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Date of publication : 29/1/2018 17:3
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इस्राईल के मिटते ही वहाबियत भी ख़त्म

अगर आप दूसरे विश्व युध्द पर ध्यान दें तो यह बात और अच्छी तरह से साफ़ हो जाती है, क्योंकि यही वह समय था जब यहूदी संगठन इस्राईल नामी देश बनाने में जुटे थे और तभी बहाबी टोले ने अपनी कट्टरता और कुछ विचारों को पेश कर के सभी मुसलमानों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया ताकि मुसलमान इन्हीं शिर्क कुफ़्र के फ़तवों में उलझ कर रह जाएं और यहूदियों का काम (इस्राईल नामी देश का गठन) आसान हो जाए।


विलायत पोर्टल : वहाबियत शब्द मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के नाम से लिया गया है जो 12वीं शताब्दी में गुज़रा है, इसने अपनी गतिविधियां सऊदी के अय्यह से शुरू कीं, हक़ीक़त में इसने इब्ने तैमिया के 7वीं और 8वीं शताब्दी में पाए जाने वाले विचारों को दोबारा ज़िंदा किया, इब्ने तैमिया और मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब दोनों के विचार की बुनियाद कट्टरता पर रखी हुई थी और किसी मामले में किसी भी तरह के आपसी भाईचारे को नहीं मानते थे।
इसी तरह शिर्क के मतलब को तोड़ मरोड़ कर और ग़लत तरीक़े से बयान किया, यानी शिर्क का मतलब जो इन दोनों ने बयान किया उसके हिसाब से न केवल शिया बल्कि अधिकतर सुन्नी भी मुशरिक हैं, मुशरिकों के साथ जंग को बढ़ा चढ़ा कर पेश करते हैं और यहूदियों के बारे में उनके अत्याचारों को देखते हुए भी मुंह नहीं खोलते, हक़ीक़त में यह लोग दो काम करते हैं, पहला यह कि सारा फ़ोकस हर किसी को मुशरिक बना कर उनसे जंग करने पर करते हैं, दूसरा शिर्क का मनचाहा मतलब बता कर मुसलमानों को मुशरिक बनाते हैं जिसके कारण मुसलमानों के बीच आपस में कलह और मतभेद पैदा होते हैं और एक दूसरे के दुश्मन बन कर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाते हैं।
हालांकि जब हम इतिहास का अध्ययन करते हैं तो हमें साफ़ नज़र आता है कि यहूदियों ने भी छिप कर मुसलमानों के विरुध्द यही साज़िश रची है यह और बात है कि ख़ुद को इस साज़िश का हिस्सा न ज़ाहिर करने के लिए बहुत से रास्ते अपनाए है।
वहाबियत की विचारधारा सामने आने के बाद एक अहम सवाल दिमाग़ में आता है जिससे वहाबियत और यहूदियत का सीधा संबंध सामने आ जाता है, हमारा सवाल यह है कि वहाबियों की विचारधारा जो कि अक़्ल और फ़ितरत के ख़िलाफ़ थी और न केवल शिया और सुन्नी उलमा बल्कि मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के अपने भाई ने इसके विचारों और अक़ीदों का विरोध किया है, इसी तरह बहुत से मक्के और मदीने के बड़े बड़े सुन्नी उलमा और मुफ़्ती भी इस विचारधारा के ख़िलाफ़ थे, इतने विरोध के बाद आख़िर वहाबियत की विचारधारा कैसे पूरे सऊदी में फैल गई? 
इतिहास के अध्ययन से यह बात भी साफ़ हो जाती है कि वहाबियत के अक़ीदों और विचारों को ज़ोर ज़बरदस्ती से फैलाया गया है यानी जिस किसी ने वहाबियत की विचारधारा को नहीं अपनाया और उसके हिसाब से अमल नहीं किया उसको अपनी जान गंवानी पड़ी। इस वहाबी टोले ने क़ुर्आन की आयत जिसमें मुशरिकों के क़त्ल की बात कही गई है उसकी ग़लत तफ़सीर बयान करते हुए ऐलान किया जो हमारे विचारों को क़ुबूल न करें और हमारे अक़ीदों के हिसाब से अमल न करे वह मुशरिक है और मुशरिक का क़त्ल वाजिब है, इनके विचारों और अक़ीदों में तर्क नाम की कोई चीज़ नहीं थी, मेरा सवाल यह है इतने विरोध और बड़े बड़े सुन्नी उलमा और मुफ़्तियों के विरोध के बाद इन वहाबियों के पास ताक़त और हथियार कहां से आ गए?
