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Code : 190715
Date of publication : 3/12/2017 19:8
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सुप्रीम लीडर का कश्मीर दौरा, शिया सुन्नी एकता का नया आयाम ।

कश्मीर के इतिहास में यह पहला अवसर था जब विश्वस्तर पर पहचान रखने वाला कोई शिया धर्मगुरु यहाँ आये और सुन्नी समुदाय की जामा मस्जिद में तक़रीर करे, इस से पहले यहाँ सुन्नी-शिया सम्प्रदाय में इख़्तेलाफ़ था और एक दूसरे से उलझे हुए थे , यहाँ तक कि अगर कोई शिया किसी सुन्नी मस्जिद में चला जाता था तो वह मस्जिद को पाक करते थे और कहते थे कि एक राफ्ज़ी मस्जिद में घुस आया था और मस्जिद को नापाक कर दिया है । लेकिन आयतुल्लाह ख़ामेनई की तक़रीर के बाद शिया बिना किसी भय और डर के सुन्नियों की मस्जिदों में जाते और सुन्नी पेश इमाम की इमामत में नमाज़ पढ़ते तो सुन्नी समुदाय भी शियाओं की मस्जिद में आते, यह सब आयतुल्लाह ख़ामेनई की 15 मिनट की तक़रीर और आपकी प्रेस कांफ्रेंस का नतीजा था ।


विलायत पोर्टल :  इस्लामी सांस्कृतिक क्रांती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिवंगत क़ल्बी हुसैन रिज़वी ने अपनी डायरी में आयतुल्लाह ख़ामेनई के कश्मीर दौरे का वर्णन करते हुए लिखा है कि आपके दौरे ने कश्मीर में शिया सुन्नी एकता को बहुत बल दिया, आपकी तक़रीर के बाद यह बात आम हो गयी कि शिया लोग बिना किसी डर और भय के सुन्नियों की मस्जिद में जाकर सुन्नी पेश इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ते और सुन्नी भी शिया समुदाय की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते ।
इस्लामी इंक़ेलाब के बाद इस क्रांति का एक अहम् योगदान शिया सुन्नी एकता थी जिसका दुनिया भर में दोनों समुदाय की ओर से स्वागत किया गया, इस्लामी इंक़ेलाब के मूल सिद्धांत में शिया सुन्नी एकता को जगह दी गयी जिसका असर दुनिया भर में देखा गया। इसी कड़ी में इस्लामी इंक़ेलाब के शुरूआती दौर में ही सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की कश्मीर यात्रा भी है ।
इस्लामी सांस्कृतिक क्रांती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिवंगत क़ल्बी हुसैन रिज़वी ने अपनी डायरी में कश्मीर में शिया सुन्नी एकता में आयतुल्लाह ख़ामेनई की भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा कि इस्लामी इंक़ेलाब और इमाम खुमैनी के आंदोलन की जो पवित्र यादें हैं उनमे से एक आयतुल्लाह ख़ामेनई की कश्मीर यात्रा है जो 1979 या 1980 के प्रारम्भ मे हुई थी ।
आयतुल्लाह ख़ामेनई की यात्रा से एक सप्ताह पहले शहीद बहिश्ती के साथ शहीद होने वाले इंजीनियर जवाद सरफ़राज़ कश्मीर आये जिनका ईरान की स्टूडेंट इस्लामी अंजुमन के साथ निकट संबंध था । उस समय जो भी कश्मीर आता था अंजुमन मुझे , इंजीनियर ग़ुलाम अली गुलज़ार और सय्यद मोहम्मद रिज़वी को सूचना देती थी, इस यात्रा पर जवाद सरफ़राज़ से मेरी जान पहचान हुई । कश्मीर में स्थित स्टूडेंट इस्लामिक एसोसिएशन के ऑफिस में उनके साथ मीटिंग हुई जिस में उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई की कश्मीर यात्रा के बारे में चर्चा की, उन दिनों आयतुल्लाह ख़ामेनई तेहरान के इमामे जुमा और रक्षा समिति में इमाम खुमैनी के प्रतिनिधि थे यह दोनों ही पद बहुत प्रतिष्ठित थे । जवाद सरफ़राज़ ने आयतुल्लाह ख़ामेनई की बहुत प्रशंसा की, हम उनके जुमे के ख़ुत्बे सुनते रहते थे हमें भी उनसे बहुत लगाव था, मैंने एक हफ्ते तक उनके स्वागत सत्कार का प्रोग्राम बनाया ।
