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Code : 193137
Date of publication : 14/4/2018 13:8
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पैग़म्बर स.अ. की बेसत के फ़ायदे

अल्लाह ने पैग़म्बर स.अ. की बेसत के ऐलान के बाद इस बात की तरफ़ इशारा किया कि वह रसूल तुम्हारे ही बीच से है, यानी उसको आइडियल बना सकते हो, जैसाकि क़ुर्आन की आयत में साफ़ लफ़्ज़ों में उसने ऐलान किया कि बेशक तुम लोगों में से पैग़म्बर की ज़िंदगी उन लोगों के लिए बेहतरीन आइडियल है जो अल्लाह की रहमत और उससे मुलाक़ात की उम्मीद रखते हैं।
विलायत पोर्टल :  मुमकिन है कि इस दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारने वाले इंसान यह सोंचें कि अल्लाह ने हम इंसानों को अक़्ल और सूझबूझ की शक्ति दी है जिसकी मदद से हम अपने फ़ायदे और नुक़सान की बातों को ख़ुद ही समझ सकते हैं और जिनमें हमारा फ़ायदा हो उस पर अमल और जिनमें हमारा नुक़सान हो उनसे दूर रह सकते हैं और जिसका नतीजा यह होगा कि हम उस मक़सद यानी सआदत को हासिल कर लेंगे जिस तक पहुंचते हुए हमें अल्लाह देखना चाहता है, तो ज़ाहिर है जब सभी कुछ इतनी आसानी से हो जाएगा तो नबियों के आने और आसमानी ख़बरें लाने और हम लोगों को सवाब और अज़ाब की बातें बताने की क्या ज़रूरत है.......
जबकि हमारा अक़ीदा यह है कि अक़्ल और सूझबूझ की शक्ति और मानव विज्ञान होने के बावजूद हमें नबियों और इलाही क़ानून की ज़रूरत है और ज़ाहिरी हुज्जत यानी नबी और इमाम की ज़रूरत हर दौर में हर किसी के लिए है, और अगर देखा जाए तो जैसे जैसे ज़माना गुज़र रहा है वैसे वैसे इलाही क़ानून की ज़रूरत और ज़्यादा महसूस हो रही है। (शरहे कश्फ़ुल मुराद, अली मोहम्मदी, पेज 336-337)
यह बात इतनी अहम है कि ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी ने नबियों की बेसत की बहस में सबसे पहले इसी मामले को ज़िक्र किया है, इस बात को समझने के लिए इस बात की तफ़सील समझना ज़रूरी है कि अल्लाह की तरफ़ से नबियों का भेजा जाना बंदों पर उसका एहसान है, इसलिए यह सवाल कि अल्लाह ने नबियों को भेज कर क्यों सारे बंदों पर एहसान किया.....
इसके जवाब में इस विषय की अहमियत और इसका फ़ायदा ख़ुद बंदों को है और इसके सकारात्मक नतीजे भी बंदों के लिए ही हैं।
बेसत के क़ुर्आनी फ़ायदे
1- एक मुकम्मल इंसान को आइडियल बनाना-
इंसान के दुनिया और आख़ेरत में सआदत तक पहुंचने के लिए एक मुनासिब आइडियल का होना ज़रूरी है, और यह आइडियल पैग़म्बर स.अ. की शक्ल में अल्लाह ने इंसानों के लिए भेजा है, यही वजह है कि अल्लाह ने पैग़म्बर स.अ. की बेसत के ऐलान के बाद इस बात की तरफ़ इशारा किया कि वह रसूल तुम्हारे ही बीच से है, यानी उसको आइडियल बना सकते हो, जैसाकि क़ुर्आन की आयत में साफ़ लफ़्ज़ों में उसने ऐलान किया कि बेशक तुम लोगों में से पैग़म्बर की ज़िंदगी उन लोगों के लिए बेहतरीन आइडियल है जो अल्लाह की रहमत और उससे मुलाक़ात की उम्मीद रखते हैं। (सूरए अहज़ाब, आयत 21)
2- पैग़म्बर स.अ. द्वारा क़ुर्आन की तिलावत से ईमान का बढ़ना-
बेसत का एक फ़ायदा यह है कि पैग़म्बर स.अ. अल्लाह की तरफ़ से नूरानी आयतों को ले कर मोमेनीन के दिलों को मज़बूत और ताज़ा करने के लिए उनके सामने तिलावत करते थे, बेसत वाली आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि उन्हीं में से एक को पैग़म्बर स.अ. बनाया ताकि उनके लिए आयतों की तिलावत करे, और इस तिलावत से उन लोगों का क्या फ़ायदा होगा इस बात को क़ुर्आन ने एक दूसरी जगह बयान फ़रमाया मोमिन केवल वही लोग हैं जिनके सामने जब अल्लाह का ज़िक्र होता है तो उनके दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा हो जाता है और जब उनके लिए क़ुर्आन की आयतों की तिलावत की जाती तो उनका ईमान बढ़ जाता है, और वह केवल अल्लाह पर भरोसा करते हैं। (सूरए अनफ़ाल, आयत 2)
3- नफ़्स की पाकीज़गी-
बेसत का एक सबसे अहम फ़ायदा नफ़्स को पाक करना है, अल्लाह ने बेसत द्वारा लोगों को एक रास्ता दिया है ताकि नबियों जैसे कामिल इंसान को देख कर अपने नफ़्सों को पाक किया जा सके, अल्लाह जिसने इंसानों को पैदा किया वह इंसानों की क्षमता उनकी कमियों को पूरी तरह जानता है, नफ़्स की पाकीज़गी किस तरह मुमकिन है इसे अल्लाह और जो उसकी तरफ़ से नबी या इमाम बन कर आता है केवल वही बता सकते हैं, यही वजह है कि क़ुर्आन ने कई जगह नबियों के भेजने के मक़सद को नफ़्स की पाकीज़गी बताया है, अल्लामा तबरिसी नफ़्स की पाकीज़गी का मतलब शिर्क से पाकीज़गी को बताते हैं। (तर्जुमा जामेउल-जवामेअ, जिल्द 1, पेज 175)
4- किताब और हिकमत की तालीम-
अल्लाह ने अपने क़ानून और अहकाम को आसमानी किताबों द्वारा सिखाया है, बहुत से उलूम इंसान की अक़्ल की पहुंच से दूर हैं जिसको केवल अल्लाह ही जानता है इसी तरह अल्लाह की बहुत सी हिकमत को इंसान की अक़्ल बिना किसी मदद के नहीं समझ सकती, शायद किताब से मुराद शरई अहकाम और हिकमत से मुराद उनके राज़ हों, और हो सकता है कि किताब से मुराद ख़ुद क़ुर्आन हो और हिकमत से मुराद उसकी तफ़सीर, और यह भी मुमकिन है कि किताब से मुराद इंसानी ज़िंदगी हो और हिकमत से मुराद ज़िंदगी की वह ऊंचाईयां जिसे इंसान तक़वा और ईमान के नतीजे में हासिल करता है, पैग़म्बर स.अ. इन्हीं सब बातों को अपने दौर के मोमिनों का सिखा रहे थे जबकि वह सब पैग़म्बर स.अ. से पहले खुली हुई गुमराही में थे। (तफ़सीरे कौसर, जाफ़री, जिल्द 2, पेज 295)
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