगत को क़रीब लाने की ज़रूरत इस्लामी जगत की आज सबसे बड़ी ज़रूरत उनका एक दूसरे से क़रीब लाना है, और जैसा कि पहले भी हमने कई बार कहा है कि क़रीब आने का मतलब बिल्कुल भी यह नहीं है कि हम अपने विचारों और अक़ीदों को एक दूसरे के क़रीब लाएं, क्योंकि बहुत से फ़िर्क़े आपसी बातचीत द्वारा इल्मी बहस करते हुए सही विचार और अक़ीदे तक पहुंच जाते हैं कई बार ऐसा देखा गया है, इस आपसी बातचीत और इल्मी बहस में बहुत सी ग़लतफ़हमियां दूर होती हैं और कभी यह भी पता चलता है कि हम सामने वाले के अक़ीदों को जैसा सोंच रहे थे वैसा नहीं बल्कि हमारे ही जैसे हैं, और कभी इल्मी बहस के कारण हमको अपने विचारों में पाई जाने वाली ग़लतियों का भी पता चलता है, और अगर इस तरह की इल्मी बहस हो तो बहुत अच्छा है क्योंकि कम से कम हमको यह तो पता चल जाएगा कि हम किन किन विचारों में आपस में एक दूसरे के क़रीब हैं, इसलिए आपसी फूट और मतभेद पैदा करने वाली बातों से बेहतर है कि ऐसी बातें हों जिससे इस्लामी फ़िर्क़े क़रीब आ सकें।
साम्राज्यवादी शक्तियों की मुसलमानों में फूट डालने की कोशिशें आज के समय में मुसलमानों में आपसी फूट डालने के लिए और उनको एक दूसरे के विरुध्द उकसाने और भड़काने के लिए कई गुना कोशिशें की जा रही हैं, और ध्यान देने की बात यह है कि साम्राज्यवादी शक्तियों की यह कोशिशें ऐसे समय में कई गुना बढ़ गई हैं जिस समय मुसलमानों को हर दौर से अधिक एकता दिखाने की ज़रूरत है, और उनकी इन सारी कोशिशों के पीछे जो रहस्य है वह यह कि वह इस्लाम के बढ़ते हुए नेतृत्व को रोकना चाहते हैं, ज़ाहिर है अगर इस्लामी देशों में इस्लामी नेतृत्व लागू हो जाए और मुसलमान इस्लाम से जुड़ना चाहें तो इन आपसी मतभेदों और आपसी फूट को देखते हुए ऐसा नहीं हो सकता।
मुसलमानों की एकता ही इस्लामी जगत का अभिमान है इस दुनिया में एक अरब से अधिक इंसान हैं जो अल्लाह, पैग़म्बर स.अ., नमाज़, रोज़ा, हज, काबा, क़ुर्आन और बहुत से दीनी अहकाम के बारे में एक ही अक़ीदा रखते हैं, यह लोग आ कर कुछ मामलों में मतभेद करें एक दूसरे से जंग करें ताकि जो अल्लाह और उसके रसूल के विरोधी लोग हैं वह मुसलमानों से अपनी दुश्मनी अच्छे से निभा सकें क्या यह बुध्दिमानी है? हम कई बार कह चुके कि उलमा, विद्वान और बड़े बड़े मुफ़्ती बैठें और आपस में इल्मी बहस करके एक दूसरे के विचारों को क़रीब करें, अहले सुन्नत के चारों फ़िक़्ही मज़हब, इमामिया, ज़ैदिया, और दूसरे इस्लामी फ़िर्क़े यह लोग बैठें आपस में बातचीत करें, देखें कहां तक एक दूसरे का साथ देते हुए कितना इल्मी और दीनी विचारों को क़रीब ला सकते हैं, हमने एक सेंटर भी बनाया, इंशाअल्लाह जो इस काम के ज़िम्मेदार हैं वह पूरी लगन के साथ इस काम को करेंगे, यह वह काम है जिसको अल्लाह भी पसंद करता है, और इस्लाम का बाक़ी रहना और इस्लामी नेतृत्व इन्हीं कामों से मुमकिन है। अगर मुसलमान एक दूसरे का हाथ थाम कर पक्का इरादा कर लें (चाहे उनके अक़ीदों में थोड़ा बहुत फ़र्क़ ही क्यों न पाया जाता हो, बस ध्यान रहे कि दुश्मन का काम वह ख़ुद न करें) तो इस्लाम का सम्मान और उसका अभिमान पूरी दुनिया में बाक़ी रहेगा।
