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Date of publication : 14/4/2018 20:42
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सय्यद हसन नसरुल्लाह की ज़िंदगी पर एक निगाह (3)

आप इमाम मूसा सद्र को केवल अमल संगठन की ही नहीं बल्कि हिज़बुल्लाह की भी बुनियाद रखने वाला समझते थे और आप उनसे इतनी मोहब्बत करते थे कि ख़ुद को उनकी औलाद जैसा समझते थे, लेकिन उनके बाद ही दोनों संगठनों में मतभेद शुरू हुए और दोनों के रास्ते अलग हो गए। लेकिन हिज़बुल्लाह ने दिन प्रतिदिन बहुत तरक़्की की, इस संगठन का मक़सद शियों के बुनियादी अक़ीदों को बचाना और उस दिशा में क़दम आगे बढ़ाना है जिस दिशा में इमाम ज़माना अ.स. चाहते हैं, सय्यद हसन नसरुल्लाह का कहना है कि हमें ऐसा नहीं सोंचना चाहिए कि अगर हमको सम्मान दिया जा रहा है तो हम यह न सोंच बैठें कि दीनी सियासी और मज़हबी जानकारियां केवल हमारे ही पास हैं।

विलायत पोर्टल : 
जैसाकि पिछले आर्टिकल में ज़िक्र किया गया कि आप उच्च शिक्षा के लिए नजफ़ इराक़ गए थे, लेकिन वहां की सद्दाम हुकूमत ने इल्म हासिल करने वालो सभी विदेशियों को परेशान करना शुरू कर दिया और उन सभी को मजबूर कर दिया कि वह अपने अपने देश वापस चले जाएं, और दूसरी तरफ़ लेबनान में गृह युध्द की छिटपुट घटनाएं भी सामने आना शुरू हो गई थीं इसलिए आप वहां ज़्यादा समय नहीं रुक पाए, और केवल इराक़ ही नहीं बल्कि लेबनान के अंदरूनी हालात कुछ ऐसे ख़राब हुए कि और भी कई देशों ने लेबनान के लोगों को अपने देश से निकालना शुरू कर दिया।
उन पर कभी अमल संगठन के होने का आरोप लगाया जाता कभी सीरिया के किसी संगठन का, बस इतना समझ लीजिए ऐसे ही कुछ आरोपों के चलते 1978 तक सभी देशों से लेबनानियों को निकाल दिया गया हालांकि इनमें से कुछ ऐसे भी थे जिनको पकड़ कर कई महीनों तक पूछताछ भी की गई। आप चूंकि अपनी पढ़ाई को लेकर काफ़ी गंभीर थे इसलिए नजफ़ से वापस आने पर आपको अफ़सोस था, लेकिन बस कुछ ही समय गुज़रा था कि शहीद अब्बास मूसवी ने कुछ उलमा की मदद से बालबक शहर में एक दीनी हौज़े की बुनियाद रखी जो अभी तक चल रहा है, आप इस हौज़े में पढ़ भी रहे थे और पढ़ा भी रहे थे और साथ ही अमल संगठन की बहुत सारी ज़िम्म्दारियों को भी संभाले हुए थे, और आपकी गंभीरता को देखते हुए अमल संगठन ने आपको प्रतिनिधि बना कर 1982 में बेक़ाअ शहर में भेजा, इस बीच आप राजनीतिक गतिविधियों के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए थे।

सय्यद हसन नसरुल्लाह की ज़िंदगी पर एक निगाह (1)

जून 1982 में अवैध राष्ट्र इस्राईल ने लेबनान पर हमला करना शुरू कर दिया, और यह साल सय्यद हसन नसरुल्लाह की ज़िंदगी में अहम मोड़ लाया क्योंकि एक तरफ़ इस्लाईली सेना ने बैरूत पर क़ब्ज़ा कर लिया था और दूसरी तरफ़ उस समय अमल संगठन के जनरल सेक्रेटरी का इस बात पर ज़ोर था कि अमल संगठन इस्राईल सेना का मुक़ाबला करे जबकि उस समय हालात इस बात की अनुमति नहीं दे रहे थे इसीलिए अमल के जनरल सेक्रेटरी की बातों का कुछ बुज़ुर्गों ने विरोध करते हुए इस संगठन को छोड़ दिया, हालांकि मतभेद शुरू हो चुके थे क्योंकि संगठन में इमाम मूसा सद्र के दिशा निर्देश को बहुत से संगठन के ज़िम्मेदार लोग अनदेखा कर रहे थे, शुरू में तो यह मतभेद मामूली लग रहे थे लेकिन फिर संगठन के कुछ लोगों का इस्राईल के साथ ख़ुफ़िया संबंध कारण बना जिस से कई लोगों ने इस संगठन को छोड़ दिया। (हालंकि बाद में इस्राईल से ख़ुफ़िया संबंध वाले भी बाक़ी नहीं रह पाए)
लेकन ध्यान देने वाली बात यह थी कि सय्यद हसन नसरुल्लाह ने इस संगठन को छोड़ दिया था लेकिन आपके भाई उसी से जुड़े हुए ख़िदमत करते रहे। शुरू में आपका घराना इतना ज़्यादा दीनदार नहीं था लेकिन बहुत ही कम समय में आपका घराना इतना दीनदार हो गया कि घर के मर्द के साथ साथ औरतें भी मज़हबी और सियासी गतिविधियों का हिस्सा बन गईं थीं।
आप इमाम मूसा सद्र को केवल अमल संगठन की ही नहीं बल्कि हिज़बुल्लाह की भी बुनियाद रखने वाला समझते थे और आप उनसे इतनी मोहब्बत करते थे कि ख़ुद को उनकी औलाद जैसा समझते थे, लेकिन उनके बाद ही दोनों संगठनों में मतभेद शुरू हुए और दोनों के रास्ते अलग हो गए। लेकिन हिज़बुल्लाह ने दिन प्रतिदिन बहुत तरक़्की की, इस संगठन का मक़सद शियों के बुनियादी अक़ीदों को बचाना और उस दिशा में क़दम आगे बढ़ाना है जिस दिशा में इमाम ज़माना अ.स. चाहते हैं, सय्यद हसन नसरुल्लाह का कहना है कि हमें ऐसा नहीं सोंचना चाहिए कि अगर हमको सम्मान दिया जा रहा है तो हम यह न सोंच बैठें कि दीनी सियासी और मज़हबी जानकारियां केवल हमारे ही पास हैं।

