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Date of publication : 25/1/2018 12:22
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हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़बानी

क्यूं अहलेबैत अ. हज़रत सलमान फ़ारसी से मोहब्बत करते थे?

सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई ने शनिवार 20 जनवरी को अपने दर्से ख़ारिज में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अ. के हवाले से एक रिवायत बयान की और उसके संदर्भ में हज़रत सलमान फ़ारसी की विशेषताओं पर रौशनी डाली........

विलायत पोर्टलः सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई ने शनिवार 20 जनवरी को अपने दर्से ख़ारिज में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अ. के हवाले से एक रिवायत बयान की और उसके संदर्भ में हज़रत सलमान फ़ारसी की विशेषताओं पर रौशनी डाली।
بسم اللَّه الرّحمن الرّحیم. الحمد للّه ربّ العالمین و الصّلاة و السّلام علی سیّدنا محمّد و آله الطّاهرین و لعنة اللّه علی اعدائهم اجمعین. «عَن مَنصورِ بنِ بَزرَج، قال: قُلتُ لِأَبی عَبدِاللّهِ الصّادِق (علیه السّلام): ما أَکثَرَ ما أَسمَعُ مِنکَ یا سَیِّدی ذِکرَ سَلمانَ الفارسی»،
मंसूर इब्ने बज़रज का कहना है कि मैने इमाम जाफर सादिक़ अ. से कहा कि आप कितना ज्यादा सलमान फारसी का नाम लेते हैं और बराबर उन्हें याद करते रहते हैं, (इस रिवायत से पता चलता है कि इमाम जाफ़र सादिक़ अ. हमेशा सलमान फारसी की बात करते रहते थे और बात बात पर उन्हें याद करते थे यहां तक मंसूर आश्चर्य में पड़ गए कि आखिर क्या वजह है कि इमाम सलमान फारसी को इतना ज़्यादा याद करते हैं)।
इमाम सादिक अ. ने मंसूर के जवाब में फ़रमायाः (لاتَقُل «الفارسی» وَ لکِن قُل سَلمانَ المُحَمَّدی») उन्हें सलमाने फ़ारसी मत कहो बल्कि उन्हें सलमाने मुहम्मदी कहा करो। और पैग़म्बर का यह कहना सलमान फारसी के दीन से अटूट सम्बंध को दर्शाता है और इसका हरगिज़ यह मतलब नहीं कि पैग़म्बर स. ने फार्स क़ौम को कमरंग करने के लिए ऐसा कहा है बल्कि दूसरी कई जगहों पर आपने फार्स वालों की तारीफ की है। बल्कि पैग़म्बर स. का कहने का मक़सद यह है कि इस इंसान का स्थान उससे कहीं ज़्यादा बड़ा है कि उसे किसी क़ौम द्वारा पहचाना जाए बल्कि उसकी पहचान दीन और पैग़़म्बर की वजह से है और मानो वह पैग़म्बर के बेचे के समान है।
«أَ تَدری ما کَثرَةُ ذِکری لَه؟»
इमाम सादिक़ अ. ने मंसूर से फ़रमाया जानते हो क्यूं में अकसर सलमान का नाम लेता रहता हूं और उन्हें याद करता रहता हूं? («قُلتُ: لا. قال: ثَلاثِ خِصالٍ»)
मंसूर ने जवाब दिया कि नहीं तो आपने फ़रमाया उनमें तीन ऐसी बातें थीं जिसकी वजह से मैं उनका सम्मान करता हूं, उनका नाम लेता रहता हूं और उनसे मुहब्बत करता हूं («أَحَدُها: ایثارُه هَوی أَمیرِالمُؤمِنین (علیه السّلام) عَلی هَوی نَفسِه»)
उनमें से एक यह कि वह हमेशा अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अ. की मर्ज़ी को अपनी मर्ज़ी पर प्राथमिकता देते थे। इससे यह पता चलता है कि ऐसा कई बार हुआ कि अमीरूल मोमिनीन अ. कुछ और चाह रहे हों और सलमान कुछ और लेकिन सलमान अपनी चाहत की अंदेखी करते हुए इमाम की मर्ज़ी को अपनाएं।
(«وَ الثّانیَة: حُبُّهُ لِلفُقَراء وَ اختیارُه اِیّاهُم عَلی أَهلِ الثَّروَةِ وَ العَدَد»،)
दूसरी विशेषता जो सलमान के अंदर थी वह यह कि ग़रीबों,  फ़क़ीरों और ज़रूरतमंदों से मुहब्बत करते थे। आज दुनिया में बहुत से लोग हैं जो गरीबों से नफ़रत करते हैं, उनके साथ उठना बैठना उन्हें पसंद नहीं आता लेकिन सलमान ऐसे नहीं थे बल्कि वह ग़रीबों से मुहब्बत करते थे पैसे वालों के मुक़ाबले में उन्हें ज़्यादा अहमियत देते थे।
मान लीजिए अगर कभी एक ग़रीब और एक अमीर से उनका सामना होता तो पहले ग़रीब को सलाम करते पहले ग़रीब से मिलते या अगर अमीर व ग़रीब दोनों के घर जाना होता तो पहले ग़रीब के घर जाते।
और सलमान की तीसरी विशेषता यह थी कि
(«وَ الثّالِثَة: حُبُّهُ لِلعِلمِ وَ العُلَماء»)
वह इल्म और उलमा से मुहब्बत करते थे।
यह तीन ऐसी बाते थीं जिसने उन्हें उस स्थान पर पहुंचा दिया था कि इमाम जाफ़र सादिक अ. भी उनका सम्मान करते थे और उन्हें हमेशा याद करते थे।


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