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Code : 193281
Date of publication : 19/4/2018 16:36
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इमाम हुसैन अ.स. की नैतिक अच्छाईयां

उस समय घर में मौजूद कुल 4 हज़ार दीनार ला कर इमाम अ.स. के सामने पेश कर के कहा मौला घर में कुल इतनी ही रक़म है, इमाम अ.स. ने वह पैसे लिए और दरवाज़े के पीछे जा कर उसको दिए, इमाम अ.स. को दरवाज़े के पीछे जा कर उसको वह रक़म देने का राज़ यह था कि आप उसकी आंख में शर्मिंदगी नहीं देखना चाहते थे क्योंकि जब इंसान किसी के सामने हाथ फैलाता है तो उसकी आंखों में और उसके चेहरे पर शर्मिंदगी आ जाती है, इमाम अ.स. जब वापस उस अरबी के पास आए तो देखा वह उन पैसों को हाथ में लेकर रोते हुए कह रहा था मौला क्या यह कम रक़म थी जो आप दरवाज़े के पीछे जा कर दे रहे थे..... मैं तो यह सोंच रहा हूं कि ऐसा करम करने वाला हाथ कैसे ज़मीन के नीचे दफ़्न होगा।

विलायत पोर्टल :  रिवायत में है कि एक दिन एक ज़रूरतमंद शख़्स मदीने में आ कर लोगों से किसी ऐसे इंसान का पता पूछता है जो उसकी मदद कर सके, लोगों ने उसे इमाम हुसैन अ.स. के घर का पता बता दिया, वह जैसे ही मस्जिद के दरवाज़े पर पहुंचा और इमाम अ.स. को देखा उसने अपनी ज़रूरत को शायरी में बयान कर दिया, इमाम अ.स. उसे घर ले कर गए और जनाब क़म्बर को हुक्म दिया कि घर में जितने पैसे हों सब निकाल लाओ, क़म्बर गए और उस समय घर में मौजूद कुल 4 हज़ार दीनार ला कर इमाम अ.स. के सामने पेश कर के कहा मौला घर में कुल इतनी ही रक़म है, इमाम अ.स. ने वह पैसे लिए और दरवाज़े के पीछे जा कर उसको दिए, इमाम अ.स. को दरवाज़े के पीछे जा कर उसको वह रक़म देने का राज़ यह था कि आप उसकी आंख में शर्मिंदगी नहीं देखना चाहते थे क्योंकि जब इंसान किसी के सामने हाथ फैलाता है तो उसकी आंखों में और उसके चेहरे पर शर्मिंदगी आ जाती है, इमाम अ.स. जब वापस उस अरबी के पास आए तो देखा वह उन पैसों को हाथ में लेकर रोते हुए कह रहा था मौला क्या यह कम रक़म थी जो आप दरवाज़े के पीछे जा कर दे रहे थे..... मैं तो यह सोंच रहा हूं कि ऐसा करम करने वाला हाथ कैसे ज़मीन के नीचे दफ़्न होगा।
आपकी विनम्रता
वह दौर जहां इंसान अपने माल और दौलत पर तकब्बुर और घमंड करते हुए ग़रीबों को अपने पास खड़ा भी नहीं करता था उस दौर में इमाम हुसैन अ.स. ग़रीबों के साथ उठते बैठते थे, रिवायत में है कि एक दिन इमाम अ.स. एक रास्ते से गुज़र रहे थे वहीं पर एक किनारे मोहल्ले के कुछ फ़क़ीर एक साथ एक दस्तरख़ान पर बैठे खाना खा रहे हैं उन्होंने जैसे ही इमाम अ.स. को देखा अपने साथ खाने की दावत दी, इमाम अ.स. ने तुरंत उनकी दावत को क़ुबूल कर लिया और उनके साथ बैठ कर खाने लगे और फिर आपने फ़रमाया कि अल्लाह तकब्बुर करने वालों को पसंद नहीं करता, जब सभी खाना खा चुके तो इमाम अ.स. ने फ़रमाया आज मैंने तुम्हारी दावत क़ुबूल की अब तुम लोग मेरे घर दावत पर आना, जिस समय वह लोग आपके घर दावत पर गए इमाम अ.स. ने खुले दिल से उनका इस्तेक़बाल किया।

हज़रत ज़ैनब अ.स.