वह भारत यात्रा पर आये थे जिस में एक दिन के लिए कश्मीर भी आये और इस क्षेत्र में 2 घंटे रुके । आपकी फ्लाइट बृहस्तपतिवार को शाम 4 बजे थी, उनके स्वागत का प्रबंध हो चुका था क्योंकि हमें एक हफ्ते पहले से ही सब जानकारी थी । आयतुल्लाह ख़ामेनई के आने से एक दिन पहले हम ने रात में एक टैक्सी ली और उस पर एक माइक बांधा, मैंने खुद टैक्सी में बैठ कर पूरे श्रीनगर शहर में आयतुल्लाह ख़ामेनई के आने का ऐलान किया, रात 12 बजे तक हमने पूरे शहर में ऐलान किया, हमारी योजना थी कि शिया बहुल इलाकों में यह खबर ज़रूर पहुँचनी चाहिए क्योंकि हमे सुन्नियों से ज़्यादा उम्मीद भी नहीं थी लेकिन उनके विशिष्ट और गणमान्य लोगों को हम खबर दे चुके थे । आयतुल्लाह ख़ामेनई के आगमन पर सब उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े, यह कश्मीर के इतिहास में अभूतपूर्व था, शिया समुदाय का कोई भी धर्मगुरु अपने घर में नहीं था यहाँ तक के हुज्जतुल इस्लाम सय्यद युसूफ मूसवी सफ़वी जैसा 85 वर्षीय वृद्ध धर्मगुरु भी उनके स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर उपस्थित थे ।
आयतुल्लाह ख़ामेनई के आगमन पर शिया समुदाय श्रीनगर हवाई अड्डे पर उमड़ पड़ा , बस , टैक्सी , मिनी बस , ट्रक , जिसे जो साधन मिला वह दौड़ा चला आया, श्रीनगर हवाई अड्डे पर आपका अभूतपूर्व स्वागत हुआ । उस दिन आपने बड़गाम इमाम बारगाह में तक़रीर की और श्रीनगर में एक प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित किया, उसके अगले दिन आपने जड़ीबल में तक़रीर की और श्रीनगर में सुन्नियों की जामा मस्जिद मे नमाज़े जुमा अदा की ।
आपने सुन्नी मौलाना मीर वाईज़ मौलवी फ़ारूक़ की इमामत में नमाज़े जुमा पढ़ी उसके बाद आपने सिर्फ 15 मिनट की एक तक़रीर की, क्योंकि 4 बजे आपकी फ्लाइट थी ।
आपने अपनी इस छोटी सी तक़रीर में क़ुरआने मजीद की आयत و اعتصموا بحبل الله جمیعاً ولاتفرقوا पर रौशनी डालते हुए  इस्लामी एकता और शिया सुन्नी इत्तेहाद के महत्त्व को बयान किया, 15 मिनट की इस तक़रीर का असर दसों किताबें और महीनों भाषण देने से कहीं अधिक था, जिसका प्रभाव हमने अपनी आँखों से देखा है । कश्मीर के इतिहास में यह पहला अवसर था जब विश्वस्तर पर पहचान रखने वाला कोई शिया धर्मगुरु इस देश में आये और सुन्नी समुदाय की जामा मस्जिद में तक़रीर करे, इस से पहले यहाँ सुन्नी-शिया सम्प्रदाय में इख़्तेलाफ़ था और एक दूसरे से उलझे हुए थे , यहाँ तक कि अगर कोई शिया किसी सुन्नी मस्जिद में चला जाता था तो वह मस्जिद को पाक करते थे और कहते थे कि एक राफ्ज़ी मस्जिद में घुस आया था और मस्जिद को नापाक कर दिया है । लेकिन आयतुल्लाह ख़ामेनई की तक़रीर के बाद शिया बिना किसी भय और डर के सुन्नियों की मस्जिदों में जाते और सुन्नी पेश इमाम की इमामत में नमाज़ पढ़ते तो सुन्नी समुदाय भी शियों की मस्जिद में आते, यह सब आयतुल्लाह ख़ामेनई की 15 मिनट की तक़रीर और आपकी प्रेस कांफ्रेंस का नतीजा था ।
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