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Code : 191697
Date of publication : 23/1/2018 19:32
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फिलिस्तीन

ज़ायोनी आतंकियों के काले करतूत

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार “इस गाँव में शादी समारोह हो रहा था, दूल्हा और दुल्हन यहूदी आतंकियों की भेंट चढ़ने वाले पहले लोग थे, पहले ज़ायोनी आतंकियों ने दूल्हा दुल्हन को 33 अन्य लोगों के साथ ज़मीन पर फेंक दिया फिर उन लोगों को दिवार की ओर मुंह कर के खड़ा कर दिया गया और सब पर गोलियां बरसा दी गयीं” ।


विलायत पोर्टल : क़ुस्तल युद्ध 2 अप्रैल 1948 को हगाना , आर्गोन , पालमाख़ और अन्य ज़ायोनी आतंकी संगठनों के 5 हज़ार आतंकियों ने फिलिस्तीन के संवेदनशील माने जाने वाले क़ुद्स के क़ुस्तल नामक गाँव पर हमला कर यहाँ क़ब्ज़ा कर इस क्षेत्र के मूल निवासियों को निकाल दिया । क़ुस्तल युद्ध वास्तव में ब्रिटेन के अधीनस्थ फिलिस्तीन पर आधिपत्य जमाने की शुरुआत थी इस युद्ध में फिलिस्तीन के प्रख्यात योद्धा और बहादुर नेता अब्दुल क़ादिर हुसैनी भी घमसान की जंग के बाद शहीद हो गए ।
दैरे यासीन का क़त्ले आम
9 अप्रैल 1948 को बैगेन के नेतृत्व जो बाद में अवैध राष्ट्र का प्रधानमंत्री भी बना, हगाना आतंकियों ने क़ुस्तल के निकट दैरे यासीन गांव पर हमला किया ओर भयानक झड़पों के बाद इस गांव पर भी अधिकार जमा लिया । इन आतंकियों ने इस क्षेत्र में भयानक क़त्लेआम किया, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार “इस गाँव में शादी समारोह हो रहा था, दूल्हा और दुल्हन यहूदी आतंकियों की भेंट चढ़ने वाले पहले लोग थे, पहले ज़ायोनी आतंकियों ने दूल्हा दुल्हन को 33 अन्य लोगों के साथ ज़मीन पर फेंक दिया फिर उन लोगों को दिवार की ओर मुंह कर के खड़ा कर दिया गया और सब पर गोलियां बरसा दी गयीं” ।
इस जनसंहार का नेतृत्व करने वाला तथा बाद में अवैध राष्ट्र का प्रधानमंत्री बनने वाला बैगेन गर्व से कहता था कि दैरे यासीन की घटना हमारे लिए अप्रत्याशित और अत्यंत महान घटना थी । दैरे यासीन की घटना सुनने के बाद अरब लोगों में भय और दहशत उत्पन्न हो गयी और वह जब भी हमारे क़दमों की आहट सुनते थे तो डर के मारे हमारे सामने से भाग जाते थे । यहाँ तक कि दैरे यासीन की घटना और भयानक जनसंहार के डर से अतिगृहित भूमि में रह रहे 800 हज़ार अरब लोगों में से सिर्फ 165 हज़ार लोग शेष रह गए बाक़ी सब यह क्षेत्र छोड़ कर भाग गए ।
दैरे यासीन के जनसंहार में ज़ायोनी आतंकियों ने 250 से अधिक मर्द औरत और बच्चों का क़त्ले आम किया लेकिन विश्व समुदाय ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई , सिर्फ मुस्लिम ब्रदरहुड के जवानों ने इस घटना के कुछ दिन बाद दक्षिणी फिलिस्तीन के नक़ब क्षेत्र में ज़ायोनियों को हमले का निशाना बनाते हुए कुछ लोगों को मौत के घाट उतारा ।
पश्चिमी क़ुद्स, हैफा और याफा पर ज़ायोनी क़ब्ज़ा 
18 अप्रैल 1948 को ब्रिटेन ने कुछ फिलिस्तीनी क्षेत्रों को ख़ाली कर दिया वास्तव में ब्रिटेन ने अपने इस क़दम से फिलिस्तीन में यहूदियों के आगमन को हरी झंडी दी थी ।
22 अप्रैल को हगाना आतंकियों ने हैफा पर अधिकार कर लिया और वहां के फिलिस्तीनी मूल के नागरिकों को बाहर निकाल दिया । 30 अप्रैल को पश्चिमी क़ुद्स पर नियंत्रण कर यहाँ के अरब नागरिकों को इस शहर से निकलने के लिए मजबूर कर दिया. ज़ायोनी आतंकियों की इस करतूत के कारण इस्लामी जगत में आक्रोश की लहर दौड़ गयी, जगह जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे और जनता के दबाव को देखते हुए सीरिया और लेबनान सरकार ने 1 मई को फैसला किया कि फिलिस्तीन पर ब्रिटिश अधिकार के समाप्त होते ही यह देश फिलिस्तीन पर ज़ायोनी क़ब्ज़ा समाप्त करने तथा फिलिस्तीन की आज़ादी के अपनी सेना भेजेंगे । इन सबके बाद इराक ने भी ऐलान कर दिया कि वह अपने सैनिकों को जॉर्डन में तैनात करेगा ताकि वहां से फिलिस्तीन में दाखिल हो सकें।
इस समय फ़्रांस के विमान ज़ायोनी आतंकियों को भारी मात्रा मे हथियार पहुंचा रहे थे ज़ायोनी आतंकी फ़्रांस और अन्य देशों से मिल रही सहायता के बलबूते फिलिस्तीन पर नियंत्रण करते जा रहे थे और इस देश के मूल नागरिकों को निकालने का क्रम जारी रखे थे ।
10 मई को ज़ायोनी सेना याफा में घुस आई, 11 मई को सफ़द और उसके आस पास के क्षेत्रों पर भी ज़ायोनी गुटों का क़ब्ज़ा हो गया । 10 मई को मिस्र ने ऐलान किया कि वह 15 मई के बाद अपनी सेना को फिलिस्तीन भेजेगा , लेकिन जॉर्डन सेना ने इस तारीख से पहले ही ज़ायोनी छावनी पर हमला कर दिया लेकिन अपनी कमज़ोर सेना के कारण ज़ायोनी आतंकी संगठनों के मुक़ाबले में कोई परिणाम हासिल नहीं कर सकी और परास्त हो गयी ।
हगाना ने इसी समय बेसान समेत फिलिस्तीन के कई अन्य शहरों पर भी क़ब्ज़ा जमा लिया जिस के बाद उसके लिए अन्य क्षेत्रों विशेष कर क़ुद्स पर क़ब्ज़ा जमाने का मार्ग और आसान हो गया ।
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