आपका माफ़ करना
 जब कूफ़ा के रास्ते में हुर ने अपने हज़ार सिपाहियों के साथ आपका रास्ता रोका तो कुछ रिवायत के अनुसार उस समय हुर का पूरा लश्कर प्यास से हलाक होने के क़रीब था, इमाम अ.स. ने जानते हुए भी न केवल उन्हें और उनके सिपाहियों बल्कि जानवरों तक को पानी पिलाया और उसके बाद हुर ने इमाम अ.स. को आगे जाने से रोक दिया और उनके अपने शहर मदीना भी वापस नहीं जाने दिया और इमाम अ.स. को पूरे परिवार और साथियों के साथ कर्बला के मैदान में घेर कर ले आया, और फिर जब शबे आशूर अपनी ग़तली का एहसास कर के इमाम अ.स. के पास आए तो इमाम अ.स. ने बिना किसी शर्त के कह कर माफ़ किया कि ऐ हुर मैंने भी माफ़ किया और मेरे ख़ुदा ने भी माफ़ किया और फिर गले लगा कर ख़ुद इस बात की माफ़ी मांगी कि हुर ऐसे समय में आए हो जब तुम्हारी मेहमान नवाज़ी के लिए मेरे पास पानी भी नहीं है।
ग़रीबों का ख़्याल
इमाम हुसैन अ.स. छिप कर और खुलेआम दोनों तरह से ग़रीबों का ख़्याल रखते थे, रात के सन्नाटे में उनके घरों में घर का राशन और दूसरी ज़रूरत की चीज़ें ख़ुद पहुंचाते थे, शुऐब इब्ने अब्दुर् रहमान ख़ुज़ाई कहते हैं कि जब इमाम हुसैन अ.स. शहीद हो गए तो उनकी पीठ पर घट्टे और ज़ख़्म देखे गए जब इमाम सज्जाद अ.स. से उनका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यह घट्टे और ज़ख़्म मेरे वालिद के अपने पीठ पर खाने का सामान रख कर ग़रीबों और यतीमों के बीच पहुंचाने के कारण है और वह इस काम को इतना छिप कर अंजाम देते थे कि उनके इस काम का ना ही किसी आदमी को पता चलता था और ना ही ख़ुद उन ग़रीबों और यतीमों को।

अलवी ज़िंदगी

आपकी इबादत
आपके दौर में अल्लाह की इबादत में आपकी कोई मिसाल नहीं थी, आपने अपनी पूरी ज़िंदगी में 25 पैदल हज अंजाम देने के लिए मदीने से मक्के का सफ़र किया, आपका दिल कभी ख़ुदा की याद से ख़ाली नहीं रहता था, ख़ुदा के ख़ौफ़ का असर आपके चेहरे से ही ज़ाहिर रहता था, एक दिन एक शख़्स ने आपसे इतना ज़्यादा ख़ुदा के ख़ौफ़ की वजह पूछी तो आपने फ़रमाया, इस दुनिया में जिस शख़्स के दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ नहीं हुआ तो वह आख़ेरत में उसके अज़ाब से नहीं बच सकता, आपको नमाज़ से बहुत लगाव था जैसकि रिवायत में है कि शबे आशूर आपने अपने भाई हज़रत अब्बास अ.स. से दुश्मन से एक रात के समय की मांग करने को कहा ताकि उस रात में नमाज़ पढ़ सकें, अल्लाह से कुछ दिल की बातें कर सकें और क़ुर्आन की तिलावत कर सकें, अल्लाह जानता है कि मैं नमाज़, क़ुर्आन की तिलावत, दुआ और इस्तेग़फ़ार से बहुत मोहब्बत करता हूं।
आपका इल्म
आपके इल्म के लिए इतना ही काफ़ी है कि आप इल्मे पैग़म्बर स.अ. के वारिस हैं, चाहने वालों और दुश्मन दोनों का मानना है कि आपके दौर में आपसे बड़ा कोई आलिम नहीं था, एक दिन नाफ़ेअ इब्ने अज़रक़ जो ख़्वारिज के अज़ारेक़ा फ़िर्क़े का सरगना था इसने अल्लाह की मारेफ़त से संबंधित इमाम अ.स. से कुछ सवाल पूछे आपने ऐसा मुंह तोड़ जवाब दिया कि वह हैरत में पड़ गया और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे और कहने लगा कि आपने बहुत सही जवाब दिया है, फिर इमाम अ.स. ने उससे कहा मैंने सुना है कि तुम मुझे और मेरे वालिद इमाम अली अ.स. को काफ़िर समझते हो, उसने कहा अगर मुझ से यह भूल हुई है तो आज मैं इस बात का पूरे यक़ीन के साथ ऐलान करता हूं कि आज के बाद से मेरी निगाह में इस्लाम के चिराग़ और अल्लाह के अहकाम को सबसे अधिक जानने वाले हैं और लोगों को आपके उलूम और मआरिफ़ से फ़ायदा उठाते हुए जेहालत के अंधेरों से बाहर निकलना चाहिए और आपके वुजूद की बरकत से हिदायत हासिल करनी चाहिए। ....................

इस्लाम को फैलाने और बचाने में इमाम अली अ.स. की भूमिका



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