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Date of publication : 11/1/2018 5:31
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हम क्यों कहते हैं कि जानवरों में भी समझ होती है ? क़ुर्आन की निगाह से

पुराने युग में लोग ख़ास कर हज में क़ुर्बानी के मौक़े पर अपने जानवरों के पहचान के लिए उनके चेहरे पर गर्म लोहे से एक निशानी लगा देते थे, पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. ने इस प्रकार की किसी भी निशानी लगाने से मना कर दिया और यह भी कहा कि इन के चेहरे पर कोड़े या लकड़ी इत्यादि से मत मारो, क्योंकि यह भी अल्लाह की प्रशंसा और तारीफ़ और उसकी तसबीह पढ़ते हैं।

विलायत पोर्टल :  क़ुर्आन की आयतों और अहलेबैत अ. की हदीसों से यह बात इस प्रकार मालूम होती है.....
1. हज़रत सुलैमान अ. अपनी फ़ौज के साथ के साथ एक जगह से जा रहे थे, तभी अचानक एक चींटी ने अपनी साथी चीटियों से कहा जल्दी जल्दी अपने अपने घरों (बिलों) में चली जाओ, कहीं ऐसा न हो कि सुलैमान अ. का लश्कर तुम को रौंद दे।
2. पुराने युग में लोग ख़ास कर हज में क़ुर्बानी के मौक़े पर अपने जानवरों के पहचान के लिए उनके चेहरे पर गर्म लोहे से एक निशानी लगा देते थे, पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. ने इस प्रकार की किसी भी निशानी लगाने से मना कर दिया और यह भी कहा कि इन के चेहरे पर कोड़े या लकड़ी इत्यादि से मत मारो, क्योंकि यह भी अल्लाह की प्रशंसा और तारीफ़ और उसकी तसबीह पढ़ते हैं।
3. इमामे सादिक़ अ. फ़रमाते हैं कि, कोई शिकारी किसी भी पशु और पक्षी का शिकार उस समय तक नहीं कर सकता जब तक वह अल्लाह की तसबीह करना छोड़ न दे।
4. हुदहुद ने जब आसमान पर अल्लाह के शरीक बनाने के बारे में सुना उसी समय उसने जनाबे सुलैमान अ. को बता दिया। 5. क़ुर्आन का ऐलान है कि, इस संसार का हर जीव जंतु अल्लाह की तसबीह पढ़ता है।
6. अल्लाह का क़ुर्आन में फ़रमान है कि, संसार के सभी जीव जंतु अल्लाह का सजदा करते हैं।
7. परिंदे हज़रते सुलैमान अ. की मीटिंग में उपस्थित होते और उनकी बातों को सुनते थे। ( हज़ार व एक नुकते अज़ क़ुर्आने करीम, पेज 549-550)
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