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Date of publication : 14/1/2018 19:9
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इमाम रज़ा अ.स. के हरम मे शिया होने वाले वहाबी जवान का इंटरव्यू

आलिम जिनके चेहरे से ही महानता दिख रही थी पास में रखी कुर्सी पर बैठ कर लोगों से कहा कि अगर किसी को कोई सवाल पूछना हो तो पूछ सकता है, उन आलिम के मुंह से यह बात सुन कर मुझे आश्चर्य हुआ, और उसकी वजह यह थी कि वहाबी शियों की किताबों को न पढ़ने पर बहुत ज़ोर देते और कहते कि शियों की किताबें पढ़ने से इंसान हक़ से दूर हो जाता है, और शिया आलिम का इस तरह कहना भी मेरे लिए आश्चर्यजनक था कि जिस को जो सवाल हो पूछ सकता है और वहाबियों में किसी को भी किसी तरह के सवाल पूछने का कोई हक़ नहीं था।

विलायत पोर्टल :  ईरान के ख़ूज़िस्तान शहर का रहने वाला एक जवान जो वहाबियों के विचारों से इतना प्रभावित था कि शियों को मारने के लिए उनके बीच ख़ुद को बम से उड़ा देने को तैय्यार था लेकिन उसके जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं पेश आईं कि वह अपने आप को अहलेबैत अ.स. के दरवाज़े से और अधिक दूर नहीं रख सका, हम इस लेख में उस जवान के इंटरव्यू के कुछ भाग को आपके लिए पेश कर रहे हैं। सबसे पहले शियों के बारे में उसके विचारों के बारे में पूछे जाने पर उसने जवाब दिया कि मुझे शियों से बहुत अधिक नफ़रत थी क्योंकि मैं वहाबियों के चैनल और उनकी किताबों द्वारा पूरी तरह से वहाबियत के विचारों से प्रभावित हो चुका था, इसी तरह रात में वह हमारे घरों में मैगज़ीन की तरह छोटी छोटी किताबें चुपके से डाल देते थे जिसमें वह क़ुर्आन की ग़लत और मनमानी तफ़सीर करके अपने अक़ीदों जैसे अल्लाह के हाथ होते हैं, उसका चेहरा भी है इस तरह की विचारों को लिखते थे। इसी तरह उस शिया होने वाले जवान ने यह भी बताया कि वहाबियत के अपने विचारों और अक़ीदों के पीछे छिपा सबसे बड़ा राज़ शिया दुश्मनी है, वह शिया मज़हब की दुश्मनी में किसी भी हद तक जा सकते हैं।
वहाबी चैनलों द्वारा किन विचारों को अधिक फैलाया जाता है, इस सवाल के जवाब में कहा कि उनका सबसे अधिक ध्यान इस ओर है कि जितना हो सके शियों को काफ़िर कहा जाए और शियों के अक़ीदों पर संदेह जताया जाए और उनको बिदअत और शिर्क कहा जाए, और अब इन बहाबियों ने शिया मराजे और उलमा का भी अपमान शुरू कर दिया है, और यहां तक कि ख़ुम्स जैसे हुक्म जिसको क़ुर्आन ने साफ़ शब्दों में बयान फ़रमाया उसका इंकार करते हुए मराजे को ख़ुम्स ले कर उसको ज़रूरतमंदों पर ख़र्च किए जाने का मज़ाक़ उड़ाते हैं। शियों से उनके दिल में पाई जाने वाली नफ़रत के बारे में जब उससे पूछा गया तो उसने कहा मैं वहाबियों के विचारों और बातों से प्रभावित हो कर शियों से इस हद तक नफ़रत करने लगा था कि मैं शियों को बुरी मौत मारने के लिए आत्मघाती हमले तक के लिए तैय्यार था, क्योंकि वहाबियों ने अपने इस जैसे अक़ीदों से हमारे दिलों में शियों के लिए और भी नफ़रत भर दी थी कि जो भी 7 शियों को मारेगा वह सीधे जन्नत में जाएगा और जाने के बाद सबसे पहला खाना पैग़म्बर स.अ. के साथ खाएगा, और एक नई और अजीब बात जो मेरे लिए थी वह यह कि वहाबी मुझ से यह भी कह रहे थे कि चम्मच अपने साथ रखना ताकि जन्नत में खाना खाने में आसानी रहे। जब इस जवान से शिया होने के बारे में सवाल किया कि ऐसा क्या हुआ जिससे प्रभावित हो कर शिया मज़हब क़ुबूल किया तो इस प्रकार जवाब दिया कि मेरे घर ही क्या पूरे ईरान में उदारवादी सुन्नी ही रहते हैं, मेरे घर वाले चूंकि बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए हर मामले में मेरी ही बात मानते थे, कोई भी शरई सवाल होता था मुझ से ही पूछते थे, लेकिन मुझे शियों से इतनी नफ़रत थी कि मैं शियों को बर्बाद कर देना चाहता था।
