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Date of publication : 10/12/2017 15:38
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बच्चों की सही तरबियत कैसे करें?

वालेदैन को यह भी समझना होगा कि, बच्चों के अंदर बहुत सी आदतें उनकी उम्र के मुताबिक़ होती हैं, जिसके लिए किसी तरबियत के उसूल की ज़रूरत नहीं होती है, जैसे एक उम्र पर पहुंच कर बच्चे में ज़िद बहुत हो जाती है, या इसी तरह एक उम्र में पहुंच कर बच्चें आज़ाद रहना चाहते हैं, इसलिए वालेदैन को समझना होगा कि किस उम्र की क्या ज़रूरत है, ऐसे मौक़े पर ग़ुस्सा कर के बच्चों पर बुरा प्रभाव मत डालें।

विलायत पोर्टल : बच्चों की तरबियत के लिये सबसे पहले तरबियत के सही उसूल का जानना है, और इन उसूलों का न जानना तरबियत के लिए सबसे अधिक हानिकारक है, तरबियत उसूलों के विशेषज्ञ और सलाहकारों का कहना है कि, मां बाप के लिए यह जानना ज़रूरी है कि किस समय कौन सी बात बच्चों को बताई और सिखाई जाए, इसी तरह यह भी जानना ज़रूरी है कि बच्चों का किस बात पर हौसला बढ़ाया जाए और कब उनको सज़ा दी जाए, और इसी तरह बच्चों की शरारत के समय उन्हें कैसे डील करना है इसका भी जानना ज़रूरी है, यह सारी बातें जानने के बाद ही मां बाप बच्चे की सही और अच्छी तरबियत कर सकते हैं। अफ़सोस यह कि बहुत सी फ़ैमिली का इन बातों की ओर ध्यान नहीं होता जिसके कारण वह बच्चों की शुरू से अच्छी तरबियत नहीं कर पाते, जिसका नतीजा यह होता है कि बच्चे में बचपन से ग़लत आदतें और बुरी बातें पैदा होना शुरू हो जाती हैं, और फिर यही बातें बच्चे के साथ बढ़ती रहती हैं जिसके कारण आगे चल कर पूरी पूरी नस्लें भी बर्बाद होती हैं और समाज पर भी इन बुरी बातों और आदतों का असर पड़ता है, इसी लिए उलमा ने और इस विभाग के विशेषज्ञों ने मां बाप को उन सभी चीज़ों को जानने और समझने का हुक्म दिया है जो बच्चे की तरबियत के लिए ज़रूरी हैं।
बच्चे की तरबियत किस उम्र से शुरू हो? डॉक्टर इलाह मीर जो कि तरबियती मामलों के विशेषज्ञ हैं उनका कहना है कि, 1 साल तक बच्चे की तरबियत वग़ैरह के मामलों पर विशेष ध्यान की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि 1 साल तक के बच्चे के लिए मां बाप द्वारा केवल उसकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करनी होती हैं विशेष कर मां द्वारा, और जब तक बच्चा समझाने और रोकने टोकने और तरबियती बातों को समझने के क़ाबिल नहीं होता वह केवल मां की ज़बान ही समझता है और उस हर चीज़ से ज़्यादा मां की ज़रूरत होती है। इस उम्र तक मां बाप को केवल उसकी जिस्मानी और मानसिक ज़रूरतों को पूरा करना चाहिए, और जब धीरे धीरे बच्चा मां बाप की बात को समझने लगे और उनके समझाने और रोकने टोकने को समझने लगे, बस उसी समय से ही उसकी तरबियत की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मां बाप उसे 2 साल बल्कि उस से पहले ही से उस पर सख़्ती और ज़बर्दस्ती शुरू कर दें। विशेषज्ञों के अनुसार तरबियत की शुरूआत (बच्चे को समझाने और रोकने टोकने) का सही समय 2 साल की उम्र है, जिस उम्र में बच्चा बात को समझता भी है और उसपर रोकने टोकने का असर भी होता है।
