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Date of publication : 16/4/2018 16:52
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क्या इमाम ज़माना अ.स. की विलायत ख़त्म हो गई जो रहबर की विलायत को मानें?

जिस समय इमाम अली अ.स. ने मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को मिस्र का हाकिम बनाया तो आपके शब्द इस प्रकार थे... انی قد ولیتک اعظم اجنادی فی نفسی اھل مصر मैंने तुमको अपने बेहतरीन लश्कर मिस्र वालों का वली बनाया है.... (नहजुल बलाग़ा, सय्यद रज़ी र.ह. ख़त न. 27) जनाब क्या अब हम इमाम अली अ.स. से यह सवाल करें कि क्या आपकी विलायत मिस्र पर ख़त्म हो गई जो आप मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को वली बना रहे हैं? तो जनाब अल्लाह से डरें और पब्लिक को ख़ुश करने के चक्कर में इतना आगे न निकल जाएं कि बकवास करने लगें, इमाम अली अ.स. ख़ुद मिस्र में मौजूद नहीं थे और इमाम अ.स. की ग़ैर मौजूदगी में लोगों पर इमाम अ.स. के हुक्म को लागू करने और लोगों तक इमाम अ.स. की बात पहुंचाने के लिए इमाम अ.स. ने मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को मिस्र का वली बनाया, यह विलायत मआज़ अल्लाह, अल्लाह और रसूल स.अ. के मुक़ाबले पर नहीं बल्कि यह विलायत केवल इमाम अ.स. प्रतिनिधित्व के लिए थी।
विलायत पोर्टल :  यह कोई नई बात नहीं है जब इस्लाम में किसी ने दीनी चोले की आड़ में दीन की अहम और बुनियादी बातों को तोड़ मरोड़ के पेश किया हो, पैग़म्बर स.अ. के ज़माने से ही ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने अपने निजी फ़ायदों के लिए लोगों के अक़ीदों से खिलवाड़ किया है, और इसी तरह इमामों की ज़िंदगी में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जिन्होंने दीन को समझने में ख़ुद को इमाम अ.स. से क़ाबिल समझते हुए इमाम अ.स. के मुक़ाबले में अपनी राय और अक़ीदे को बेहतर ज़ाहिर किया है।

