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Date of publication : 7/1/2018 19:57
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यतीमों का ख़्याल

यतीम की सरपरस्ती और उनसे मोहब्बत को इस्लामी नैतिकता मे अहम दर्जा दिया गया है, हमारे लिए यह जानना ज़रूरी है कि एक यतीम बच्चे की अनेक ज़रूरतें होती हैं, जैसे उसको एक प्यार देने वाले परिवार की ज़रूरत होती है, इसी तरह उसकी निगाहें अपने मां बाप को खोने के बाद हमेशा एक ऐसे इंसान को तलाश करती हैं जिसपर वह भरोसा कर सके, इस्लामी तालीमात में यतीमों की ज़रूरत को पूरा करने का सबसे अच्छा रास्ता यह बताया गया है कि यतीमों को अपने परिवार का हिस्सा बनाया जाए और उनकी किसी भी तरह की मदद को बिना उनको बताए हुए अंजाम दी जाए ताकि उनका आत्मसम्मान बना रहे।

विलायत पोर्टल : इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि जो भी अल्लाह की रहमत में शामिल होना चाहता है और जन्नत की आरज़ू रखता है उसको चाहिए कि वह यतीमों के साथ नेक बर्ताव करे और उनसे मोहब्बत से पेश आए। (अमाली सदूक़, जिल्द 1, पेज 389) समाज में बहुत से बच्चे होते हैं जिनके वालेदैन किसी भी वजह से इस दुनिया से जा चुके होते हैं और उनको किसी सहारे की ज़रूरत होती है इसी वजह से उनको यतीमख़ाने में भेज दिया जाता है, हालांकि यतीमों के पालन पोषण में उनके खाने पीने और कपड़े वग़ैरह का एक बड़ा ख़र्च है लेकिन यहां केवल उनकी माली मदद की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना मक़सद नहीं बल्कि इस माली मदद से ज़्यादा ज़रूरी उनके साथ मोहब्बत से पेश आना है, क्योंकि बच्चों को हर चीज़ से ज़्यादा प्यार और मोहब्बत की ज़रूरत होती है, अगर यह बच्चे मां बाप जैसा प्यार किसी से न पा सकें तो यह जवान तो हो जाएंगे लेकिन मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे या नहीं यह नहीं कहा जा सकता।
बच्चे जब अपने मां बाप के साथ बड़े होते हैं तो मां बाप उनसे मोहब्बत से पेश आते उनकी हर छोटी बड़ी ज़रूरत पर ध्यान रखते उनको हर तरह की अच्छी आदतें सिखाने और अच्छे संस्कार देने की कोशिश करते हैं, ज़ाहिर है मां बाप के मरने के बाद इस बच्चे की यह ज़रूरतें ख़त्म नहीं हो जातीं इसीलिए उनके खाने पीने और पहनने ओढ़ने के साथ साथ उनको अच्छी आदतें सिखाने और अच्छे संस्कार देने पर ध्यान देना ज़रूरी है, और ऐसा तभी संभव है जब उनके साथ प्यार और मोहब्बत से पेश आया जाए। अल्लाह ने यतीम की मदद करने पर ज़ोर देते हुए इस तरह फ़रमाया कि नेकी और अच्छाई यह नहीं है कि तुम अपने चेहरे को पूरब और पश्चिम की ओर कर लो बल्कि नेकी यह है कि अल्लाह, क़यामत, फ़रिश्तों, आसमानी किताबों और नबियों पर ईमान लाओ और अपने माल को जो तुमको बहुत पसंद है उसमें से अपने ग़रीब रिश्तेदारों, यतीमों, बे सहारों, रास्ते से भटके हुओं और फ़क़ीरों पर ख़र्च करो। (सूरए बक़रह, आयत 177)
इस आयत में अगर ध्यान दिया जाए तो यह बात समझ में आती है कि अल्लाह ने इस आयत में नेकी के उदाहरण बयान किए हैं, जिसमें यतीमों के साथ अच्छे बर्ताव को अल्लाह, उसके रसूल, फ़रिश्तों और क़यामत पर ईमान लाने जैसे विषयों के बाद ज़िक्र किया, यह आयत हक़ीक़त में मोमिन की पहचान और उसकी निशानियां बयान कर ही है जिसमें से एक यतीमों की मदद करना है, ज़ाहिर है यतीमों की मदद वही करेगा जो उनसे मोहब्बत करता होगा। (तर्जुमा-अल मीज़ान, जिल्द 1, पेज 654)
