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Date of publication : 2/2/2018 10:37
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इमाम सज्जाद अ.स. का सब्र

इस्लाम ने वर्ग प्रणाली और मानसिक अवसाद को जड़ से उखाड़ फेका है, वह मुसलमान जो सही ढंग से इस्लाम के आदेश का पालन करता है उसके लिए किसी तरह की कोई शर्मिंदगी नहीं है, शर्म की बात उनके लिए है जो बुरे विचार और जाहिलियत की मानसिकता रखते हैं।

विलायत पोर्टल :  आजकल के मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अपमान कठिनाई पीड़ा जैसी समस्याऐं विशेष रूप से बचपने और जवानी में मानसिक रोगों का कारण बनती हैं, जो कई वर्ष बाद मनुष्यों में ग़ुस्से और क्रूरता को जन्म देती हैं, और यह लगभग सभी लोगों में समान रूप से पाया जाता है।
अब अगर इमाम सज्जाद अ.स. के नैतिक जीवन को इस रूप से देखा जाए कि आप ने कठोरता, जीवन के कड़े दिनों का सामना और अपनी आंखों के सामने अपने रिश्तेदारों को शहीद होते देखा, इन सब के बावजूद आप ने जिस नैतिकता और उच्च विचारों को पोश किया है उसको इमाम मासूम के चमत्कार के अलावा कोई और नाम नहीं दिया जा सकता।
अल्लामा मजलिसी लिखते हैं: इमाम सज्जाद अ.स. ने एक बाग़ अपने एक ग़ुलाम के हवाले किया, एक दिन इमाम बाग़ आए तो देखा ग़ुलाम ने बाग़ के एक हिस्से को ख़ुद से उलटा सीधा काम कर के ख़राब कर रखा है, इमाम ने ग़ुस्सा होकर एक कोड़ा मार दिया, लेकिन जैसे ही घर पहुंचे तुरन्त इमाम ने उसे बुलाया, ग़ुलाम आया और इमाम के हाथ में फिर से कोड़े को देख कर डर गया, इमाम ने कहा डरो मत इस कोड़े को लो और इस से मुझे मार कर बदला लो, ग़ुलाम ले कहा मेरे मौला मेरी ग़लती और गुनाह एक कोड़े से कहीं बड़ा था मैंने आप के बाग़ को ख़राब किया आप के पैसे को बर्बाद किया मैं इस से ज़्यादा की सज़ा का हक़दार था। इमाम ने जब देखा ग़ुलाम इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है तब इमाम ने एक काग़ज़ पर उस बाग़ को ग़ुलाम के नाम लिख दिया, और ग़ुलाम को उसे क़बूल करने का हुक्म दिया, वह लज्जित हो कर खड़ा रहा, इमाम ने कहा इसे क़बूल कर लो लेकिन बस एक शर्त है कि ज़रुरतमंद शिया अगर आए तो उसे फल खाने की अनुमति दे देना, ग़ुलाम ने क़बूल कर लिया। (बिहारुल् अनवार, जिल्द 46 पेज 96)
इमाम सज्जाद अ.स. ग़ुलामों के साथ जो उस समय दबे कुचले लोग थे यहां तक अरब के लोग उन्हें इन्सान ही नहीं समझते थे आप उनके साथ विशेष व्यवहार करते थे और उनका सम्मान करते थे। आप की एक बहुत शिक्षित कनीज़ थी इमाम ने उसे आज़ाद करके उस से शादी कर ली, सरकारी जासूसों ने अब्दुल् मलिक इब्ने मरवान तक यह ख़बर पहुंचा दी, उसने इमाम को क्रोधित हो कर एक पत्र लिखा, “ मुझे ख़बर मिली है कि आप ने कनीज़ से शादी कर ली, जब कि आप को अच्छी तरह से पता है कि क़ुरैश में अच्छे और बड़े घराने की लड़कियां और औरतें हैं जिन से शादी करना गर्व की बात होती और उन से विनम्र और विद्वान बच्चे भी पैदा होते, आप ने कनीज़ से शादी करके ना अपने सम्मान के बारे में विचार किया ना ही अपने बच्चों के सम्मान और समाजिक अधिकार के बारे में सोंचा”।
इमाम ने जवाब में लिखा, “ जिस ख़त में तू ने मेरी आज़ाद की हुई कनीज़ से शादी करने के बारे में अपशब्द कहे वह मुझे मिल गया, तू ने लिखा था कि क़ुरैश में ऐसी औरतें हैं जिनसे शादी करना गर्व की बात है, विनम्र और विद्वान बच्चे उनसे पैदा होते हैं, तो सुन ले रसूले ख़ुदा से बढ़ कर किसी का स्थान नहीं है, कोई शराफ़त और बड़प्पन में उनके बराबर नहीं हो सकता, हर एक पर उनकी जीवनी का पालन करना अनिवार्य है, ऐ अब्दुल् मलिक क़ुरैश की औरतों से शादी रसूल के बेटे के लिए गर्व की बात नही हो सकती, मेरे पास कनीज़ थी ख़ुदा की राह में उसे मैंने आज़ाद किया फिर इस्लामी सिद्धांतों के अंतर्गत उस से शादी की, वह एक शरीफ़ और पवित्र औरत है कि जिसने नेक और पवित्र जीवन गुज़ारा, उसकी फ़कीरी और गुमनामी उसके व्यक्तित्व को नुक़सान नहीं पहुंचा सकती, इस्लाम ने वर्ग प्रणाली और मानसिक अवसाद को जड़ से उखाड़ फेका है, वह मुसलमान जो सही ढंग से इस्लाम के आदेश का पालन करता है उसके लिए किसी तरह की कोई शर्मिंदगी नहीं है, शर्म की बात उनके लिए है जो बुरे विचार और जाहिलियत की मानसिकता रखते हैं। (बिहारुल् अनवार, जिल्द 11, पेज 45)
जानवर भी अपने आप को इमाम के पास सुरक्षित समझते थे, एक दिन इमाम सज्जाद अ.स. कुछ लोगों के साथ खाना खा रहे थे अचानक एक हिरन वहां से गुज़र रहा था, इमाम ने उस से कहा तू महफ़ूज़ है तुझे कोई क्षति नहीं पहुचाएगा आ जा हमारे साथ खाना खा ले, हिरन आ गया, तभी अचानक एक आदमी ने एक पत्थर उठा कर हिरन की तरफ़ फ़ेक दिया जिसके कारण हिरन भाग गया, इमाम ने नाराज़ हो कर उस आदमी से कहा तू ने मेरे विश्वास को तोड़ा है उसकी सुरक्षा से खिलवाड़ किया है, उसके बाद से इमाम ने कहा आज के बाद मैं कभी तुझ से बात नहीं करूंगा। (कशफ़ुल् ग़ुम्मह, जिल्द 2, पेज 404)


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