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Date of publication : 9/1/2018 4:4
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वहाबियत फ़ितने की जड़

इस वहाबी टोले ने अहले बैत अ.स. और उनके शियों से दुश्मनी रखते हुए शिया घराने में शादी करने को यह कह कर हराम क़रार दिया कि यह मुशरिक ओर काफिर होते हैं दूसरी ओर जब यहूदियों और ईसाईयों में शादी करने के बारे में पूछा गया तो उसको जायज़ बताते हैं इन दोनों फ़तवों को सामने रख कर हर अक़्ल रखने वाला मुसलमान इसी नतीजे पर पहुंचेगा कि वहाबियों की कोशिश केवल इस्लामी फ़िर्क़ों के बीच फूट डालना है और नफ़रत फैलाना है।

विलायत पोर्टल : इस्लामी समाज जो कि इस्लाम द्वारा बताए गए उसूलों पर चल रहा था और पूरी उम्मत में आपसी मोहब्बत और भाई चारा बांट रहा था, तौहीद और एकता के परचम के नीचे सभी मुसलमान जमा हो कर हर तरह की बुराई और बे दीनी से मुक़ाबला कर रहे थे, लेकिन अफ़सोस सातवीं सदी हिज्री में जैसे ही वहाबियत की पैदाइश हुई सारे मुसलमानों की एकता भंग होती दिखाई देने लगी। वहाबियों द्वारा मुसलमानों पर शिर्क और बिदअत जैसे आरोप लगा कर उनकी बीच भेदभाव की चिंगारी लगा दी, नबियों और अल्लाह के ख़ास बंदों की महानता को कम कर के मुसलमानों में नफ़रत का बीज बो दिया, केवल यही नहीं बल्कि उन सभी साम्राज्यवादी ताक़तों के हाथों का खिलौना बनने के लिए हंसी ख़ुशी तैय्यार हो गए जो इस्लाम को मिटाना चाहते थे।
12वीं सदी हिज्री में मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब जो वहाबियत का असली प्रचारक था उसने मुसलमानों को पैग़म्बर स.अ. की क़ब्र की ज़ियारत करने और उनके वसीले से दुआ मांगने को शिर्क और बिदअत बता कर ऐसा करने वालों के काफ़िर होने और उन्हें क़त्ल कर के उनका घर और सामान लूटने का फ़त्वा दे दिया जिसके कारण हज़ारों मुसलमानों का ना हक़ ख़ून बहाया गया, आज भी उसी रास्ते पर चलते हुए बहाबी मुफ़्ती जो साम्राज्यवादी ताक़तों के हाथों बिक कर शियों के विरुध्द फ़तवे दिए जा रहे हैं जिस से न केवल मुसलमानों के असली दुश्मन की कमर मज़बूत कर रहे हैं बल्कि मुसलमानों के बीच नफ़रत और भेदभाव की दीवारें खड़ी कर रहे हैं।
जैसे दारुल फ़तावा सऊदी के सदस्य शैख़ अब्दुल्लाह इब्ने जिब्रीन ने शिया फ़क़ीरों को ज़कात दिए जाने से संबंधित सवाल किए जाने पर कहा कि ज़कात काफ़िर और बिदअत फैलाने वालों को नहीं दी जानी चाहिए, और राफ़ज़ी (शिया) बिना किसी संदेह के काफ़िर हैं इसलिए अगर किसी ने शियों को ज़कात दी है तो उस पर वाजिब है वह दोबारा ज़कात निकाले, क्योंकि उसने ऐसे लोगों को ज़कात दे दी जिनको देना हराम थी। इस वहाबी मुफ़्ती के बारे में कहा जाता है कि इसने और भी बहुत से फ़त्वे शियों के विरोध में दिये हैं, जिनमें से एक यह भी है कि शियों का क़त्ल करना जाएज़ है।
इसी तरह सऊदी की एक और फ़त्वा देने वाली कमेटी ने शियों से शादी करने के बारे में किए जाने सवाल के जवाब में कहा कि शियों और बे दीन लोगों से शादी जाएज़ नहीं है अगर किसी ने कर लिया तो उसका निकाह बातिल है, और इस वहाबी मुफ़्ती ने इस फ़त्वे की वजह जो बताई उससे इस संगठन की नीयत बिल्कुल ज़ाहिर है, वह शियों से शादी हराम होने की वजह का ज़िक्र करते हुए कहता है क्योंकि शिया अहले बैत अ.स. के वसीले से दुआ करते हैं उनके मज़ारों पर जाते हैं इसलिए वह सब मुशरिक हैं। (फ़तावल लुजना अल-दाएमा लिल-बुहूसिल इलमिय्यह वल इफ़ता, जिल्द 18, पेज 298)
यह वहाबी अहले बैत अ.स. की दुश्मनी में इस हद तक अंधे हो गए कि मुसलमानों को काफ़िर और मुशरिक बताने में शर्म तक महसूस नहीं करते क्योंकि दूसरी तरफ़ जब इसी कमेटी से ईसाई और यहूदी से शादी करने के बारे में पूछा गया तो कहा कि अहले किताब चाहे वह यहूदी हो चाहे ईसाई अगर वह बद किरदार न हों तो शादी करना जाएज़ है (फ़तावल लुजना अल-दाएमा लिल-बुहूसिल इलमिययह वल इफ़ता, जिल्द 18, पेज 315)
इन दोनों फ़तवों को सामने रख कर हर अक़्ल रखने वाला मुसलमान इसी नतीजे पर पहुंचेगा कि वहाबियों की कोशिश केवल इस्लामी फ़िर्क़ों के बीच फूट डालना है और नफ़रत फैलाना है। यह वहाबी संगठन वही है जिसने न केवल शिया बल्कि सुन्नी फ़िर्क़े पर भी रहम नहीं किया, पूरी दुनिया के सामने इराक़, सीरिया, यमन और दूसरे इस्लामी देशों की हालत सामने है जहां जहां साम्राज्यवादी शक्तियों ने पैर फैलाने की कोशिश की है यह टोला हर जगह उनकी मदद करने पहुंच गया है और हद तो यह हो गई जिहादुन-निकाह जैसे घटिया और नीच विचार पेश कर के इन्होंने औरत के प्रति अपने सम्मान और मर्यादा को भी ज़ाहिर कर दिया जिसके कारण पूरी दुनिया में न केवल मुसलमानों को शर्मिंदा होना पड़ा बल्कि इस्लाम का मज़ाक़ भी उड़ाया गया।
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