यतीमों के माल को हड़पने के बारे में भी अल्लाह ने बहुत सख़्त लहजा अपनाते हुए फ़रमाया कि जो लोग भी यतीम के माल को छीन कर खाते हैं वह यतीम का माल नहीं बल्कि आग खाते हैं और बहुत जल्द वह जहन्नम में जाएंगे। (सूरए निसा, आयत 10) यतीम की सरपरस्ती और उनसे मोहब्बत को इस्लामी नैतिकता मे अहम दर्जा दिया गया है, हमारे लिए यह जानना ज़रूरी है कि एक यतीम बच्चे की अनेक ज़रूरतें होती हैं, जैसे उसको एक प्यार देने वाले परिवार की ज़रूरत होती है, इसी तरह उसकी निगाहें अपने मां बाप को खोने के बाद हमेशा एक ऐसे इंसान को तलाश करती हैं जिसपर वह भरोसा कर सके, इस्लामी तालीमात में यतीमों की ज़रूरत को पूरा करने का सबसे अच्छा रास्ता यह बताया गया है कि यतीमों को अपने परिवार का हिस्सा बनाया जाए और उनकी किसी भी तरह की मदद को बिना उनको बताए हुए अंजाम दी जाए ताकि उनका आत्मसम्मान बना रहे।
यतीम की सरपरस्ती और उनका ख़्याल रखने के बारे में इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि जिस किसी में यह चार आदतें पाई जाएंगी अल्लाह उसके लिए जन्नत में घर बनवाएगा,
1. यतीमों की सरपरस्ती करता हो
2. मजबूरों की मदद करता हो
3. अपने मां बाप के साथ नेक बर्ताव करता हो
4. अपने अधीन रहने वालों के साथ मोहब्बत से पेश आता हो। (ख़ेसाले सदूक़, जिल्द 1, पेज पेज 231)
पैग़म्बर स.अ. जिन्होंने ख़ुद यतीमी के दर्द को महसूस किया है आप ने यतीमों की सरपरस्ती का सवाब इस तरह बयान फ़रमाया कि जो किसी यतीम की इस तरह सरपरस्ती और मदद करे कि उसकी ज़रूरत पूरी तरह से ख़त्म हो जाए अल्लाह ऐसे इंसान पर जन्नत को वाजिब कर देता है, इसी तरह अगर किसी ने यतीम के माल पर क़ब्ज़ा किया तो उसका ठिकाना जहन्नम है। (अमाली तूसी, जिल्द 2, पेज 99)
इंसान अगर अपने आस पास ध्यानपूर्वक देखे तो बहुत से बच्चे ऐसे होंगे जिनको सरपरस्ती, माली मदद और प्यार मोहब्बत की ज़रूरत हो लेकिन हो सकता है कि कोई उन पर ध्यान देने वाला न हो, लोग अनदेखा कर रहे हों जबकि हमारे इमाम अली अ.स. का ध्यान अपनी शहादत के कुछ समय पहले तक भी यतीमों से नहीं हटा, यहां तक कि शहादत से कुछ क्षण पहले आपने फ़रमाया ख़ुदा के लिए यतीमों का ख़्याल रखो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे पेट भरे हों और वह भूखे सो रहे हों और वह भूख और किसी ज़रूरत के कारण इस दुनिया से चल बसें। (नहजुल बलाग़ा, वसीयत 47)
अभी तक आयतों और हदीसों की रौशनी में बयान की गई बातों से यह बात साफ़ हो जाती है कि यतीमों से मोहब्बत करना एक अहम इस्लामी फ़रीज़ा है जिसके ख़िलाफ़ अमल करने पर अल्लाह ने सख़्त अज़ाब का वादा किया है। विशेष कर यतीमों के माल और प्रापर्टी पर बुरी निगाह डालने तक से मना किया है उसको लूटना बेचना और खाना तो बहुत दूर की बात है।
अल्लाह और मासूमीन अ.स. की इतनी ताकीद के बाद हम सभी की ज़िम्मेदारी है अपने आस पास के घरों का ज़रूर ख़्याल रखें अगर कहीं कोई यतीम बच्चा है तो उसकी सरपरस्ती करें उसकी जो भी ज़रूरत हो और आप पूरी कर सकते हों तो उसको ज़रूर पूरा करें, और इन सबके साथ यह ज़रूर ध्यान में रहे कि यतीमों को खाने पीने पहनने की चीज़ों से अधिक प्यार और मोहब्बत की ज़रूरत है इसलिए जैसे आप अपने बच्चों को प्यार देते हैं अपने क़ीमती समय में से भी समय निकाल कर उनके साथ समय बिताते हैं उसी तरह कुछ समय उन यतीम बच्चों के साथ बिताएं ताकि उनको अपने मां बाप खोने का कम से कम एहसास हो।
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