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Date of publication : 1/2/2018 4:34
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आयतुल्लाह ख़ूई र.ह. की ज़िंदगी पर एक निगाह

जब आप 15 साल के थे तभी इमाम अली अ.स. के हरम में आपकी मुलाक़ात आयतुल्लाह सैय्यद मोहम्मद काज़िम यज़्दी से हुई, आपने उनसे एक सवाल पूछा मरहूम शैख़ काज़िम ने जैसे ही जवाब दिया आपने कहा लेकिन आपने तो अपनी किताब अल-उरवतुल-वुसक़ा में इसके विपरीत लिखा है, शैख़ काज़िम ने उसी समय अपनी किताब अल-उरवतुल-वुसक़ा में देखा और कहा हां आप सही कह रहे हैं उसके बाद उन्होंने आस पास के खड़े लोगों से कहा कि इस नौजवान की अहमियत को समझो, इसका भविष्य बहुत उज्जवल होगा।

विलायत पोर्टल : 15 रजब सन् 1317 हिज्री को इस्लामी जगत को एक ऐसी शख़्सियत मिली जिस ने अपनी पूरी उम्र इस्लाम और मुसलमानों की ख़िदमत के लिए सौंप दी थी, आयतुल्लाह अली अकबर ख़ूई के घर यह सितारा चमका जिसने कई साल तक बेशुमार शागिर्दों, सैकड़ों आलिमों और मुजतहिदों की तरबियत की, कई किताबें लिखीं, और समाजिक कामों के लिए कई इदारे भी खोले, और आप का शुमार अपने दौर के सबसे बड़े मुजतहिद के रूप में होने लगा, और इस शख़्सियत का नाम अबुल क़ासिम ख़ूई था।
जब आप मां के पेट में थे और विलादत का समय क़रीब था, आपके वालिद अपने शागिर्दों को दर्स दे रहे थे तभी आपका सलमान नामी एक शागिर्द आया और कहा, कल रात मैंने एक ख़्वाब देखा उसके बाद ख़्वाब बताना शुरू किया कि इमाम अली अ.स. ख़्वाब में आए और आपके लिए एक पैग़ाम दिया कि सैय्यद अली अकबर से कह दो कि जिस बच्चे का इंतेज़ार है वह बेटा होगा और मैंने उसका नाम अबुल क़ासिम रखा है, फिर जब विलादत का समय आया तो बेटा ही हुआ और आपके वालिद ने ख़्वाब के अनुसार आपका नाम अबुल क़ासिम ही रखा।
नजफ़ की ओर सफ़र
आपने बचपन से ही मां बाप की मेहेरबानी उनकी मोहब्बत और रूहानी माहौल में ज़िंदगी गुज़ारी, आपने 13 साल की उम्र तक शुरूआती तालीम अपने वालिद के पास हासिल की, और फिर 13 साल की उम्र में 1330 हिज्री में अपने भाई सैय्यद अब्दुल्लाह के साथ नजफ़ की ओर इल्म हासिल करने के इरादे से चले गए, आपने नजफ़ में अपने तेज़ दिमाग़ की वजह से कम ही समय में शुरू के क्लास ख़त्म कर के केवल 21 साल की उम्र में ही आयतुल्लाह फ़त्हुल्लाह शरीयत इस्फ़हानी जैसे बड़े मुजतहिदों और मराजे की क्लास में जाने लगे। आप अपनी प्रतिभा और सलाहियत के लिए बचपन से ही जाने जाते थे, जैसाकि आपके उस्ताद आयतुल्लाह सैय्यद अब्दुल अज़ीज़ तबातबाई बयान करते हैं कि जब आप 15 साल के थे तभी इमाम अली अ.स. के हरम में आपकी मुलाक़ात आयतुल्लाह सैय्यद मोहम्मद काज़िम यज़्दी से हुई, आपने उनसे एक सवाल पूछा मरहूम शैख़ काज़िम ने जैसे ही जवाब दिया आपने कहा लेकिन आपने तो अपनी किताब अल-उरवतुल-वुसक़ा में इसके विपरीत लिखा है, शैख़ काज़िम ने उसी समय अपनी किताब अल-उरवतुल-वुसक़ा में देखा और कहा हां आप सही कह रहे हैं उसके बाद उन्होंने आस पास के खड़े लोगों से कहा कि इस नौजवान की अहमियत को समझो, इसका भविष्य बहुत उज्जवल होगा।