सय्यद हसन नसरुल्लाह की ज़िंदगी पर एक निगाह (2)

हिज़्बुल्लाह के सदस्यों का अक़ीदा है कि 20वीं सदी के सबसे महान आलिम इमाम ख़ुमैनी र.ह. थे और उनकी वफ़ात के बाद आयतुल्लाह ख़ामेनई वह शख़्सियत हैं जो उनके बाद उनकी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकते हैं, जिस समय हिज़बुल्लाह का गठन हुआ आप केवल 22 साल के थे और केवल हिज़बुल्लाह की लीडर शिप कमेटी के सदस्य थे, लेकिन आपकी कड़ी मेहनत और ख़िदमत के जज़्बे ने उन्हें बहुत आगे पहुंचाया, आप केवल एक सैनिक थे फिर आप बालबक शहर में हिज़बुल्लाह की ब्रांच के सेक्रेटरी बने उसके बाद बेक़ाअ शहर में (लेबनान का पूरा उत्तरी इलाक़ा) हिज़बुल्लाह की ब्रांच सेक्रेटरी बनाया गया उसके बाद आपको सय्यद इब्राहीम ऐमन जो बैरूत की ब्रांच के सेक्रेटरी थे उनका सहायक बनाया गया, कुछ ही समय बाद हिज़बुल्लाह के उच्चाधिकारियों ने सियासी मामलों को बाक़ी दूसरे मामलों से अलग कर दिया जिसके बाद सय्यद इब्राहीम ने सियासी मामलों को अपने हाथों में ले लिया और बैरूत के बाक़ी सभी मामलों का ज़िम्मेदार आपको बना दिया गया, इसी तरह आपकी मेहनत और हौसले और ईमानदारी को देख कर आपको ख़िदमत के मौक़े मिलते गए और फिर आपको हिज़बुल्लाह की लीडर शिप कमेटी का कार्यकारी अधिकारी बना दिया गया।
इतनी बड़ी बड़ी ज़िम्मेदारियों के बावजूद आप की कोशिश यही थी कि मेरी पढ़ाई जारी रहे ताकि आगे चल कर मुजतहिद बन सकें, लेकिन इस्राईल के हमले के बाद आप मजबूर हो गए कि अपनी पढ़ाई को पूरी तरह से रोक कर हिज़बुल्लाह को पूरा समय दें, लेकिन 7 साल बाद 1989 में हालात कुछ नार्मल हुए तो आपको फिर पढ़ाई जारी रखने का मौक़ा मिला, आप उसका फ़ायदा उठाते हुए ईरान गए ताकि अपनी पढ़ाई को और आगे बढ़ा सकें। आप इधर ईरान अपनी पढ़ाई के लिए गए उधर लेबनान में अफ़वाह फैलना शुरू हो गई कि हिज़बुल्लाह में दाख़िली मतभेद के चलते सय्यद हसन नसरुल्लाह ने हिज़बुल्लाह छोड़ दी है और ईरान चले गए हैं, हालात यहां तक ख़राब हो गए थे कि बेक़ाअ शहर में लोग इसी बात को लेकर एक दूसरे का ख़ून बहाने पर तुले हुए थे, इन हालात को देखने के बाद सय्यद हसन नसरुल्लाह ने वापस जाने का फ़ैसला किया।

आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र की ज़िंदगी पर एक निगाह

इस बार भी आप जिस तरह पढ़ाई करना चाह रहे थे उस तरह नहीं हो सकी, हालात ने समय से पहले ही वापसी पर मजबूर कर दिया जिसका एहसास उन्हें आज तक है जिसे वह अपने बयान में ज़िक्र भी करते हैं, और हालात अगर बेहतर हो जाएं तो आज भी वह सब कुछ छोड़ कर अपनी पढ़ाई जारी करने के लिए तैयार हैं।
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