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Date of publication : 7/1/2018 20:6
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मौत कितनी तरह की होती है

इमाम अली स.अ. इस बारे में फ़रमाते हैं कि अल्लाह की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, मेरे लिए बिस्तर पर मौत आने से बेहतर यह है कि मैं अल्लाह की राह में तलवार के एक हज़ार वार खा कर शहीद हो जाऊं। (ग़ोररुल हेकम, पेज 242) इस्लाम की निगाह में शहीद हो जाने से बेहतर कोई नेक काम नहीं है, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हर नेकी से बेहतर एक और नेकी है लेकिन शहादत सबसे बेहतरीन नेकी है

विलायत पोर्टल : मौत एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही हमारे दिमाग़ में बहुत सारे ख़्याल आने लगते हैं, क़ब्र के अज़ाब से लेकर पुले सेरात और जहन्नम के अज़ाब तक का मंज़र दिमाग़ में घूमने लगता है। मौत एक ऐसी सच्चाई है जिसको किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हो लेकिन वह मौत का इंकार करता नहीं दिखाई देता, या यूं कहा जाए इस धरती पर अल्लाह का इंकार करने वाले मिलते हैं लेकिन मौत का इंकार करने वाला कोई नहीं मिलता। किसी भी देश का हो किसी भी धर्म का हो किसी भी जाति का हो सबका मानना है कि एक दिन मौत आनी है, कोई है जिस के क़ब्ज़े में ज़िंदगी और मौत है वह जिसको जब चाहे मौत दे सकता है। इस्लामी निगाह से अगर देखा जाए तो इस्लाम ने सामान्य और हादसे में होने वाली मौत के अलावा मौत और कितनी तरह की होती है यह भी बयान किया है जिसको हम यहां इस लेख में पेश कर रहे हैं।
दिलों की मौत
इस्लाम ने इंसान की रूह और उसके नफ़्स (दिल) को बहुत अहमियत दी है, इसी वजह से क़ुर्आन ने कठोर दिल वालों को मुर्दा ऐलान करते हुए पैग़म्बर स.अ. से कहा आप मुर्दा दिलों से अपनी बात नहीं मनवा सकते। (सूरए नम्ल, आयत 80, सूरए रूम, आयत 52) इसी तरह इमाम अली अ.स. ने उस इंसान के लिए फ़रमाया जो केवल दुनिया की चकाचौंध के पीछे भागा करता है “ दुनिया ने उसके दिल को मार दिया है”। (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 85)
नहजुल बलाग़ा में एक और जगह इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया कि जो लोग समाज में बुराई को पनपते हुए देखते हैं और हाथ पैर और ज़बान से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं देते यहां तक कि उन लोगों के दिल में भी उस बुराई के फैलने का कोई दर्द नहीं है, ऐसे लोग ज़िंदा लोगों के बीच रहने वाले मुर्दा लोग हैं। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 374) आपने मुनाजात में भी फ़रमाया कि ख़ुदाया गुनाहे कबीरा ने मेरे दिल को मुर्दा कर दिया है। (मुनाजात ख़मसता अशर)
समाज की मौत
जिस तरह इंसान मुर्दा होता है वैसे ही बुराईयों के विरुध्द ख़ामोश समाज भी मुर्दा हो जाता है, वह समाज जहां अच्छाईयों की ओर लोगों को आकर्षित न किया जाता हो, बुराईयों से रोका न जाता हो और अदालत और इंसाफ़ न पाया जाता हो वह मुर्दा समाज कहलाता है। इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि तुम्हारी मौत तुम्हारी हार में है और तुम्हारी ज़िंदगी संघर्ष ही से सही, पर अपने मक़सद को हासिल कर लेने में है, इस हदीस का मतलब यह है कि अपमानित जीवन ही मौत है (नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 51)
एक और हदीस में आपने फ़रमाया फ़क़ीरी और ग़रीबी सबसे बड़ी मौत है (नहतुल बलाग़ा, हिकमत 163) इन दोनों हदीसों की रौशनी में कहा जा सकता है कि वह समाज जिसमें संघर्ष न हो और मक़सद को हासिल करने की भूख न हो वह समाज मुर्दा है।
शहादत
सबसे अच्छी मौत अल्लाह की राह में शहादत है, इस्लाम में जितनी अहमियत शहादत को दी गई है उतनी किसी भी दूसरे मज़हब में नहीं दी गई है, क़ुर्आन में शहादत और शहीदों की महानता के बारे में अनेक आयतें मौजूद हैं, अल्लाह ने साफ़ शब्दों में लोगों से कहा है कि ख़बरदार अल्लाह की राह में शहीद होने वालों को कभी मुर्दा सोंचना भी मत, वह ज़िंदा हैं और अल्लाह से रोज़ी पा रहे हैं। (सूरए आले इमरान, आयत 169)
इमाम अली स.अ. इस बारे में फ़रमाते हैं कि अल्लाह की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, मेरे लिए बिस्तर पर मौत आने से बेहतर यह है कि मैं अल्लाह की राह में तलवार के एक हज़ार वार खा कर शहीद हो जाऊं। (ग़ोररुल हेकम, पेज 242) इस्लाम की निगाह में शहीद हो जाने से बेहतर कोई नेक काम नहीं है, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हर नेकी से बेहतर एक और नेकी है लेकिन शहादत सबसे बेहतरीन नेकी है (वसाएलुश-शिया, जिल्द 1, पेज 8)
जिस समय इंसान अल्लाह की राह में उसके दीन, इंसानियत, अदालत और पूरे समाज को बचाने के लिए शहीद होता है उस से बढ़ कर और कोई नेकी नहीं होती।
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