विशेष कर जिस दौर में लोग दीन और उलमा की बातों को सुनते और मानते थे और उलमा इनके अक़ीदों का खुला विरोध कर रहे थे यहां तक कि ख़ुद लोग भी इनकी बातों को बकवास बता रहे थे फिर यह इनकी ओर से की जाने वाली ज़ोर ज़बरदस्ती और यह तलवारें कहां से आ गई?
ज़ाहिर सी बात है यह कोई आम तलवारें नहीं थीं बल्कि इनके पीछे पैसा था और बड़ी बड़ी संस्थाओं और संगठनो का हाथ था। इस आधार पर हमें इस मामले पर इस तरह सोचना चाहिए कि जब सब विरोध कर रहे थे तो वहाबियों की ताक़त का स्रोत कौन था ?
आयानुश-शिया के लेखक सैय्यद मोहसिन जबल आमेली के बेटे ने इस बारे में बहुत ही बारीकी से रिसर्च की है जिसमें उन्होंने लिखा कि उनके क़बीले में आले सऊद की पांच छ: नस्ल पहले एक यहूदी मुहाजिर था उसने पैसा ख़र्च कर के एक पूरी टीम तैयार की थी। जिसका सीधा मतलब यह होता है कि यहूदियों का न केवल आले सऊद की पैदाइश में हाथ है बल्कि आले सऊद और वहाबियों के संबंध को इन्हीं यहूदियों ने मज़बूत किया था। समीक्षा और दस्तावेज़ के आधार पर इब्ने तैमिया की विचारधारा मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब द्वारा दोबारा ज़िंदा हुई, और वहाबी फ़िर्क़े के सरगना इस विचारधारा को पैसे और डरा धमका कर लोगों पर थोप रहे थे, क्योंकि वहाबी संगठन उस समय और अधिक उभर कर सामने आता है जब शिया और सुन्नी फ़िर्क़े के बीच दूरियां ख़त्म हो रही होतीं हैं और दोनों फ़िर्क़े मन मुटाव ख़त्म कर के क़रीब आ रहे होते हैं, और शिया सुन्नी के आपस में क़रीब आने और हाथ मिला कर साथ में खड़े होने से अगर सबसे अधिक किसी का नुक़सान है तो वह इस्राईल और ज़ायोनियों का है।
अगर आप दूसरे विश्व युध्द पर ध्यान दें तो यह बात और अच्छी तरह से साफ़ हो जाती है, क्योंकि यही वह समय था जब यहूदी संगठन इस्राईल नामी देश बनाने में जुटे थे और तभी बहाबी टोले ने अपनी कट्टरता और कुछ विचारों को पेश कर के सभी मुसलमानों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया ताकि मुसलमान इन्हीं शिर्क कुफ़्र के फ़तवों में उलझ कर रह जाएं और यहूदियों का काम (इस्राईल नामी देश का गठन) आसान हो जाए।
ज़रूरी नहीं कि यहूदी और वहाबी विचारधारा के आपसी संबंध के लिए किसी ख़ास इंसान को तलाश किया जाए, क्योंकि वहाबियों की हर चाल हर गतिविधि के पीछे यहूदी ही खड़े दिखाई देते हैं, चाहे गुज़रे हुए दौर में हो चाहे आज के समय में हो इन वहाबियों ने हमेशा जब भी इस्राईल से संबंधित कोई भी मामला सामने आया तो मुसलमानों का साथ देने के बजाए इस वहाबी टोले ने यहूदियों और ज़ायोनियों का साथ दे कर मुसलमानों के साथ विश्वासघात किया है, जिसकी बेहतरीन मिसाल सीरिया और इराक़ में अभी हाल में हुई जंग है, क्योंकि मुसलमानों के मुक़ाबले पर जिस तरह से यह वहाबी शिर्क और कुफ़्र का झंडा ले कर आए हैं उस से साफ़ ज़ाहिर है कि यह हमेशा से यहूदियों और ज़ायोनियों के लिए मोहरा बनते आ रहे हैं।
वहाबी टोले ने हमेशा से मुसलमानों में फूट डालने की नीयत से न जाने कितनी तरह से कभी लालच दे कर कभी डरा धमका कर कभी मार पीट कर के जिस तरह भी उनके लिए मुमकिन हुआ उन्होंने इस्लाम और मुसलमानों के साथ धोखा किया है, और इतिहास गवाह है कि यह टोला उस समय और भी अधिक सक्रिय दिखाई देता है जब इस्राईल की किसी इस्लामी देश के साथ जंग हो रही हो।
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