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Date of publication : 8/2/2018 5:21
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अल्लामा तबातबाई की ज़िंदगी पर एक निगाह

आपने कई विषय पर ऐसी किताबें लिखी हैं जो अपनी मिसाल आप हैं, आपने क़ुर्आन की ऐसी तफ़सीर लिखी जिसके बारे में अल्लामा शहीद मुतह्हरी जैसी शख़्सियत कहती है कि अल्लामा तबातबाई का अल-मीज़ान लिखते समय ज़रूर ग़ैब से संबंध था क्योंकि बिना अल्लाह की ख़ास मेहरबानी के क़ुर्आन की ऐसी तफ़सीर कोई नहीं लिख सकता

विलायत पोर्टल :  आप ईरान के तबरेज़ शहर के एक ऐसे घराने से संबंध रखते हैं जिसकी 14 पीढ़ियों में ज़बरदस्त उलमा गुज़रे हैं, आप 1321 हिजरी के अंत में पैदा हुए, आपने अपनी शुरूआती तालीम अपने वतन में हासिल की और 22 साल की उम्र में इराक़ के नजफ़ शहर की ओर उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए सफ़र किया, आपने वहां आयतुल्लाह नाईनी, आयतुल्लाह कुंपानी जैसे उलमा से फ़िक़्ह, उसूल और फ़लसफ़े की तालीम हासिल की और गणित की तालीम आयतुल्लाह सय्यद अबुल क़ासिम ख़ुनसारी और अख़लाक़, तफ़सीर और इरफ़ान की तालीम आयतुल्लाह आक़ा क़ाज़ी तबातबाई से हासिल की।
 आप 10 साल बाद ही घर की आर्थिक तंगी की वजह से वापस आ गए और अपने वतन ही में घर के हालात बेहतर बनाने के लिए कोशिश करते रहे, उसके 10 साल बाद आप क़ुम शहर पहुंचे और आख़िरी उम्र तक आप वहीं फ़लसफ़ा और तफ़सीर वग़ैरह के दर्स देते रहे।
नजफ़ में आपकी ज़िंदगी
आप 22 साल की उम्र में अपनी बीवी और बेटे मोहम्मद के साथ उच्च शिक्षा के लिए नजफ़ पहुंचे, एक बेहद सादा घर किराए पर लिया, एक अंजान शहर अंजान लोगों के बीच और फिर गर्म मौसम में बिल्कुल छोटे से घर मे आपके लिए वहां रहना और भी अधिक मुश्किल कर दिया था, उसी बीच आपके बेटे की तबियत ख़राब हो गई और अच्छे डॉक्टर न होने और पैसे की कमी के चलते बेटे की तबियत बिगड़ती गई और फिर एक दिन वह मासूम इस दुनिया से चल बसा, पराए देश में औलाद का ग़म अल्लामा और उनकी बीवी दोनों के लिए बहुत कठिन था लेकिन अल्लामा ने अपने दिल को संभालते हुए अपनी बीवी को भी संभाला, कुछ साल बाद अल्लाह ने फिर एक बेटा दिया लेकिन वह भी एक साल की उम्र में इस दुनिया से चल बसा जिस से फिर अल्लामा और आपकी बीवी का ग़म ताज़ा हो गया अल्लामा ने फिर अपने ग़म को छिपाते हुए अपनी बीवी को तसल्ली दी, और फिर इसी तरह तीसरा बेटा भी हुआ और वह भी बहुत जल्द इस दुनिया से गुज़र गया, अल्लामा इस बार बार होने वाली घटना से बहुत दुखी थे और तन्हाई में बैठ कर अल्लाह की बारगाह में रोते थे और दुआ करते थे कि ख़ुदाया मुझे इस कठिन परिस्तथिति से बाहर निकाल, कुछ दिनों बाद आपके उस्ताद आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई जो आपकी बीवी के रिश्तेदार थे आपके घर आए और दोनों को तसल्ली दी और फिर अल्लामा की बीवी से कहा घबराओ मत इंशा अल्लाह इस बार फिर अल्लाह तुम लोगों को बेटा देगा और वह ज़िंदा भी रहेगा उसका नाम अब्दुल बाक़ी रखना, अल्लामा जो उस समय तक अपनी बीवी के प्रेगनेंट होने के बारे में भी नहीं जानते थे यह सुन कर हैरत में पड़ गए, आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई की भविष्यवाणी के अनुसार अल्लाह ने आपके बेटा दिया।
आर्थिक स्थिति