आपके उस्ताद
आप अपने फ़िक़्ह और उसूल के शिक्षकों के बारे में कहते हैं कि मैं फ़िक़्ह और उसूल के उस दौर के बड़े बड़े उस्तादों के दर्से ख़ारिज में जाता था जिनमें से मैं पांच लोगों के नाम लेना चाहूंगा और अल्लाह उन पर रहमत नाज़िल करे और वह पांच आयतुल्लाह शैख़ फ़त्हुल्लाह (शैख़ु-श-शरीयत), आयतुल्लाह शैख़ महदी माज़न्दरानी, आयतुल्लाह शैख़ ज़ियाउद्दीन इराक़ी, आयतुल्लाह शैख़ मोहम्मद हुसैन इस्फ़हानी (कुम्पानी) और आयतुल्लाह शैख़ मोहम्मद हुसैन नाईनी थे, फिर आपने कहा कि इन में से मैं आख़िर के दो लोगों के दर्स में ज़्यादा हाज़िर हुआ हूं जिनके पास मैंने पूरी उसूल पढ़ी है, आयतुल्लाह नाईनी मेरे ऐसे उस्ताद थे जिनकी उम्र के आख़िरी पड़ाव तक मैंने उन से बहुत कुछ सीखा है। आपके इल्मे अख़लाक़ और इरफ़ान के उस्ताद आयतुल्लाह शैख़ मुर्तज़ा तालेक़ानी, आयतुल्लाह सैय्यद अब्दुल ग़फ़्फ़ार माज़न्दरानी और इल्मे इरफ़ान के बे मिसाल उस्ताद आयतुल्लाह सैय्यद क़ाज़ी तबातबाई थे, और सैय्यद क़ाज़ी तबातबाई ही इल्मे इरफ़ान के वह उस्ताद थे जिन्होंने आप पर काफ़ी प्रभाव डाला था, आप ख़ुद बयान करते हैं कि मैं जब नजफ़ में था तो मैं हमेशा आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई के क्लास में जाता था और उनकी बताई हुई दुआएं और ज़िक्र को पढ़ता रहता था।
आपके शागिर्द और आपकी किताबें
 आयतुल्लाह ख़ूई ने अपनी जवानी से ही पढ़ाना शुरू कर दिया था, और फिर मरज-ए- तक़लीद होने के बाद भी आपने शागिर्दों की तरबीयत जारी रखी और साथ ही साथ आप किताबें भी लिखते, आपके बारे में यहां तक मिलता है कि आपका क़लम सफ़र में भी नहीं रुकता था, आप इल्मी बातों को समझाने के लिए कई कई घंटे बोलते और बहस करते लेकिन कभी आपको थकते नहीं देखा गया। आपके सारे शागिर्दों को शुमार नहीं किया जा सकता क्योंकि आपने लगभग 70 साल शागिर्दों की तरबियत की जिसमें हज़ारों की तादाद में उलमा और विद्वान आते थे, आपके शागिर्दों में कई ऐसी हस्तियां भी थीं जो आगे चल कर इज्तेहाद के दर्जे तक पहुंची जिनमें से अहम नाम इस प्रकार हैं, आयतुल्लाह ख़ामेनई, आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र, आयतुल्लाह मिर्ज़ा जवाद तबरेज़ी, आयतुल्लाह सैय्यद अली सीस्तानी, आयतुल्लाह मोहम्मद तक़ी बहजत, आयतुल्लाह मोहम्मद तक़ी जाफ़री, आयतुल्लाह सैय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी, आयतुल्लाह वहीद ख़ुरासानी और आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी।
