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Date of publication : 12/12/2017 7:5
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क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. में समानताएं

जिस तरह इमाम शफ़ाअत करेंगे क़ुर्आन भी शफ़ाअत करेगा, इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि तुम लोग क़ुर्आन की पैरवी करो क्योंकि क़ुर्आन ऐसा शफ़ाअत करने वाला है जिसकी शफ़ाअत अल्लाह क़ुबूल करेगा।

विलायत पोर्टल :  पैग़म्बर स.अ. की मशहूर हदीस जिसे शिया सुन्नी दोनों ने अपनी किताबों में लिखा है वह हदीसे सक़लैन है जिसमें आप फ़रमाते हैं कि मैं तुम्हारे बीच दो अहम चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूं एक अल्लाह की किताब और दूसरे मेरे अहलेबैत अ.स. हैं, जब तक तुम लोग इन दोनों से जुड़े रहोगे तब तक कभी गुमराह नहीं हो सकते और यह दोनों एक दूसरे से कभी जुदा नहीं होंगे और हौज़े कौसर पर दोनों एक साथ मुझ से मुलाक़ात करेंगे। (जाम-ए-अहादीसुश-शिया, जिल्द 1, पेज 63) इस हदीस और इसके अलावा और दूसरी हदीसों की रौशनी में क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. के बीच समानताओं को इस लेख में बयान किया जाएगा।
1. क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. दोनों पैग़म्बर स.अ. की निशानी हैं, जिनको अपने बाद हमारी हिदायत के लिए आप छोड़ कर गए।
2. यह दोनों कभी एक दूसरे से जुदा नहीं हो सकते और क़यामत तक के लिए यह दोनों एक दूसरे के साथी हैं, क्योंकि हदीस में पैग़म्बर स.अ. ने ख़ुद फ़रमाया कि यह दोनों आपस में जुदा नहीं होंगे यहां तक कि हौज़े कौसर पर मुझ से मुलाक़ात करेंगे।
3. इस हदीस से यह भी साबित होता है कि इन दोनों को एक साथ अपनाने से सआदत मिलेगी, क्योंकि वह किताब जो लोगों की ज़रूरतें बताने के लिए हो वह बिना किसी मुफ़स्सिर और उस्ताद के नहीं हो सकती, जब मामूली किताबों के समझने के लिए किसी उस्ताद का होना ज़रूरी है तो क़ुर्आन जैसी किताब बिना किसी समझाने वाले के कैसे हो सकती है।
4. पैग़म्बर स.अ. ने हदीस में दोनों के मासूम होने को भी बताया, आपने फ़रमाया कि जब तक इन दोनों की पैरवी करोगे गुमराह नहीं होगे, ज़ाहिर है मासूम ही है जिसकी पैरवी इंसान को गुमराही से निजात दिला सकती है।
5. क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. ही हैं जो इंसान के ज़िंदा रहने का कारण हैं, इसीलिए अगर निजात चाहिए तो दोनों की पैरवी ज़रूरी है, इस रौशनी में कहा जा सकता है जिस किसी ने क़ुर्आन को अपने लिए काफ़ी समझा वह गुमराही के रास्ते पर है। 6. क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. दोनों ही अल्लाह की मारेफ़त हासिल करने का स्रोत हैं।
7. अगर क़ुर्आन महान किताब है तो अहलेबैत अ.स. भी महान हस्तियां हैं, दुनिया के किसी इंसान की अहलेबैत अ.स. से तुलना नहीं की जा सकती, जो विशेषताएं जैसे हक़ का नूर, ज़िक़्र, बयान वग़ैरह क़ुर्आन के लिए हैं वही अहलेबैत अ.स. के लिए भी हैं।
8. अगर फ़ित्ना, फ़साद और कठिन समय में क़ुर्आन की ओर पनाह लेना चाहिए इसी तरह मुश्किल समय में अहलेबैत अ.स. की ओर पनाह लेना चाहिए।
9. जिस तरह इमाम शफ़ाअत करेंगे क़ुर्आन भी शफ़ाअत करेगा, इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि तुम लोग क़ुर्आन की पैरवी करो क्योंकि क़ुर्आन ऐसा शफ़ाअत करने वाला है जिसकी शफ़ाअत अल्लाह क़ुबूल करेगा। (काफ़ी, जिल्द 2, पेज 598)
10. जिस तरह अल्लाह ने अपनी किताब क़ुर्आन द्वारा लोगों पर प्रभाव डाला उसी तरह इमामों के वजूद में भी अपनी विशेषताओं को ज़ाहिर कर के लोगों को प्रभावित किया।
11. जब तक उम्मत है तब तक क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. हैं, और क़यामत तक यह दोनों हर किसी से बेहतर रहेंगे क्योंकि पैगंम्बर स.अ. ने सभी को इन दोनों की पैरवी का हुक्म दिया है, ऐसा हो ही नहीं सकता इन दोनों से कोई बेहतर हो और उसे पैग़म्बर स.अ. इन दोनों की पैरवी करने का हुक्म दें।
12. इमामत केवल अहलेबैत अ.स. के घराने में है, और सआदत तक पहुंचाने वाली किताब केवल क़ुर्आन है, क्योंकि हदीस में पैग़म्बर स.अ. ने सब के लिए कहा कि जब तक तुम सब इन दोनों से जुड़े रहोगे यानी किसी के लिए भी विशेष हुक्म नहीं दिया।
13. इन्हीं दोनों की पैरवी ही हमारी निजात का कारण है, जैसाकि क़ुर्आन के बारे में अनेक आयतें मौजूद हैं, और अहलेबैत अ.स. के बारे में पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हमारे अहलेबैत अ.स. हज़रत नूह की कश्ती की तरह हैं जो सवार हो गया केवल वही बचेगा और जिसने सवार होने से मना किया वह गुमराह हो जाएगा।
14. दोनों ही ऐसे हैं जिनके पास हमारी हर ज़रूरत और हर सवाल का जवाब पाया जाता है, यानी हम हर तरह के शरई और दीनी अहकाम को इन दोनों से हासिल कर सकते हैं, यहा कारण है कि इन दोनों को इल्म का स्रोत कहा गया है, इन दोनों के अलावा कोई भी हर सवाल का जवाब नहीं दे सकता।
15. पैग़म्बर स.अ. क़यामत में दोनों से पूछेंगे कि लोगों ने तुम्हारे साथ कैसा रवैया अपनाया, और दोनों ही को क़यामत में शिकायत करने का हक़ दिया गया है।
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