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Date of publication : 3/2/2018 19:40
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अवैध राष्ट्र इस्राईल का गठन और साम्राज्यवादी शक्तियों के काले करतूत

.......अरब देशों की कमज़ोरी के कारणऔर फिलिस्तीन की बर्बादी और उजड़े हुए शहरों और आबादी पर इस अत्याचारी देश की नीव रखी गई ।

विलायत पोर्टल :  इस्राईल के गठन का ऐलान 14 मई 1948 को ब्रिटेन के उच्च दूत ने क़ुद्स को छोड़ दिया और लन्दन के लिए निकल गया , वास्तव में ब्रिटेन का यह क़दम इस्राईल के गठन का ऐलान करने के लिए हरी झंड़ी समझा जाता है ।
पहले ज़ायोनी प्रधानमंत्री बिन गौरेन ने ब्रिटिश उच्च दूत के निकलने के फ़ौरन बाद 14 मई 1948 को सांय 4 बजे तल अवीव में इस्राईल के गठन की घोषणा कर दी, जिसके ठीक 11 मिनट बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने इस अवैध राष्ट्र को मान्यता दे दी । अमेरिकी राष्ट्रपति की यह तेज़ी इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह पहले से सोची समझी साज़िश का एक भाग था ।
अरब - इस्राईल युद्ध का आरम्भ
इस्राईल के गठन का ऐलान और फिलिस्तीन से ब्रिटिश दूत के निकलने के बाद 15 मई 1948 को औपचारिक रूप से अरब - इस्राईल युद्ध शुरू हो गया । फिलिस्तीन के जिस जिस भाग को ब्रिटिश सेना ख़ाली कर रही थी ज़ायोनी सेना तेज़ी से उस भाग को अपने अधीन ले रही थी । अरब सेना की अगुआई मिस्री सेना कर रही थी, लेबनान और जॉर्डन सेना के युद्ध में भाग लेने तथा फिलिस्तीनी सीमा को पार करने के कारण लेबनान सीमा से लगे फिलिस्तीन के कुछ क्षेत्रों को आज़ाद करा लिया गया । अक्का पर ज़ायोनी सेना का नियंत्रण युद्ध शुरू होने के दो दिन बाद ही 17 मई 1948 को अक्का शहर पर ज़ायोनी सेना ने नियंत्रण कर लिया, 19 मई को ज़ायोनी सेना ने क़ुद्स की ओर क़दम बढ़ा दिए ।
इस क्षेत्र को बचाने के लिए जॉर्डन की सेना आगे बढ़ी वहीँ पुराने क़ुद्स शहर को बचाने के लिए जॉर्डन के मुस्लिम ब्रदरहुड के लड़ाकों ने मोर्चा खोल दिया। 22 मई को सुरक्षा परिषद् ने युद्धबंदी का प्रस्ताव पेश किया जिस पर महाशक्तियों के दबाव के कारण अरब देशों को झुकना पड़ा ।
फिलिस्तीनी शहरों का पतन
एक के बाद एक फिलिस्तीनी शहरों पर ज़ायोनियों का क़ब्ज़ा हो रहा था, 22 अक्टूबर 1948 को बेयर अल सबअ , तो 5 नवंबर में मूजदल और अस्क़लान पर ज़ायोनी सेना ने अधिकार जमा लिया । ज़ायोनी सेना ने अपने अधीन आये 585 फिलिस्तीनी गांवों में से 478 को बिल्कुल उजाड़ दिया और फिलिस्तीन के 78% भूभाग पर क़ब्ज़ा जमा लिया , यह अवैध क़ब्ज़ा उस अवस्था में हुआ जब संयुक्त राष्ट्र के विधेयक में फिलिस्तीन के 56 .5 भाग पर ज़ायोनी क़ब्ज़ा को मंज़ूरी दी गयी थी , इस घटना के कारण 5 लाख फिलिस्तीनी लोगों को अपने घर और भूमि से हाथ धोना पड़ा ।
युद्धविराम और इस्राईल को मान्यता देना
