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Code : 190905
Date of publication : 14/12/2017 16:53
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पैग़म्बर स.अ. और इमाम अली अ.स. में समानताएं

सूरए माएदा की आयत नं. 55 जिसमें इमाम अली अ.स. के पूर्ण अधिकार को बयान किया गया है, इस आयत के बारे में सभी मुफ़स्सिर एकमत हैं कि यह आयत इमाम अली अ.स. के बारे उस समय नाज़िल हुई जब आपने नमाज़ मे रुकूअ की हालत में एक फ़क़ीर को अंगूठी दी, इस आयत में वली का मतलब ज़ाहिरी और मानवी अधिकार और सरपरस्ती है, क्योंकि इस आयत में आपका वली होना अल्लाह और पैग़म्बर स.अ. के वली होने के साथ साथ ज़िक्र हुआ है, इसलिए यह आयत इमाम अली अ.स. की सरपरस्ती और पूर्ण अधिकार के बारे में है।


विलायत पोर्टल :  1. दोनों मासूम हैं, जैसाकि आयते ततहीर इस बात पर गवाह है। (सूरए अहज़ाब, आयत 33)
2. दोनों को पूर्ण अधिकार हासिल हैं। (सूरए अहज़ाब, आयत 6, सूरए माएदा, आयत 55)
सूरए माएदा की आयत नं. 55 जिसमें इमाम अली अ.स. के पूर्ण अधिकार को बयान किया गया है, इस आयत के बारे में सभी मुफ़स्सिर एकमत हैं कि यह आयत इमाम अली अ.स. के बारे उस समय नाज़िल हुई जब आपने नमाज़ मे रुकूअ की हालत में एक फ़क़ीर को अंगूठी दी, इस आयत में वली का मतलब ज़ाहिरी और मानवी अधिकार और सरपरस्ती है, क्योंकि इस आयत में आपका वली होना अल्लाह और पैग़म्बर स.अ. के वली होने के साथ साथ ज़िक्र हुआ है, इसलिए यह आयत इमाम अली अ.स. की सरपरस्ती और पूर्ण अधिकार के बारे में है।
3. दोनों के पास अल्लाह का दिया हुआ विशेष इल्म है। (वसाएलुश-शिया, जिल्द 27, पेज 37, नहजुल बलाग़ा, कलेमाते क़ेसार 147)
4. दोनों के पास सब्र (धैर्य) जैसी महान नैतिक अच्छाई पाई जाती है। (सूरए अहक़ाफ़, आयत 35, बिहारुल अनवार, जिल्द 29, पेज 565)
5. दोनों अल्लाह के पाक और ख़ालिस बंदे हैं। (सूरए इसरा, आयत 1, बिहारुल अनवार, जिल्द 70, पेज 186)
6. दोनों की निगाह में दुनिया से दिल लगाना बेहद बुरा है, जैसा कि इमाम अली अ.स. की हदीस भी है कि ऐ दुनिया तू मुझ से दूर ही रह, मैं तेरे जाल में फंस कर ज़लील नहीं हो सकता और ना ही अपनी लगाम तेरे हाथ में दे सकता हूं कि तू जिधर चाहे मुझे ले कर चली जाए। (नहजुल बलाग़ा, ख़त नं. 45)
7. दोनों कुफ़्फ़ार के मुक़ाबले मैदान में डटे रहे। (सूरए तौबा, आयत 73, काफ़ी, जिल्द 8, पेज 160)
8. दोनों अल्लाह की इबादत में अपनी मिसाल आप थे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 36, पेज 371)
9. दोनों का मक़सद नैतिक सिध्दांतों पर पूर्ण रूप से अमल करते हुए लोगों के लिए बयान करना था। (मुस्तदरक, जिल्द 11, पेज 187, मुस्तदरक, जिल्द 11, पेज 283)
10. दोनों ज़ाहिद थे। (काफ़ी, जिल्द 8, पेज 145)
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