आप केवल 10 साल नजफ़ में रहे और इतने कम समय में आपने न केवल फ़िक़्ह, उसूल फ़लसफ़े और इरफ़ान की तालीम हासिल की बल्कि अक़ाएद और फ़लसफ़े के विषय पर किताबें भी लिखीं, लेकिन कुछ ही समय में आपकी आर्थिक तंगी बढ़ने लगी क्योंकि आप बैतुल माल की रक़म को ख़र्च करने में संवेदनशीलता बरतते थे और आपका ख़र्चा आपके वतन तबरेज़ से ही जाता था और फिर राजनैतिक मतभेद के चलते ईरान से इराक़ पैसे लाना ले जाना बंद हो गया जिस से आपके पास घर से पैसे पहुंचना बंद हो गए और आपकी कठिनाइयां बढ़ती चली गईं, इसके बाद आपने हाथ रोक कर ख़र्च करना शुरू किया फिर घर का सामान भी बेचना पड़ गया और फिर इस उम्मीद के साथ कि शायद हालात बेहतर हों और घर से पैसे आने शुरू हो जाएं आपने क़र्ज़ भी लिया और फिर बिना किसी उम्मीद के ईरान ही से किसी अल्लाह के बंदे ने आप तक कुछ रक़म दी जिससे आप अपना क़र्ज़ चुका कर ईरान वासस चले गए।
आपकी सादगी
अल्लामा तबातबाई के शागिर्द आयतुल्लाह सय्यद मोहम्मद हुसैन तेहरानी बयान करते हैं कि जिस समय आयतुल्लाह हुज्जत ने क़ुम में हुज्जतिया मदरसे की इमारत को बढ़ाने का इरादा किया और ज़मीनों को ख़रीदा फिर वह इमारत के लिए एक अच्छे नक़्शे की तलाश में थे कई इंजीनियरों ने नक़्शा बना कर दिया लेकिन उनको पसंद नहीं आ रहा था, फिर अचानक हम लोगों को पता चला कि तबरेज़ के एक सय्यद ने एक नक़्शा बनाया है जो आयतुल्लाह हुज्जत को पसंद आया है, फिर यह भी सुना कि यह सय्यद गणित और फ़लसफ़े के माहिर आलिम हैं और फ़लसफ़े का दर्स भी देते हैं, मैं उनके दीदार के लिए बेचैन होने लगा और फिर वह दिन आ गया जब मेरा एक दोस्त आया और कहने लगा कि आक़ा तबातबाई मशहद की ज़ियारत से वापस आ गए हैं चलो उनसे मिलने चलते हैं, जैसे ही हमने उनके घर में क़दम रखा तो हैरान रह गया क्योंकि वह सय्यद कोई और नहीं बल्कि वही थे जिनको हम लोग हर दिन गली में अलग अलग कामों के लिए आता जाता देखते थे, उनकी सादगी देख कर लग ही नहीं रहा था कि यह कोई गणित और फ़लसफ़े जैसे विषय के माहिर उस्ताद हैं।
आप और आपके उस्ताद आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई
अल्लामा तबातबाई ने बहुत महान हस्तियों से इल्म हासिल किया है लेकिन वह जिसको अल्लामा सबसे अधिक याद करते थे और बार बार जिनका ज़िक्र करते थे वह आयतुल्लाह अली आक़ा क़ाज़ी तबातबाई थे, आप हमेशा क़ाज़ी तबातबाई के बारे में कहते कि आज मेरे पास जो भी है वह उन्हीं की देन है, चाहे फ़लसफ़ा और दूसरे उलूम हों या फिर अख़लाक़ और इरफ़ान, क़ाज़ी तबातबाई ने इन सारे उलूम को अपने अंदर समेटने का हुनर अल्लामा के अंदर महसूस किया और उस कमाल को उनकी ज़ात के अंदर देखा जिसकी शायद उनको तलाश थी, इसीलिए अल्लामा तबातबाई के नजफ़ पहुंचते ही उनको अपने से क़रीब रखा और उनकी तरबियत की ज़िम्मेदारी ख़ुद संभाली, क़ाज़ी तबातबाई उस शख़्सियत का नाम है जिसके बारे में आयतुल्लाह शैख़ मोहम्मद तक़ी आमुली का कहना है कि अगर किसी इंसाने कामिल की सरपरस्ती में रहना चाहते हो तो मेरी नज़र में आक़ा क़ाज़ी तबातबाई से कामिल इंसान कोई नहीं है।
आपकी किताबें
आपने कई विषय पर ऐसी किताबें लिखी हैं जो अपनी मिसाल आप हैं, आपने क़ुर्आन की ऐसी तफ़सीर लिखी जिसके बारे में अल्लामा शहीद मुतह्हरी जैसी शख़्सियत कहती है कि अल्लामा तबातबाई का अल-मीज़ान लिखते समय ज़रूर ग़ैब से संबंध था क्योंकि बिना अल्लाह की ख़ास मेहरबानी के क़ुर्आन की ऐसी तफ़सीर कोई नहीं लिख सकता, इसके अलावा बिदायतुल हिकमह जैसी फ़लसफ़े के विषय पर किताब लिखी, इसके अलावा और भी अनेक किताबें आपकी अलग अलग विषय पर मौजूद हैं जिनसे आज तक उलमा फ़ायदा हासिल कर रहे हैं।
आपकी वफ़ात
आपने 81 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा, आपकी वफ़ात से पूरा इस्लामी जगत सदमे में था, इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपकी वफ़ात को इस्लामी जगत का बहुत बड़ा नुक़सान बताया, आपकी क़ब्र ईरान के क़ुम शहर में मासूम-ए-क़ुम के रौज़े के अंदर है जहां आपके शागिर्द और आपसे अक़ीदत रखने वाले आपकी क़ब्र की ज़ियारत को जाते रहते हैं।
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