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Code : 193014
Date of publication : 8/4/2018 17:39
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मुसलमानों के आपसी मतभेद को लेकर पैग़म्बर स.अ. की चिंता

पैग़म्बर स.अ. ने अपने बाद मुसलमानों में मतभेद और किसी तरह की फूट न हो इसीलिए अपने जीवन ही में उसका हल बता दिया था, और एकता और आपसी भाई चारे के सबसे बेहतरीन नुस्ख़े की ओर इशारा करते हुए मुसलमानों को क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. से हमेशा जुड़े रहने और उन की पैरवी करने को कहा था, जिसको शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़ों ने अपनी मशहूर और भरोसेमंद किताबों में बयान किया है।

विलायत पोर्टल :  इस बात को कोई भी झुठला नहीं सकता कि पैग़म्बर स.अ. की सबसे बड़ी इच्छा इस्लामी उम्मत की एकता थी, मुसलमानों के बीच किसी भी तरह के मतभेद से आप काफ़ी आहत और चिंतित हो जाते थे, जैसाकि सियूती और भी दूसरे लोगों ने नक़्ल किया है कि शास इब्ने क़ैस नाम का एक शख़्स जो जेहालत के समय का पला बढ़ा था और उसके दिल में मुसलमानों के विरुध्द ईर्ष्या और नफ़रत भड़की हुई थी उसने एक यहूदी को दो इस्लामी क़बीलों को आपस में लड़वाने के लिए भड़का दिया, इस यहूदी ने आ कर दोनों क़बीलों के बीच जेहालत के समय उन दोनों के बीच होने वाली जंगों और आपसी मतभेदों को याद दिलाते हुए दोनों के बीच नफ़रत को इस तरह फैला दिया कि दोनों क़बीले के लोग आपस में तलवारें ले कर आमने सामने खड़े हो गए। जैसे ही पैग़म्बर स.अ. को इस बारे में पता चला, आप तुरंत कुछ मुहाजिरीन और अंसार के साथ उस जगह पर पहुंचे और फ़रमाया, ऐ मुसलमानों क्या अल्लाह को तुम लोगों ने भुला दिया, और फिर उन्हीं जेहालत के नारों के साथ एक दूसरे के सामने खड़े हो गए जबकि अभी मैं तुम लोगों के बीच ज़िंदा हूं,जबकि अल्लाह ने तुम लोगों की हिदायत कर दी और जेहालत के घुप अंधेरे और उस दौर के फ़ितनों से तुम लोगों को बाहर ला कर खड़ा कर दिया और तुम लोगों में आपसी मोहब्बत और भाईचारा पैदा किया उसके बाद तुम लोग दोबारा चाहते हो कि जेहालत के दौर वाला जीवन जीते रहो। पैग़म्बर स.अ. के यह कहने के बाद वह लोग समझ गए कि हमारे बीच की यह आपसी लड़ाई शैतान की साज़िश है, वह दोनों गिरोह बहुत शर्मिंदा हुए, पैग़म्बर स.अ. की इस बात से वह लोग इतना प्रभावित हुए कि अपनी अपनी तलवार फ़ेंक कर रोने लगे, केवल यही नहीं बल्कि उन्होंने आपस में गले मिल कर एक दूसरे से माफ़ी मांगी और पैग़म्बर स.अ. के साथ अपने अपने घर वापस चले गए। (अल-दुर्रुल मनसूर, जिल्द 2, पेज 57, जामेउल बयान, जिल्द 4, पेज 32, फ़त्हुल क़दीर, जिल्द 1, पेज 368, उस्दुल ग़ाबा, जिल्द 1, पेज 149, अल-सीरतुल हलबिय्यह, जिल्द 2, पेज 320) पैग़म्बर स.अ. द्वारा मुसलमानों की एकता के लिए बताया गया नुस्ख़ा
अब जब मुसलमानों के बीच आपसी एकता और एकजुटता की अहमियत रौशन हो गई तो क्या वह चीज़ जो पैग़म्बर स.अ. के बाद मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करती है उस पर भी चर्चा नहीं होनी चाहिए? और वह पैग़म्बर स.अ. के बाद मुसलमानों की रहबरी और लीडर शिप को लेकर है, बेशक पैग़म्बर स.अ. को मालूम था कि मेरी वफ़ात के बाद मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा होंगे, तो अब यह देखना होगा कि क्या पैग़म्बर स.अ. ने इस मतभेद का कोई हल बताया है या नहीं? या यह कहा जाए कि मआज़ल्लाह पैग़म्बर स.अ. ने इतने अहम मुद्दे पर बात करने में सुस्ती दिखाई, जबकि आपने ख़ुद फ़रमाया कि मेरे बाद यह उम्मत 70 फ़िर्क़ों में बंट जाएगी। (अल-मुस्तदरक अल-सहीहैन, जिल्द 3, पेज 547)
इस सवाल का जवाब हमको शिया और सुन्नी दोनों की किताबों से मिल जाता है कि पैग़म्बर स.अ. ने अपने बाद मुसलमानों में मतभेद और किसी तरह की फूट न हो इसीलिए अपने जीवन ही में उसका हल बता दिया था, और एकता और आपसी भाई चारे के सबसे बेहतरीन नुस्ख़े की ओर इशारा करते हुए मुसलमानों को क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. से हमेशा जुड़े रहने और उन की पैरवी करने को कहा था, जिसको शिया और सुन्नी दोनों फ़िर्क़ों ने अपनी मशहूर और भरोसेमंद किताबों में बयान किया है।
 कहा जा सकता है कि बेहतरीन बल्कि केवल यही रास्ता (जिसको पैग़म्बर स.अ. ने अपने जीवन में ही बता दिया था) है जिस पर अमल करना मुसलमानों के सारे फ़िर्क़ों की बीच एकता को बाक़ी रख सकता है, और मुसलमानों का हर तरह की गुमराही और बहकने से बचा सकता है। हदीसे सक़लैन- सहीह तिरमिज़ी, जिल्द 5, पेज 329, अल-दुर्रुल मनसूर, जिल्द 6, पेज 7, अल-सवाएक़ुल मोहरेक़ह, पेज 147 और 226, तफ़सीरे इब्ने कसीर, जिल्द 4, पेज 113) सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि हदीसे सक़लैन को अहले सुन्नत के कुछ मुफ़स्सिरों जैसे फ़ख़रुद्दीन राज़ी ने एकता पर साफ़ शब्दों में ज़ोर देने वाली आयत की तफ़सीर करते हुए नक़्ल किया है। (मफ़ातीहुल ग़ैब, जिल्द 7, पेज 173)
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