आपने कई किताबें लिखी जिनमें से अहम उरवतुल वुसक़ा पर आपके द्वारा लिखा जाने वाला तालीक़ा, तफ़सीर में अल-बयान और इल्मे रेजाल में मोजमुर-रेजालिल हदीस है।
आपके बारे में आयतुल्लाह ख़ामेनई का बयान
आयतुल्लाह ख़ामेनई आपकी इल्मी और मानवी रूहानी शख़्सियत के बारे में फ़रमाते हैं कि हम केवल आपको एक मरज-ए-तक़लीद की निगाह से नहीं देखते बल्कि एक लेखक, शिक्षक और विश्लेषक के निगाह से भी देखते थे, अगर आप लोग उनकी ज़िंदगी को पढ़ें तो ज़रूर समझेंगे कि तीन विषय में आप को महारत हासिल थी पहला इल्मे फ़िक़्ह दूसरा इल्मे उसूल और तीसरा इल्मे रेजाल, यह जितनी फ़िक़्ह और उसूल के विषय पर आपके शागिर्दों द्वारा किताबें लिखी गई हैं वह सब आप ही का बयान किया हुआ।
आपकी इबादत और आपका इमामत से लगाव
 आप शागिर्दों की तरबियत के साथ साथ अल्लाह की इबादत और दुआ व मुनाजात में भी बे मिसाल थे, आप आपने शागिर्दों को कितना समय देते थे यह बात उस समय से आज तक किसी से छिपी नहीं लेकिन उसके बावजूद अल्लाह और अहले बैत अ.स. की मोहब्बत आपको हर मंगल की रात (यह रात इमाम ज़माना अ.स. से संबंधित है) नजफ़ से दस किलोमीटर दूर मस्जिदे सहला तक खींच कर लाती, अल्लाह से आपको इतना अधिक लगाव था कि आपने 40 हफ़्ते तक हर मंगल की रात पूरी रात जाग कर मस्जिदे सहला में इबादत करते, इसी तरह इमामत से भी आपको बे हद लगाव था और आप हर दिन अपने शागिर्दों की क्लास से पहले इमाम अली अ.स. की ज़रीह पर जाते थे और आपके बारे में यह भी मिलता है कि आप लगातार 40 शबे जुमा इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए नजफ़ से कर्बला भी गए और आप अपनी कामयाबी के राज़ को भी अल्लाह और अहले बैत अ.स. से मज़बूत रिश्ते को बताते थे।
आपके अल्लाह और अहले बैत अ.स. से मज़बूत रिश्ते का ही असर था जो आप पर इन हस्तियों की ख़ास निगाहें थीं इसीलिए आपने 80 साल की साल की उम्र होने के बावजूद क़ुर्आन को केवल चार साल में पूरा हिफ़्ज़ कर लिया।
आपकी वफ़ात
इस्लामी जगत के इस महान मरज-ए-तक़लीद ने 1413 हिजरी में इस दुनिया को अलविदा कहते हुए अपने हक़ीक़ी मालिक से जा मिले, आपकी वफ़ात के समय एक ज़ालिम और हत्यारा हाकिम था जिसके कारण आपके जनाज़े को बड़ी मज़लूमी से दफ़्न कर दिया गया, सद्दाम ने नजफ़ में भी आपके जनाज़े को उठने नहीं दिया जिसके कारण रात के अंधेरे में सद्दाम के सिपाहियों की मौजूदगी में कुछ शागिर्दों और आपके घर वालों ने आयतुल्लाह सीस्तानी द्वारा जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने के बाद आपको इमाम अली अ.स. के रौज़े में जहां आप की क्लास होती थी वहीं दफ़्न कर दिया।
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