इस्लामी जगत को एकता पर ध्यान देना होगा साम्राज्यवादी शक्तियों ने कुछ बेदीन आलिमों और उनके क़लमों और कुछ बे दीनों के दस्तरख़ान पर बची हुई हड्डियां चबाने वालों को किराए पर ले रखा है ताकि यह बिके हुए लोग एकता की फ़रियाद के मुक़ाबले आपसी फूट और मतभेद का रोना रोएं, यह हक़ीक़त है कि जिस इंसान में तक़वा और अल्लाह का ख़ौफ़ न पाया जाता हो और उसका ज़मीर बिक चुका हो वह हर दुश्मन से अधिक इस्लामी जगत के लिए ख़तरनाक है, हदीस में भी मौजूद है कि ऐसा शख़्स मुसलमानों के लिए उस भेड़िये से भी अधिक ख़तरनाक है जो भेड़ों के गल्ले पर हमला करता है, आप जानते हैं कि एक भेड़िया एक भेड़ के झुंड के लिए कितना घातक होता है लेकिन यह इंसान उससे भी ख़तरनाक है, हम सभी ने सद्दाम की ओर से थोपी हुई जंग के बाद बल्कि इंक़ेलाब के ही बाद से देखा है कि ऐसे बिके हुए और मुर्दा ज़मीर उलमा का इस बारे में किस तरह का रवैया रहा है, लेकिन इस्लाम, हमारे पैग़म्बर स.अ., और हफ़्तए वहदत की बरकत से इंक़ेलाब और हम मुसलमानों की आपसी एकता बाक़ी है।
मुसलमानों की एकता इस्लामी सिध्दांतों में से एक हमारा अक़ीदा है कि इस्लाम ने मुसलमानों की एकता को अपने मूल सिध्दांतों में रखा है, हमारा यह भी अक़ीदा है कि हज के अहम रहस्यों में से एक मुसलमानों को एक दूसरे के क़रीब करना है। अल्लाह ने सूरए हज की आयत नंबर 27 में सभी मुसलमानों को हुक्म दिया है कि वह अरफ़ात, मशअर, मिना और मस्जिदुल हराम में जमा हों, इस जमा होने का मतलब मुसलमानों का एक दूसरे को पहचानना और एक दूसरे के बारे जानना है, आज हमारा दुश्मन मुसलमानों के एक दूसरे को पहचानने से क्यों डरा हुआ है? सारी बात यही है कि साम्राज्यवादी ताक़ते विशेष कर मक्कार अमरीका को मुसलमानों की एकता और उनके हाथ में हाथ दे कर एक साथ खड़े रहने से बहुत डर लगता है, यही वह सच्चाई है जिसे इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने कई बार बयान किया है।
इमाम ख़ुमैनी र.ह. के विचारों में मुसलमानों की एकता इमाम ख़ुमैनी र.ह. इस्लामी जगत पर विशेष निगाह रखते थे, यही कारण है कि आप ने मुसलमानों की एकता के महत्व को अनेक बार बयान किया है, बात यह नहीं है कि मुसलमानों के सारे फ़िर्क़ों को मिला कर भी तादाद कितनी है, या मुसलमानों की राजनीति में भूमिका ही कितनी है, बात यह है कि अगर हम मुसलमानों की परेशानियों और उनकी कठिनाईयों का हल चाहते हों, या यूं कहा जाए कि अगर हम इस्लाम और क़ुर्आन के सम्मान और उसके अभिमान को बाक़ी रखना चाहते हैं तो आपसी मतभेद और फूट के रहते हुए यह मुमकिन नहीं है। इमाम ख़ुमैनी र.ह. इंक़ेलाब के पहले से इसी कोशिश में थे और इंक़ेलाब के बाद आप ने खुल के इस बारे में अपने विचारों को लोगों के सामने ज़ाहिर किया।
दुश्मन की अंतिम उम्मीद एकता को मिटाना है हमारे वह दुश्मन जो इंक़ेलाब और इस्लामी हुकूमत पर बुरी नज़रें गड़ाए बैठे हैं उनकी अंतिम उम्मीद शिया सुन्नी फूट है, इस्लाम के दुश्मन हम मुसलमानों की इस एकता से बुरी तरह से डरे हुए हैं, हमें इसको ध्यान में रखना चाहिए, सभी मुसलमानों को एकता, एकजुटता और आपसी भाईचारे को नहीं छोड़ना चाहिए, विशेष कर ज़िम्मेदार लोगों को हर समय इस ओर ध्यान रखना चाहिए।