 24 फरवरी 1949 को मिस्र और इस्राईल के बीच औपचारिक रूप से युद्ध विराम हो गया लेबनान ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, सीरिया ने 23 फरवरी की सैन्य क्रांति से पहले तक हुस्नी ज़ईम के नेतृत्व में इस समझौते पर हताक्षर करने से मना कर दिया लेकिन 23 फरवरी के सैन्य विद्रोह के बाद वह भी इस समझौते को मान्यता देने वालों में शामिल हो गया ।
अवैध राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकांश सदस्य देशों द्वारा मान्यता दिए जाने के बाद इस ज़ायोनी राष्ट्र को भी आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र की सदस्य्ता मिल गई, इस प्रकार अरब देशों की कमज़ोरी के कारणऔर  फिलिस्तीन की बर्बादी और उजड़े हुए शहरों और आबादी पर इस अत्याचारी देश की नीव रखी गई ।
फिलिस्तीनी जनता की हिजरत
इस प्रकार फिलिस्तीनी जनता अपनी ज़मीन से ही बेदखल कर दी गयी तथा उन्हें दर दर भटकने के लिए मजबूर होना पड़ा । जो अपने देश में बच गए थे वह हथियारबंद ज़ायोनी सेना और ज़ायोनी आतंकियों के बीच घिर चुके थे, फिलिस्तीन से निकलने वालों का हाल भी कुछ ठीक नहीं था , यहूदियों के दबाव और अत्याचार के कारण बहुत से फिलिस्तीनी नागरिकों को जॉर्डन और और खाड़ी के कुछ देशों की ओर भाग कर पनाह लेना पड़ी , दूसरी ओर ज़ायोनी राष्ट्र ने 5 जुलाई 1949 ऐलान कर दिया कि दुनिया भर से अगर कोई भी यहूदी अवैध राष्ट्र आता है तो उसे अवैध राष्ट्र अपना पासपोर्ट जारी करने के लिए तैयार है ।
मिस्र में जमाल अब्दुल नासिर का सत्ता में पहुंचना
जुलाई 1952 में क्रांति के बाद मिस्र में बादशाही के खात्मे के साथ ही मुस्लिम ब्रदरहुड के क़रीबी मेजर जनरल मोहम्मद नजीब ने सत्ता की बागडोर संभाली । दो साल बाद जमाल अब्दुल नासिर , मोहम्मद नजीब को हटाकर सत्ता पाने में सफल रहा, उस समय जमाल अब्दुल नासिर अरब - इस्राईल युद्ध में अरब देशों के नेता के रूप में विख्यात था ।
ख़ान यूनुस क़त्ले आम
ख़ान यूनुस फिलिस्तीन के ग़ज़्ज़ा में स्थित एक शहर है, ज़ायोनी आतकियों ने 3 नवम्बर 1956 को इस शहर के पूर्वी भाग पर हमला कर बहुत घिनौने और भयानक अपराध किये जिस के नतीजे में 500 से अधिक फिलिस्तीनी नागरिक शहीद हुए ।
उसके अगले ही दिन अर्थात 4 नवम्बर को ज़ायोनी सेना ने फय्याज़ियाह और अल क़रारह पर हमला किया तथा इस शहर के दक्षिणी भाग में 20 से अधिक नौजवानों को लाइन से खड़ा कर गोलियों से भून दिया , इसके अलावा शहर के पश्चिमी भाग में भी 30 लोगों की हत्या की ।
अल मुवासी और तल रैदान से होता हुआ ख़ान यूनुस तक ज़ायोनी आतंकियों के अत्याचार का यह सिलसिला 5 नवम्बर से 7 मार्च तक जारी रहा । 12 नवम्बर 1956 को ज़ायोनी आतंकियों द्वारा ख़ान यूनुस कैम्प में मचाये गए पहले क़त्ले आम के 9 दिन बाद ज़ायोनी आतंकियों ने एक बार फिर इसी शहर को निशाना बनाते हुए 275 बेघर फिलिस्तीनी लोगों की हत्या की तथा रिफ्यूजी कैम्प में रह रहे 100 से अधिक लोगों को भी बेदर्दी से शहीद कर दिया ।
जारी है......
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