बच्चे की तरबियत में मां का किरदार सबसे अहम बच्चों के मनोविज्ञान विशेषज्ञ से जब मां और बाप में से किसका किरदार ज़्यादा अहम है जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, मां और बाप दोनों ही बच्चे की तरबियत में बुनियादी किरदार रखते हैं, लेकिन चूंकि मां, बाप से अधिक समय बच्चों के साथ बिताती है इसलिए बच्चे की तरबियत में मां का किरदार ज़्यादा अहम है। क्योंकि बाप बच्चे के साथ कम समय बिताता है, इसलिए मां को तरबियत के उसूल समझने की अधिक ज़रूरत है, क्योंकि अधिकतर वही बच्चे के साथ रहती है, हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बाप का कोई किरदार नहीं है और वह अपने आप को बच्चे की तरबियत के मामले से किनारे कर ले, बल्कि वह जिस समय घर में है उस समय वह सभी उन तरबियत के उसूलों को ध्यान में रखे जिन उसूलों को ध्यान में रखते हुए मां तरबियत कर रही है। बच्चों के मनोविज्ञान विशेषज्ञ के अनुसार बच्चों की तरबियत में उनके दादा दादी का हस्तक्षेप बहुत हानिकारक होता है, वह कहते हैं कि, ज़ाहिर सी बात है कि बच्चों की तरबियत के लिए दादा दादी के समय की ज़रूरतें और अब इस बच्चे के समय की ज़रूरतें अलग अलग हैं, और तरबियत के उसूल भी समय के अनुसार बदलते रहते हैं, इसलिए मां बाप समय की ज़रूरत को ज़्यादा अच्छे से समझ सकते हैं। दादा दादी का तरबियती मामलों मे दख़ल देना बच्चे की सही तरबियत में रुकावट बन सकता है, क्योंकि वह अपने समय की विचारधारा के अनुसार तरबियत करना चाहेंगे और मां बाप हालिया ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए करेंगे, इन दोनों के बीच बच्चा इसी परेशानी में रहेगा कि वह किस की बात पर अमल करे। इसीलिए बेहतर है कि वालेदैन ख़ुद अपने बच्चे की तरबियत करें, और अगर किसी कारण वह अपने बच्चों को उनके दादा दादी को सौंपने पर मजबूर हैं तो उनको आज के समय के तरबियत के उसूलों के बारे में बता कर उनसे कहें कि वह उनकी तरबियत आज के समय के उसूलों के अनुसार करें, चाहे वह आज के समय के उसूलों को ना पसंद ही क्यों न करते हों, क्योंकि तरबियत के लिए समय की ज़रूरतों का ध्यान में रखना ज़रूरी है। बच्चे को हमें यह सिखाना है कि किन कामों से उसे बचना है और किन कामों को अंजाम देना है, इसलिए तरबियत करने वाले अगर कई लोग हो जाएंगे तो बच्चे को सही रास्ता चुनने में परेशानी होगी, वह समझ ही नहीं पाएगा कि मुझे किस रास्ते को चुनना चाहिए, और इसका नतीजा यह होगा कि बच्चा मानसिक तनाव महसूस करेगा, क्योंकि वह समझ ही नहीं पाएगा कि अपने कामों में उसकी तारीफ़ होगी या उसको सज़ा मिलेगी।
डांटने का कोई फ़ायदा नहीं वालेदैन आपस में तरबियत के उसूलों में सहमत हों और तरबियत का तरीक़ा सही न हो यह भी ग़लत है, जैसे मां बाप का यह मानना हो कि तरबियत के लिए सख़्त रवैया अपनाना ज़रूरी है तो ऐसे वालेदैन जान लें कि बच्चे को डांटना, उसे अपमानित करना और झिड़कना यह चीज़ें तरबियत के लिए आफ़त हैं और इसका बच्चे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। हो सकता है कि कुछ वालेदैन का यह कहना हो कि उन्होंने दूसरों को अपने बच्चे की तरबियत के लिए यह तरीक़ा इस्तेमाल करते हुए देखा है, लेकिन उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि आज के समय में यह बात ख़ुद ऐसे ही वालेदैन (जिन्होंने अपने बच्चों की तरबियत के लिए सख़्त रवैया अपनाया) मान चुके हैं कि अपनी औलाद पर बचपन में की गई सख़्तियों पर वह शर्मिंदा हैं क्योंकि वह उसका नुक़सान अब देख रहे हैं।