आयतुल्लाह ख़ामेनई दुनिया के श्रेष्ठ राजनेताओं की निगाह में

इसी तरह अभी हाल ही में कुछ दिन पहले एक क्लिप बहुत तेज़ी से वायरल हो रही थी जिसमें एक साहब बड़े जोश में दीनी लिबास पहने हुए यह कह रहे थे विलायत-ए-फ़क़ीह को हम क्यों मानें? जब इमाम ज़माना अ.स. ख़ुद मौजूद हैं तो उनकी मौजूदगी में किसी और को वली क्यों मानें? क्या इमाम ज़माना अ.स. की विलायत ख़त्म हो गई है जो हम किसी और को वली मान लें? और दिलचस्प बात यह है कि वह यह बातें करते हुए काफ़ी भड़के हुए भी थे और बहुत उछल उछल कर आपत्ति जता रहे थे, मुझे इस बात का बहुत अफ़सोस हुआ , मज़हबी लिबास पहन कर ऐसी बातें करना खुला धोखा है, इनसे मेरा कहना है कि जनाब आप केवल आम पब्लिक ही को नहीं बल्कि ISIS को भी ख़ुश करना चाह रहे हैं, जबकि आपका ज़मीर जानता है कि आप बिल्कुल ग़लत कह रहे हैं। अपनी बात को और साफ़ करने के लिए कुछ मिसालें आपके लिए पेश हैं....
** अल्लाह का फ़रमान है कि.... ۔ انَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ وَالَّذِينَ آوَوا وَّنَصَرُوا أُولَـٰئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُم مِّن وَلَايَتِهِم مِّن شَيْءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُوا
बेशक जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह की राह में अपनी जान और माल को क़ुर्बान किया और जिन्होंने पनाह दी और मदद की यह सब लोग आपस में एक दूसरे के वली हैं, और जिन लोगों ने ईमान ला कर हिजरत नहीं की उनकी विलायत से आपका कोई संबंध नहीं है जब तक वह हिजरत न कर लें। (सूरए अनफ़ाल, आयत 72)
अब मेरा आप जनाब से सवाल है आप जो उस क्लिप में चीख़ चीख़ कर अदाएं दिखा कर लोगों के अक़ीदों से यह कह कर खिलवाड़ कर रहे थे और उनके दिलों और अक़ीदों में शंका पैदा कर रहे थे कि इमाम ज़माना अ.स. के होते हुए क्या किसी और की विलायत कैसे हो सकती है तो ज़रा इसका जवाब दीजिए कि अल्लाह ने इस आयत में हिजरत करने वालों को एक दूसरे का वली बनाया है, तो मौलाना साहब मआज़ अल्लाह क्या अल्लाह की विलायत ख़त्म हो गई जो अल्लाह हिजरत करने वालों को एक दूसरे का साथी बना रहा है?
** इसी तरह अल्लाह एक और जगह इरशाद फ़रमाता है... وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ يَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَيُطِيعُونَ اللَّـهَ وَرَسُولَهُ ۚ
मोमिन मर्द और मोमिन औरतें आपस में एक दूसरे के वली और मददगार हैं कि यह सब एक दूसरे को नेकियों का हुक्म देते हैं और बुराईयों से रोकते हैं नमाज़ क़ाएम करते हैं ज़कात अदा करते हैं अल्लाह और रसूल की इताअत करते हैं। (सूरए तौबा, आयत 71) इस आयत में भी अगर आप ध्यान देंगे तो साफ़ शब्दों में दिखाई देगा कि अल्लाह ने मोमेनीन में कुछ को एक दूसरे का वली बनाया है।
** फ़िक़्ह की बहसों में कई जगहों पर बाप दादा को वली बताया गया है, जैसाकि हमारी हदीस की दूसरी सबसे अहम किताब मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह की तीसरी जिल्द के पेज न. 398 में शैख़ सदूक़ र.ह. ने एक बाब का ज़िक्र किया है जिसका नाम बाबुल वली अल-शोहूद वल ख़ुत्बतो वस-सेदाक़ दिया है जिसका मतलब वली और गवाह, ख़ुत्बा और मेहेर है। हुज़ूर अब आप शैख़ सदूक़ र.ह. को कहेंगे कि शैख़ सदूक़ र.ह. अल्लाह और रसूल स.अ. की विलायत का इंकार कर रहे हैं जो वह ऐसे बाब को अपनी फ़िक़्ह की किताब में ज़िक्र कर रहे हैं, लेकिन अगर आपके पास समय हो तो इस किताब के इस बाब को ज़रूर पढ़ लीजिएगा, इसमें आपको इमामों से नक़्ल होने वाली वह हदीसें भी मिल जाएंगी जिसमें ख़ुद मासूमीन अ.स. ने बाप और दादा को बच्चों का वली बनाया है, ख़ुदा वास्ता पब्लिक को ख़ुश करने के लिए चीज़ों को तोड़ मरोड़ कर पेश मत कीजिए।