अहलेबैत अ.स. का नाम सभी मुसलमानों को एक करने का बेहतरीन नुस्ख़ा सबसे अहम यह है कि अहलेबैत अ.स. से संबंधित दो चीज़ों के द्वारा मुसलमानों की एकता और मज़बूत बनाई जा सकती है, पहली यह कि अहलेबैत अ.स. से मुहब्बत है कि जो क़ुर्आन के हुक्म के मुताबिक़ हर मुसलमान पर वाजिब है, और आज हर सच्चा मुसलमान अहलेबैत अ.स. को मानता भी है और उनसे मुहब्बत भी करता है, यह नुस्ख़ा हमारी भावनाओं से जुड़ा हुआ है जिसके द्वारा हम सभी मुसलमानों को एक साथ जमा कर सकते हैं, दूसरी चीज़ दीनी तालीमात और अहकाम का सीखना है कि इन्हीं तालीमात में हदीसे सक़लैन भी है कि जिसे शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़ों ने अपनी किताबों में जगह दी है, यानी जिस तरह क़ुर्आन इस्लामी तालीमात और दीनी अहकाम सीखने का स्रोत है उसी तरह अहलेबैत अ.स. भी हैं, यह वह नुस्ख़ा है जिस के द्वारा सारे मुसलमान तौहीद के परचम के नीचे जमा हो सकते हैं, और आज मुसलमानों के हाथ में पूरा पूरा मौक़ा भी है।
एकता, इस्लामी जगत की कामयाबी का राज़ दिलों का क़रीब होना बहुत ज़रूरी है, शिया सुन्नी करना और इनके बीच के आपसी मतभेद को अहम मुद्दा बना कर पेश करना यही इस्लाम के दुश्मनों की चाल है, और वह लोग जो शिया सुन्नी करते हैं और किसी एक फ़िर्क़े के लिए हमदर्दी ज़ाहिर करते हैं, यह वह लोग हैं जो न सुन्नी फ़िर्क़े को मानते हैं ना ही शिया फ़िर्क़े को, न ही इस्लामी जगत की नामवर हस्तियों को मानते हैं ना ही आज के उलमा और विद्वानों को, ऐसे लोगों का कुछ और ही मक़सद होता है, हम सब की ज़िम्मेदारी है कि ऐसे लोगों से होशियार रहें और इनकी साज़िशों से बचते हुए आपसी एकता और भाईचारे को बनाए रखें, और इंशाअल्लाह यही एकता और इत्तेहाद है जिस से इस्लामी जगत को कामयाबी मिल सकती है।
हर साल हम 12 से 17 रबीउल अव्वल हफ़्त-ए-वहदत के नाम से इसी लिए मनाते हैं ताकि इसी बहाने से हर फ़िर्क़े और मसलक का मुसलमान जिनका अल्लाह एक है, क़ुर्आन एक है, क़िबला एक है सब मिल कर पैग़म्बर स.अ. की विलादत के मौक़े पर ख़ुशियां मनाएं और एक दूसरे को मुबारकबाद दे कर दिलों को क़रीब करें।
...........................


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :

नवीनतम लेख

ईरानी हैकर्स ने अमेरिकी अधिकारियों के ईमेल हैक किए ! ईरान, रूस और चीन से युद्ध के लिए तैयार रहे ब्रिटेन : जनरल कार्टर हमास की ज़ायोनी अतिक्रमणकारियों को चेतावनी, हमारे देश से से निकल जाओ । पाकिस्तान में इतिहास का सबसे बड़ा निवेश करने वाला है सऊदी अरब नेतन्याहू की धमकी, अस्तित्व की जंग लड़ रहा इस्राईल अपनी रक्षा के लिए कुछ भी करेगा । वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का आरोप, उनकी हत्या की योजना बना रहा है अमेरिका । सऊदी अरब सहयोगी , लेकिन मोहम्मद बिन सलमान की लगाम कसना ज़रूरी : अमेरिकन सीनेटर्स झूट की फ़ैक्ट्री, वॉइस ऑफ अमेरिका की उर्दू और पश्तो सर्विस पर पाकिस्तान ने लगाई पाबंदी ईरान के नाम पर सीरिया को हमलों का निशाना बनाने की आज्ञा नहीं देंगे : रूस अमेरिकी हथियार भंडार के साथ बू कमाल में सामूहिक क़ब्र से 900 शव बरामद । विख्यात यहूदी अभिनेत्री नताली पोर्टमैन ने की अमेरिका यमन युद्ध के नाम पर सऊदी अरब से वसूली को तैयार सऊदी अरब का युवराज मोहम्मद बिन सलमान है जमाल ख़ाशुक़जी का हत्यारा : निक्की हैली अमेरिका में पढ़ने वाले ईरानी अधिकारियों के बच्चों को निकालेगा वाशिंगटन दमिश्क़ का ऐलान,अपना उपग्रह लांच करने के लिए तैयार है सीरिया ।