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Date of publication : 3/2/2018 7:14
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हज़रत ज़हरा स.अ. और ग़रीबों का ख़्याल और दुनिया की औरतों के लिए आपका आइडियल होना

यह वह घराना है जो ग़रीबों की ख़ातिर ख़ुद भूखा रहा है जैसा कि सूरए दहर की आयात की तफ़सीर हमारे सामने है, जिससे ज़ाहिर है कि तीन दिन तक आप मदद करते रहे और ख़ुद भूखे रहे इसी को बलिदान कहा जाता है, क्योंकि हमारे पेट भरे हों और हम ग़रीबों को खाना खिलाएं उनकी मदद करें यह स्वभाविक है लेकिन कमाल यह है कि हम ख़ुद भूखे रह कर ग़रीब मोमेनीन को अपने आगे रखा हुआ खाना दे दें।


विलायत पोर्टल : हज़रत ज़हरा स.अ. का मोमेनीन का ख़्याल रखना अहले बैत अ.स. की पूरी ज़िंदगी दूसरों की मदद करने और उनको हर तरह की तकलीफ़ और कठिनाई से बाहर निकालने में गुज़री है, लेकिन अहले बैत अ.स. के पूरे घराने में हज़रत ज़हरा स.अ. की ज़ात वह है जिनकी इस सिफ़त को क़ुर्आन ने भी सूरए दहर में जगह दी है।
हम सभी का भी यही फ़र्ज़ बनता है कि अपने लिए उसी राह को चुनें जिस पर अहले बैत अ.स. लोगों का ख़्याल रखते हुए और उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हुए चले हैं। हमको भी उसी रास्ते को अपनाना है, हमारे अंदर भी बलिदान का जज़्बा होना चाहिए, अल्लाह की इताअत और उसकी इबादत भी उसी तरह होना चाहिए जैसी उनके जीवन में थी इसलिए कि हम हज़रत ज़हरा स.अ. की ज़िंदगी में पढ़ते हैं कि अल्लाह की इबादत के लिए आप इतनी देर देर तक खड़ी रहती थीं कि आपके पैरों में वरम आ जाता था, हमारी भी नमाज़ें और अल्लाह की इबादत ऐसी ही होनी चाहिए कि हमारे पूरे वुजूद में अल्लाह का ज़िक्र दिखना चाहिए, और हमारे दिलों में हर समय अल्लाह की याद होना चाहिए और दिन प्रतिदिन उसे और अधिक बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए, जिस तरह हज़रत ज़हरा स.अ. जलता हुआ दरवाज़ा गिरने के बाद भी हक़ को बचाने और इमामत की हिफ़ाज़त करने की ख़ातिर घर से बाहर निकलीं हमारे अंदर भी हक़ के समर्थन और उसकी किसी भी परिस्तिथिति में मदद करने के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए, हमें भी ज़ालिम और अत्याचारी हुकूमत से नहीं डरना चाहिए और अपने हक़ को हासिल करने के लिए हमेशा प्रतिरोध करते रहना चाहिए क्योंकि हम ख़ुद शहज़ादी स.अ. के बारे में कहते हैं कि आपने अकेले पूरी हुकूमत और सिस्टम का विरोध किया, हम को भी हज़रत ज़हरा स.अ. की तरह इमाम अली अ.स. को क़ौल पर कि ज़ालिम और बातिल के मुक़ाबले में अपनी तादाद की कमी को देख कर मत घबराओ इस पर अमल करते हुए हर ज़ालिम और बातिल ताक़त और हुकूमत के सामने अपना और कमज़ोर लोगों का हक़ हासिल करने के लिए कोशिश करनी चाहिए।
यह वह घराना है जो ग़रीबों की ख़ातिर ख़ुद भूखा रहा है जैसा कि सूरए दहर की आयात की तफ़सीर हमारे सामने है, जिससे ज़ाहिर है कि तीन दिन तक आप मदद करते रहे और ख़ुद भूखे रहे इसी को बलिदान कहा जाता है, क्योंकि हमारे पेट भरे हों और हम ग़रीबों को खाना खिलाएं उनकी मदद करें यह स्वभाविक है लेकिन कमाल यह है कि हम ख़ुद भूखे रह कर ग़रीब मोमेनीन को अपने आगे रखा हुआ खाना दे दें।