ध्यान रहे बच्चों की तरबियत के समय मुमकिन है कि कभी सख़्त रवैया अपनाना पड़े लेकिन ऊपर लिखी गई बात उन वालेदैन के लिए है जिन्होंने सख़्त रवैये को तरबियत के उसूलों में शामिल कर लिया है। कभी कभी वालेदैन, बच्चों से नाराज़ हो जाते हैं और ऐसा होना स्वभाविक है, और इसका बुरा असर भी नहीं पड़ता, लेकिन समय रहते ही बच्चों से माफ़ी मांग लेनी चाहिए ताकि वह अपने आपको अपमानित महसूस न करें।
बिल्कुल ढ़ील देना भी तरबियत के लिए हानिकारक जिस तरह से सख़्त रवैये को तरबियत के उसूलों में से समझ कर बच्चों पर सख़्ती करना बच्चों की तरबियत पर नकारात्मक असर डालेगा बिल्कुल वैसे ही खुली छूट देना भी तरबियत के लिए बहुत हानिकारक है, जो वालेदैन बच्चों की तरबियत के मामले को ज़रूरी न समझते हुए उनपर ध्यान नहीं देते और उनको आज़ाद छोड़ देते हैं, उनकी हर ज़िद को तुरंत पूरा करते हैं, ऐसे वालेदैन आगे चल कर अपने ही बच्चों पर कंट्रोल खो बैठते हैं, और आगे चल कर ऐसे बच्चे समाज में हर हासिल न कर पाने वाली चीज़ को ले कर मानसिक तनाव का शिकार भी हो जाते हैं, जो कि तरबियत में सबसे बड़ी रुकावट है।
वालेदैन का आपसी तनाव बच्चों की तरबियत के लिए हानिकारक अगर मां बाप के बीच तनाव और मतभेद इतने अधिक हों कि वह हमेशा आपस में बहस किया करते हों और यह आपसी विवाद इस तक बढ़ जाए कि मनोचिकित्सक भी उनके विवादों को न सुलझा सके तो वालेदैन का एक दूसरे से अलग हो जाना ही बेहतर है, क्योंकि इस से अधिक बच्चे पर नकारात्मक असर डालने वाली और कोई दूसरी चीज़ नहीं है, ऐसा माहौल न केवल बच्चे की तरबियत के लिए हानिकारक है बल्कि बच्चे के अंदर अपमान, तनाव, आत्मविश्वास की कमी, अपराधिक सोच जैसी ख़तरनाक चीज़ें भी पैदा कर देगा।
वालेदैन के बीच कभी कभी आपसी सहमति का न होना स्वभाविक है, लेकिन अगर वह चाहते हैं कि हमारे आपसी मतभेद का असर बच्चे पर न पड़े तो उनको चाहिए कि वह अपने मतभेदों को बच्चों के सामने ज़ाहिर न करें।
सही तरबियत कैसे करें? बच्चों की सही तरबियत के लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि तरबियत के बारे में अपनी जानकारी को बढ़ाएं और तरबियत के उसूलों को समझें, वालेदैन को यह भी समझना होगा कि, बच्चों के अंदर बहुत सी आदतें उनकी उम्र के मुताबिक़ होती हैं, जिसके लिए किसी तरबियत के उसूल की ज़रूरत नहीं होती है, जैसे एक उम्र पर पहुंच कर बच्चे में ज़िद बहुत हो जाती है, या इसी तरह एक उम्र में पहुंच कर बच्चें आज़ाद रहना चाहते हैं, इसलिए वालेदैन को समझना होगा कि किस उम्र की क्या ज़रूरत है, ऐसे मौक़े पर ग़ुस्सा कर के बच्चों पर बुरा प्रभाव मत डालें। वालेदैन का तरबियत के बारे में ज़रूरी जानकारी हासिल करने और तरबियत के ज़रूरी उसूल को जान लेने के बाद सही तरीक़े का चुनना बहुत अहम है, एक ऐसा तरीक़ा जिस से न बच्चों से सख़्त रवैया अपनाया जाए और ना ही उनको एकदम आज़ादी दी जाए, साथ ही साथ बच्चे से यह भी कहा जाए कि अगर उसने तरबियती उसूलों को नहीं माना तो उसको सज़ा दी जाएगी, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि वह सज़ा मार पीट बिल्कुल नहीं होगी।
और यह भी वालेदैन को ध्यान में रखना होगा कि बच्चों से भावनात्मक संबंध को मज़बूत करें और हमेशा बच्चों के साथ प्यार मोहब्बत से ही पेश आएं, और हमेशा बच्चों के भरोसे को बनाए रखें ताकि वह भी हमेशा वालेदैन के सम्मान और उनकी पैरवी को अहमियत देते हुए उनके द्वारा बताए गए तरबियती उसूलों पर अमल करते रहें।


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