आयतुल्लाह ख़ामनेई का पत्र , यूरोप और अमेरिकी जवानों के नाम

** जिस समय इमाम अली अ.स. ने मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को मिस्र का हाकिम बनाया तो आपके शब्द इस प्रकार थे... انی قد ولیتک اعظم اجنادی فی نفسی اھل مصر
मैंने तुमको अपने बेहतरीन लश्कर मिस्र वालों का वली बनाया है.... (नहजुल बलाग़ा, सय्यद रज़ी र.ह. ख़त न. 27) जनाब क्या अब हम इमाम अली अ.स. से यह सवाल करें कि क्या आपकी विलायत मिस्र पर ख़त्म हो गई जो आप मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को वली बना रहे हैं? तो जनाब अल्लाह से डरें और पब्लिक को ख़ुश करने के चक्कर में इतना आगे न निकल जाएं कि बकवास करने लगें, इमाम अली अ.स. ख़ुद मिस्र में मौजूद नहीं थे और इमाम अ.स. की ग़ैर मौजूदगी में लोगों पर इमाम अ.स. के हुक्म को लागू करने और लोगों तक इमाम अ.स. की बात पहुंचाने के लिए इमाम अ.स. ने मोहम्मद इब्ने अबू बक्र को मिस्र का वली बनाया, यह विलायत मआज़ अल्लाह, अल्लाह और रसूल स.अ. के मुक़ाबले पर नहीं बल्कि यह विलायत केवल इमाम अ.स. प्रतिनिधित्व के लिए थी।
जिस विलायत का आपने अपने गुमान में पब्लिक यहां तक कि दीन के खुले दुश्मनों को ख़ुश करने के लिए मज़ाक़ उड़ाया उसी विलायत ने शियों को ऐतिहासिक सम्मान दिलाया है, आज हर सूझ बूझ रखने वाला इंसान यह समझ रहा है कि आज इसी विलायत-ए-फ़क़ीह के सिस्टम ने किस तरह साम्राज्यवादी शक्तियों की आंखों में आंखें डाल कर उनकी और इस दौर के यज़ीदियों की नाक ज़मीन में रगड़ दी है, और इमाम ज़माना अ.स. के ज़ुहूर के बाद यह विलायत अपने पूरे अधिकारों के साथ इमाम अ.स. के पास होगी, क्या इमाम अ.स. को ज़ुहूर के बाद अपने जद इमाम अली अ.स. और दूसरे मासूमीन अ.स. की तरह प्रतिनिधित्व (सफ़ीर) की ज़रूरत नहीं होगी? या आप उस समय इमाम अ.स. का भी मआज़ अल्लाह विरोध करेंगे? क्या आपको आज दुनिया में चारो तरफ़ शीयत का बढ़ता सम्मान नहीं दिख रहा?
क्या आपको इस्लाम और इस्लाम से जुड़ी हुई चीज़ों का हमेशा से दुश्मन रहने वाला पूरा साम्राज्यवाद इस सिस्टम से डरा हुआ दिखाई नहीं देता? क्या यह इमामों की सीरत के अलावा कुछ और है कि जहां भी किसी भी अल्लाह का नाम लेने वाले का ख़ून बहा वहां इस सिस्टम ने सबसे पहले आवाज़ उठाई?
क्या हमारे पहले क़िब्ले बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी के लिए इस सिस्टम द्वारा कोशिशों को आप अनदेखा कर देंगे? आप और जिनको ख़ुश करने के लिए आप ऐसी बेबुनियाद बातें कर रहे हैं वह उस समय कहां थे जब फ़िलिस्तीन, इराक़,बहरैन, सीरिया, यमन और लेबनान में मुसलमानों विशेष कर अहलेबैत अ.स. के चाहने वालों का ख़ून बहाया जा रहा था?
आप उस समय कहां थे जब ISIS ने पूरे इस्लामी जगत को ख़ून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया था? आप उस समय कहां थे जब ISIS साम्राज्यवादी शक्तियों की मदद से अहलेबैत अ.स. के रौज़ों को मिटाने की क़सम खा कर हमले कर रहा था? आप उस समय कहां थे जब सऊदी में शियों के लीडर आयतुल्लाह शैख़ बाक़िर अल-निम्र पर आले सऊद ज़ुल्म कर रहे थे? यहां तक शहीद कर डाला लेकिन आपके अंदर कोई हरकत नहीं दिखाई दी?
क्या आप बता सकते हैं कि रोहिंग्या के आवारा मुसलमानों के समर्थन में संयुक्त राष्ट्र को किसने ललकार कर वहां पर अल्लाह का नाम लेने वालों की मदद करने का दबाव डाला?
क्या आप बता सकते हैं कि किसने इराक़ और सीरिया में रौज़ों को बचाने के लिए पूरी दुनिया के मुसलमानों से न केवल अपील की बल्कि आतंकियों को इराक़ और सीरिया से पूरी तरह बाहर निकाल कर दम लिया?
क्या आप बता सकते हैं अफ़्रीक़ा के नाइजीरिया में रहने वाले अहलेबैत अ.स. के चाहने वालों विशेष कर आयतुल्लाह ज़कज़की पर होने वाले अत्याचारों के विरुध्द किसने आवाज़ उठाई?
इनमें से किसी एक सवाल का जवाब आपके पास नहीं होगा लेकिन हम आपको बता रहे हैं यह सब उसी विलायत-ए-फ़क़ीह के सिस्टम और वली-ए-फ़क़ीह की वजह से मुमकिन हुआ है जिसे आप जैसे लोग आलिम के लिबास में हो कर भी न केवल नहीं समझ पा रहे बल्कि लोगों के दिलों में शंकाएं पैदा कर रहे हैं। अल्लाह के लिए इंसाफ़ से काम लीजिए इस हुसैनी और अलवी सिस्टम का विरोध कर के आले यज़ीद को ख़ुश मत कीजिए, इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा सकता है लेकिन उम्मीद है कि इतना आपके लिए काफ़ी होगा। .................


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