यह बिल्कुल उचित नहीं है कि हम हज़रत ज़हरा स.अ. से मोहब्बत और उनकी पैरवी का दावा करते रहें और ख़ुद भरे पेट रहें और उन ग़रीब मोमेनीन के बारे में सोचें ही नहीं जो बेचारे ख़ाली पेट कई कई दिन सोते हैं, और अफ़सोस तो उन लोगों पर होता है जब ख़ुद को हज़रत ज़हरा स.अ. का चाहने वाला बोल कर ग़रीबों की रोटी छीन लेते हैं और एक बार भी नहीं सोंचते की हज़रत ज़हरा स.अ. इस हद तक ग़रीबों का ख़्याल रखती थीं कि तीन दिन तक ख़ुद भी भूखी रहीं और अपने शौहर और छोटे बच्चों को भी भूखा रखा लेकिन दरवाज़े से किसी फ़क़ीर को ख़ाली हाथ जाने नहीं दिया।
हज़रत ज़हरा स.अ. औरतों के लिए आइडियल
आप ज़ाहिर में तो एक इंसानी शक्ल और सूरत में एक ख़ातून थीं लेकिन आपके वुजूद में अल्लाह का नूर था जिसकी वजह से आपकी पाकीज़गी का यह हाल था कि पैग़म्बर स.अ. आपके सम्मान में अपनी जगह से खड़े हो जाते थे।
आपकी पाकीज़गी ही थी जो आपको आलमीन की सारी औरतों के लिए आइडियल बनाया गया, और केवल यही नहीं बल्कि पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि ऐ अली (अ.स.) क़यामत के दिन आप मोमिन मर्दों को जन्नत की ओर ले कर जाएंगे और फ़ातिमा (स.अ.) मोमिना औरतों को ले कर जाएंगी, इस हदीस में पैग़म्बर स.अ. ने हज़रत ज़हरा स.अ. और इमाम अली अ.स. को इस विशेषता में बराबर बताया है। हज़रत ज़हरा स.अ. की वह ज़ात है कि जब आप अल्लाह की इबादत के लिए खड़ी होती थीं तो हज़ारों फ़रिश्ते आपको सलाम करते और वही कहते जो हज़रत मरयम से कहा करते थे कि अल्लाह ने आपको चुन लिया और आपको आलमीन की सारी औरतों के लिए आइडियल बनाया है, यह हज़रत ज़हरा स.अ. का रूहानी और मानवी मर्तबा है।
आपके रूहानी दर्जे और मानवी मर्तबे ही के कारण आपको सारी औरतों के लिए आइडियल बनाया गया है, और आप केवल दुनिया की सारी औरतों ही के लिए आइडियल नहीं बल्कि आपके जो सिफ़ात और जो मर्तबा है उसको देखते हुए इमामों ने आपको मर्द और औरतों दोनों के लिए आइडियल बताया है। वह लोग जिन्होंने जेहालत के दौर या उसके बाद औरतों का अपमान किया है और औरत को केवल सजने संवरने सोना चांदी और माडर्न कपड़े पहनने तर सीमित कर रखा है उन लोगों के लिए हज़रत ज़हरा स.अ. की ज़िंदगी बेहतरीन जवाब है कि एक औरत अपने कमाल से किस मर्तबे तक पहुंच सकती है।
 इस्लाम ने हज़रत ज़हरा स.अ. को उनकी ज़िंदगी और उस इतनी कम ज़िंदगी में हासिल किए जाने वाले कमाल को देख कर आप को आइडियल बनाया है, आपकी ज़िंदगी के किसी पहलू पर भी निगाह डाली जाए हर पहलू में आप बे मिसाल नज़र आती हैं, चाहे आपको बेटी के किरदार में देखा जाए चाहे मां और बीवी के, चाहे इमामत की हिफ़ाज़त करते हुए हो या बातिल और ज़ालिम हुकूमत का विरोध करते हुए, अल्लाह की इबादत करते हुए हो या उसके बंदों की मदद करते हुए।

नोट- यह लेख आयतुल्लाह ख़ामेनई की तक़रीर और उनके बयान की रौशनी में लिखा गया है।
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