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Date of publication : 17/1/2018 6:0
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दाइश को पश्चिमी देशों के समर्थन का कारण, सुन्नी आलिम ने खोली पोल ।

साम्राज्यवादी ताक़तों का दाइश जैसे संगठन को लेकर आने का मक़सद हमारे ध्यान को बैतुल मुक़द्दस से हटाना है, इंशा अल्लाह वह दिन आएगा जब मुसलमान पूरी तरह से एकता और इत्तेहाद की मिसाल पेश करते हुए इन सारी कठिनाइयों को दूर करेंगे, मेरा यह मानना है कि इस्लाम विरोधी ताक़तों की बहुत छोटी सोंच होती है यही कारण है कि मुसलमानों द्वारा दाइश के इतने लंबे समय से मुक़ाबला करने के बाद पूरा साम्राज्यवाद बौखलाया हुआ है।

विलायत पोर्टल :  यह एक सुन्नी आलिम का इंटरव्यू है जो मशहद के एक गांव में हज़रत बिलाल नामी मस्जिद के इमाम जमाअत हैं, आपका नाम मोलवी मोहम्मद रज़ा रहमती है आप ईरान के ज़ाहेदान शहर के एक बड़े मदरसे से तालीम हासिल करने के बाद पिछले 22 सालों से इस मस्जिद में तबलीग़ कर रहे हैं। हम यहां उन से पूछे गए सवाल और उनके जवाब को आपके सामने पेश कर रहे हैं।
सवाल- मोलवी साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया आप इस इंटरव्यू के लिए तशरीफ़ लाए, जैसा कि आप जानते हैं इस समय कई इस्लामी देश दाइश नामी संगठन की चुनौती को झेल रहे हैं जिसके कारण उन देशों के लोगों का जीवन काफ़ी प्रभावित है आपका इस बारे में क्या कहना है?
जवाब- जैसा कि आपने इशारा किया कि अफ़सोस के साथ आज कई इस्लामी देश दाइश नामी संगठन के कारण काफ़ी कठिन हालात का सामना कर रहे हैं, इस संगठन द्वारा छेड़ी गई जंग से उन देशों के मुसलमानों का जीवन ठप्प पड़ा है और उन लोगों को हर समय अपनी जान माल का ख़तरा बना रहता है, बहुत सारे शहर गांव तबाह हो गए, बहुत सारी जगहों पर वहां की बुनियादी ज़रूरतों को निशाना बना कर बर्बाद कर दिया, ऐसे समय में सभी इस्लामी देशों को एक साथ बैठ कर जल्द से जल्द कोई रास्ता निकाल कर अपने दीनी भाईयों की मदद करते हुए उनको इस परेशानी से बाहर निकालना चाहिए।
सवाल- आप इन हालात और परिस्थिति के पीछे किस का हाथ समझते हैं?
जवाब- पिछले कुछ सालों से अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी शक्तियां, दाइश की पूरी तरह से माली मदद कर के मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रही हैं, अनुभव से यह बात भी साबित है कि इस्लामी जगत का आपसी इत्तेहाद और एकता ही इस तरह की साज़िशों से मुक़ाबला और उनको नाकाम बनाने में मददगार रहा है, फूट डाल कर मुसलमानों को आपस में लड़वाने की दुश्मन की हमेशा से कोशिश रही है और यही इस्लामी देशों के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। सवाल- कुछ कट्टरपंथी अहले सुन्नत के नाम पर उन्हीं की किताबों से इस्लाम विरोधी प्रचार कर रहे हैं जिससे आम लोगों के दिमाग़ में इस्लाम और मुसलमानों का तीव्र चेहरा बनता जा रहा है इसके बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब- कोई भी अक़्ल रखने वाला इन कट्टर अक़ीदों और विचारों को नहीं क़ुबूल कर सकता, यह गिरोह (वहाबी) पैदा ही इसी लिए हुए हैं ताकि मुसलमानों के बीच फूट डाल कर और उनको आपस में लड़वा कर उनका ख़ून बहा कर उन्हें कमज़ोर कर सकें, और यही आपसी फूट और मुसलमानों का आपस में दुश्मनी रखना यहां तक कि ख़ून बहाने पर रहना इसी ने मुसलमानों की तरक़्क़ी पर रोक लगा रखी है, इस कट्टरपंथी टोले (वहाबी) ने इस्लाम की आड़ ले कर केवल इस्लाम को बदनाम किया है और इस संगठन का न केवल इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है बल्कि इनका इंसानियत ही से कोई रिश्ता नहीं है, और इन वहाबियों की साज़िशें अब बेनक़ाब हो चुकी हैं और कोई भी अहले सुन्नत दाइश को सुन्नी मानने को तैय्यार नहीं है।
सवाल- आपकी तरफ़ से सुन्नी जवानों के लिए इन वहाबी कट्टर विचारधाराओं से बचने के लिए क्या मशविरा है?
जवाब- जैसाकि पिछले सवाल के जवाब में इशारा किया कि साम्राज्यवादी ताक़तें हर तरह से इस कट्टरपंथी संगठन की फ़ंडिंग कर रही हैं ताकि अपने विचारों द्वारा जवानों की सोंच को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके, जिसके चलते हम सबकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है कि अपने जवानों से संबंध बनाए रखना चाहिए और उन्हें दुश्मन की साज़िश और उन साज़िशों से होने वाले भारी नुक़सान के बारे में उनको बताते रहें ताकि जवान उनके हाथ का खिलौना न बनने पाएं, आज जो भी घटनाएं हो रही हैं उनको इस्लाम से जोड़ कर दुनिया के सामने पेश करना केवल इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश है ताकि इस्लामी फ़िर्क़ों में फूट डाल कर उन्हें आपस ही में लड़ा कर ख़त्म कर दिया जाए, और साम्राज्यवादी शक्तियां अपने इसी मक़सद को हासिल करने के लिए दाइश जैसे वहाबी संगठनों की हर तरह से मदद करके उन्हें हम सब के विरुध्द इस्तेमाल कर के इंसानियत को पैरों तले रौंद रहे हैं।
सवाल- आज कुछ देशों में मुसलमानों को ले कर ऐसा माहौल बना दिया गया है जिस से इस्लाम के असली मुद्दे धुंधले होते जा रहे हैं इस बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब- 50 साल से अधिक होने वाले हैं इस्लाम का सबसे बड़ा मुद्दा अवैध राष्ट्र इस्राईल के ज़ायोनी दरिंदों का मुक़ाबला करते हुए बैतुल मुक़द्दस जो मुसलमानों का पहला क़िबला है उसको बचाना है, इस मिशन में अब तक काफ़ी ख़ून भी बह चुका है, इसलिए पूरी दुनिया के मुसलमानों को मज़लूम फ़िलिस्तीनियों का समर्थन करते हुए बैतुल मुक़द्दस की पूरी तरह से आज़ादी के लिए कोशिश जारी रखना चाहिए, मेरी निगाह में साम्राज्यवादी ताक़तों का दाइश जैसे संगठन को लेकर आने का मक़सद हमारे ध्यान को बैतुल मुक़द्दस से हटाना है, इंशा अल्लाह वह दिन आएगा जब मुसलमान पूरी तरह से एकता और इत्तेहाद की मिसाल पेश करते हुए इन सारी कठिनाइयों को दूर करेंगे, मेरा यह मानना है कि इस्लाम विरोधी ताक़तों की बहुत छोटी सोंच होती है यही कारण है कि मुसलमानों द्वारा दाइश के इतने लंबे समय से मुक़ाबला करने के बाद पूरा साम्राज्यवाद बौखलाया हुआ है।
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