फिर वह बयान करता है कि हुआ कुछ यूं कि मैं 19 साल का था तो मुझे पता चला कि एक वहाबियों का सरगना ख़ूज़िस्तान के कुछ जवान वहाबियों को सऊदी ले जाना चाहता है ताकि वह वहां जाकर चैनलों से किस तरह शियों के विरुध्द ज़हर उगलना है सीख सकें, और उसके बदले में लक्ज़री गाड़ी, शानदार बंगला और शादी के लिए ख़ूबसूरत लड़की का प्रबंध किया जाएगा, मैंने सोंचा कि मैं ईरान में रह कर करूंगा भी क्या और ख़ुद को बम से उड़ाने से शियों के साथ मैं भी मरूंगा उस से न मुझे कुछ मिलेगा न मेरे घर वालों को, कम से कम सऊदी जाऊंगा कुछ सीखूंगा भी और बदले में एक अच्छी ज़िंदगी भी मिलेगी और मैं वहाबियत को सबसे अच्छा मज़हब भी साबित कर सकूंगा, काफ़ी सोंच विचार के बाद दिमाग़ में यह बात आई कि ऐसे सुनी सुनाई बात के लिए सऊदी जाना और यह सब करने से से पहले ख़ुद जा कर क़रीब से शियों को देखा जाए कि कौन सी बिदअत वह अंजाम देते हैं, ताकि कल जब मैं शियों का विरोध करूं और कोई मुझ से सवाल पूछे तो मैं कह सकूं कि मैंने शियों को लोहे के दरवाज़े और चांदी की ज़रीह चूमते और अल्लाह के अलावा दूसरों से मदद मांगते हुए देखा है, मैं सोंच ही रहा था कि कहां जाऊं तभी मेरे दिमाग़ में ख्याल आया कि मशहद जहां इमाम रज़ा अ.स. का रौज़ा है उससे अच्छी जगह मेरे लिए नहीं हो सकती ।
मैं इमाम रज़ा अ.स. के रौज़े पर गया वहां के ख़ादिम से ज़रीह का पता पूछ कर ज़रीह की ओर जाने लगा, ज़रीह से कुछ मीटर पहले देखा कुछ लोग जमा हैं और अपने आलिम से सवाल जवाब करके दीनी मालूमात हासिल कर रहे हैं और वहीं पर दारुल क़ुर्आन भी है जहां शिया क़ारी तिलावत करता है और सब लोग क़ुर्आन ले कर ध्यान से सुनते और धीरे धीरे दोहराते हैं, मैं कुछ क़दम आगे बढ़ा और जैसे ही मैं उधर पहुंचा मेरे दिमाग़ में सवाल आया, मैं उन लोगों के पास पहुंचा तो देखा उन आलिम जिनके चेहरे से ही महानता दिख रही थी पास में रखी कुर्सी पर बैठ कर लोगों से कहा कि अगर किसी को कोई सवाल पूछना हो तो पूछ सकता है, उन आलिम के मुंह से यह बात सुन कर मुझे आश्चर्य हुआ, और उसकी वजह यह थी कि वहाबी शियों की किताबों को न पढ़ने पर बहुत ज़ोर देते और कहते कि शियों की किताबें पढ़ने से इंसान हक़ से दूर हो जाता है, और शिया आलिम का इस तरह कहना भी मेरे लिए आश्चर्यजनक था कि जिस को जो सवाल हो पूछ सकता है और वहाबियों में किसी को भी किसी तरह के सवाल पूछने का कोई हक़ नहीं था। वहीं पर खड़े खड़े मेरे दिमाग़ में सवाल आया कि जब यह शिया आलिम कह ही रहा है कि जिसका जो सवाल हो पूछे तो क्यों न मैं इनको मुनाज़िरे के लिए कहूं, और मुझे यक़ीन है कि यह मना कर देंगे, फिर मेरे सऊदी जाने के सभी रास्ते हल हो जाएंगे, क्योंकि वहाबियों द्वारा मुझे यही सिखाया गया था कि दुनिया का सबसे अच्छा मज़हब वहाबियत है इसलिए मैं भी यही सोंच रहा था कि मेरे सवालों का इनके पास कोई जवाब नहीं होगा और मैं फिर सऊदी और दूसरी जगहों पर हर किसी से कह सकता हूं कि मैं ने शियों के गढ़ ईरान और वहां पर भी सबसे बड़ी मज़हबी जगह इमाम रज़ा अ.स. के रौज़े पर शिया आलिम से मुनाज़िरे के लिए कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया, यही सब सोंच सोंच के मैं फूले नहीं समा रहा था। मैंने वहीं पास में खड़े हरम के ख़ादिम से कहा कि मैं सुन्नी हूं क्या यह आलिम जो सामने कुर्सी पर बैठे हैं मुझ से मुनाज़िरा करने के लिए तैयार हैं? उसने कहा बिल्कुल, मैं यह सुन कर दंग रह गया, लेकिन अपने को किसी तरह संभाला और बहलाया कि ऐसे ही इसने कह दिया होगा, वह ख़ादिम गया और उस आलिम के कान में जा कर मेरे बात कह दी, मुझे अंदर से डर लगने लगा कि कहीं ऐसा न हो यह आलिम इस पूरी भीड़ जो आलिम के सामने बैठी है इनसे इशारा कर के कह दें और यह लोग मुझ पर टूट पड़ें, मैं धीरे धीरे पीछे की ओर हटने लगा और ऐसी जगह पर खड़ा हो गया कि अगर लोग मेरी ओर आएं तो मैं वहां से भाग सकूं।
उस आलिम ने ख़ादिम की बात सुनने के बाद मुझे सलाम किया और अपने पास बुलाया, मैं यह देख कर बहुत हैरान था और बहुत धीरे धीरे आगे की ओर बढ़ रहा था कि कहीं ऐसा न हो जैसे ही पब्लिक के बीच पहुंचते ही यह मुझे मारने को न कह दें, लेकिन मैं उनके बीच पहुंचा तो जैसा सोंच रहा था सब उसके उलटा पा रहा था, लोग किनारे हो कर मुझे रास्ता देते हुए सम्मानजनक तरीक़े से और आगे बुला रहे थे, वह आलिम मुझ से बहुत अच्छे अख़लाक़ से मिल रहे थे मेरा हाल चाल पूछ रहे थे, मैं जब क़रीब पहुंच गया तो पूछा कि आप सच में मुनाज़िरा करेंगे तो उन्होंने कहा बिल्कुल।
उनके तुरंत मुनाज़िरे के लिए तैय्यार हो जाने पर मैं अचंभित रह गया था, मैंने कहा मेरी दो शर्ते हैं, पहली यह कि सभी दलीलें अहले सुन्नत की बड़ी और मान्य किताबों से होना चाहिए और दूसरी यह कि अगर तुम हक़ पर हुए तो मैं शिया हो जाऊंगा और अगर मैं हक़ पर हुआ तो तुमको और इन सभी यहां बैठने वालों को सुन्नी होना पड़ेगा। मेरी शर्तें सुनने के बावजूद वह तुरंत तैयार हो गए, मैं सोंचने लगा हमारे आलिम बिना पहले से बताए हुए और बिना तैयारी के मुनाज़िरा करते नहीं, और उसमें भी इतनी शर्तें लगा देते हैं कि सामने वाला परेशान हो जाए और शिया आलिम न केवल मुनाज़िरे के लिए बिना शर्त तैयार हो गए बल्कि इतने सारे लोगों के मज़हब बदलने की ज़िम्मेदारी भी ले ली।
हमारा मुनाज़िरा शुरू हुआ और शाम सात बजे से सुबह की नमाज़ से आधा घंटा पहले तक चला, और मैं अपने हर अक़ीदे और हर सवाल में हार सामना कर रहा था क्योंकि उनकी एक एक दलील और उनका एक एक जवाब इतना मज़बूत और हमारी ही किताबों से था कि मेरे होश उड़े जा रहे थे, मैं सोंच रहा था दो चार सवाल ही में इन को ला जवाब कर दूंगा लेकिन यहां सब कुछ उल्टा हो चुका था, कहां मैं उनके अक़ीदे और विचारों पर आपत्ति जताने आया था कहां हमारे अपने अक़ीदे बचाने भारी पड़ रहे थे, मैंने काफ़ी कोशिश की कि अपने अक़ीदों को बचा सकूं लेकिन उनके सवालों ने मुझे अपने ही अक़ीदों और विचारों के बारे में सोंचने पर मजबूर हो गया।
जब उससे पूछा गया कि किन किन विषय पर मुनाज़िरा किया तो उसने बताया कि अहकाम से लेकर अक़ाएद और भी दूसरे बहुत से सवाल अलग अलग विषय पर मैंने किए, लेकिन सबसे अहम मेरे लिए ग़दीर का विषय था जिसके लिए उन्होंने ऐसी दलीलें दी कि मैं बिल्कुल गूंगा हो गया और मेरे पास बोलने के लिए कुछ रह ही नहीं गया था, उनके अधिकतर जवाब क़ुर्आन, सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम से ही थे इसलिए मेरे पास कोई बहाना रह ही नहीं गया था, एक बार सोंचा कि उठ कर निकल जाऊं लेकिन दिल में ख़्याल आया कि पैग़म्बर स.अ. को तो मैं भी मानता हूं अगर कल क़यामत में पैग़म्बर स.अ. ने मुझ से सवाल कर लिया कि जब हक़ तुम्हारे लिए ज़ाहिर हो चुका था फिर तुम ने क्यों क़ुबूल नहीं किया उस समय क्या जवाब दूंगा......
जब उससे मुनाज़िरे का अंत पूछा गया तो उसने कहा, होना क्या था मैं वहीं खड़ा हुआ और इमाम रज़ा अ.स. की ज़रीह को तरफ़ मुड़ा और वहीं से अल्लाह की वहदानियत, पैग़म्बर स.अ. की रिसालत और इमाम अली अ.स. की विलायत की गवाही दे कर मैंने अपने शिया होने का ऐलान कर दिया।
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