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Code : 193320
Date of publication : 21/4/2018 19:5
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हज़रत अब्बास अ.स. और इरादों की मज़बूती

अल्लाह पर यही भरोसा और तवक्कुल और इरादों की मज़बूती थी जिसने हज़रत अब्बास अ.स. की शख़्सियत को इतना अज़ीम बना दिया कि सारे शोहदा उन पर गर्व करते नज़र आते हैं जैसाकि इमाम सज्जाद अ.स. की हदीस में है कि अल्लाह के नज़दीक हमारे चचा अब्बास की इतनी अज़मत है कि क़यामत के दिन सारे शोहदा उन पर गर्व करेंगे।

विलायत पोर्टल :  दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी गुज़री हुई ज़िंदगी बेहतरीन रही है लेकिन वह अपनी पिछली ज़िंदगी को बाक़ी रखने में नाकाम रहे हैं और उनके भविष्य अंधेरों में गुम हो कर रह गया। गुज़री ज़िंदगी कामयाब लेकिन हालिया जिंदगी में नाकाम और भविष्य में गुमनाम ज़िंदगी के पीछे का राज़ यह है कि ऐसे लोग अपने कल के इरादों की मज़बूती और सहनशक्ति जिनसे वह कामयाबी की ऊंचाईयों तक पहुंचे हैं उसे आने वाली ज़िंदगी में बाक़ी रखने में नाकाम रहे हैं, गुज़रा हुआ कल कितना ही कामयाब क्यों न हो लेकिन अगर आज उसे बाक़ी न रख सके तो हालिया और आने वाली ज़िंदगी दोनों नाकाम हो कर रह जाती है। इन लोगों का क्या कहना जिनका कल तो चमकता हुआ होता ही है हाल भी चमकता है और आने वाला समय जैसे जैसे गुज़रता है वैसे वैसे उनका वुजूद और चमक बिखेरने लगता है, और फिर उनके लिए कल आज और आने वाली ज़िंदगी एक समान हो जाती है क्योंकि ऐसे लोग हर ज़माने में बेहतरीन प्रतिभा और क्षमता के साथ सामने आते हैं और हर दौर की ज़रूरत बन जाते हैं और फिर अब वह न किसी जगह के पाबंद होते हैं न किसी दौर के, बल्कि जब जब कामयाबी का तसव्वुर आता है दुनिया उन्हें याद करती है। यह वह लोग होते हैं जिनको इनका ईमान मज़बूती देता है, और अल्लाह उनके ईमान को देख कर उनका हाथ ऐसे पकड़ता है कि फिर कभी उनके पैरों में लरज़ा नहीं आता, चाहे कितनी ही बड़ी मुश्किल क्यों न आ जाए लेकिन अब उनके पैर नहीं डगमगाते जैसाकि अल्लाह का इरशाद है कि अल्लाह ईमान वालों को दुनिया और आख़ेरत की ज़िंदगी में क़ौले साबित पर बाक़ी रखता है और ज़ालिमों को गुमराह कर देता है और अल्लाह अपनी मशीयत के मुताबिक़ अमल करता है। (सूरए इब्राहीम, आयत 27)

इमाम अली अ.स. ग़ैर मुस्लिम विद्वानों की निगाह में

यही उनके क़दम का न डगमगाना और ईमान का बाक़ी रहना उनके वुजूद में अल्लाह पर भरोसे और तवक्कुल का कारण होता है, उनका वुजूद दुनिया के तूफ़ानों के सामने पुकार कर कहता है कि मेरे क़दम को ज़माना हिला नहीं सकता कि मेरा हाथ किसी ज़िम्म्दार हाथ में है। ख़ुदा पर उनके इसी तवक्कुल और भरोसे की बुनियाद पर बहादुरी में भी उनका जवाब नहीं होता और ख़ुदा पर भरोसा उन्हें और ज़्यादा ताक़तवर बना देता है जैसाकि हदीस में है कि अगर कोई चाहता है कि ताक़तवर बने उसे अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। (मिशकातुल अनवार, पेज 18) अल्लाह पर यही भरोसा और तवक्कुल और इरादों की मज़बूती थी जिसने हज़रत अब्बास अ.स. की शख़्सियत को इतना अज़ीम बना दिया कि सारे शोहदा उन पर गर्व करते नज़र आते हैं जैसाकि इमाम सज्जाद अ.स. की हदीस में है कि अल्लाह के नज़दीक हमारे चचा अब्बास की इतनी अज़मत है कि क़यामत के दिन सारे शोहदा उन पर गर्व करेंगे।
 हज़रत अब्बास अ.स. की इतनी अज़मत यूंही नहीं है बल्कि इसके पीछे आपकी ग़ैरत, वफ़ा, बहादुरी, इरादों की मज़बूती और अगर सारे शब्दों को समेट कर एक शब्द में कहा जाए तो आपका ख़ुलूस है, इमाम की इताअत का वह जज़्बा है जो आपके वुजूद में मौजूद था। इंसान के वुजूद में जितना अल्लाह की बंदगी बढ़ेगी उतना अपने दौर के इमाम अ.स. के सामने विनम्र होगा और जिनता ज़्यादा इंसान इमाम अ.स. के सामने विनम्र होगा उतना ज़ालिमों के सामने कठोर और बहादुर होगा, आज जब हम हज़रत अब्बास अ.स. की विलादत की ख़ुशियां मना रहे हैं हमें दुआ करनी चाहिए कि अल्लाह क़मरे बनी हाशिम के सदक़े में हमारे अंदर भी वही ग़ैरत वही बहादुरी वही मज़बूत इरादा दे जो हमारे मौला और इमाम हुसैन अ.स. की फ़ौज के सरदार में था, हालांकि वह मज़बूत इरादा और हौसला उनकी मारेफ़ते इमाम की ख़ातिर था जिस तक हम पहुंच ही नहीं सकते क्योंकि हमारे अंदर न वह ख़ुलूस है न वह जज़्बा है न वह बंदगी है न ही इमाम अ.स. की वह मारेफ़त है लेकिन हमारे वुजूद में वक़्त के इमाम अ.स. से मोहब्बत है, हमारे वुजूद में कर्बला वालों का इश्क़ है, हमारे वुजूद में हज़रत अब्बास अ.स. के लिए एक तड़प है, ख़ुदाया हमारे इन्हीं जज़्बों को तू पाकीज़ा बना दे ताकि हम अपने मौला और आक़ा से थोड़ा क़रीब हो सकें। बिल्कुल वैसे ही जैसे प्रतिरोधी मोर्चे के लीडर सय्यद हसन नसरुल्लाह हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे शीयत का गौरव क़ासिम सुलेमानी हैं।
अगर हम अपने दौर में सय्यद हसन नसरुल्लाह और क़ासिम सुलैमानी जैसी शख़्सियतों के मज़बूत इरादों उनके हौसलों और जज़्बों की बुनियाद तलाश करें तो वह यही है कि वह लोग इस दौर में जहां उनके आक़ा और मौला ग़ैबत में हैं लेकिन वह अपने इमाम अ.स. से ग़ाफ़िल नहीं हैं बल्कि इस दौर में भी उनका इंतेज़ार करते हुए उनके नाएब की आंखों के एक इशारे पर अपनी जान देने को तैयार हैं,और अपनी तमाम कामयाबियों को इमाम अ.स. के नाएब की कामयाबियां बताते हुए ख़ुद को केवल उनकी आइडियॉलोजी का एक मामूली सा सिपाही समझते हैं, यही वजह है कि साम्राज्यवादी शक्तियां उनके नाम से ही ख़ौफ़ खाती हैं, इनकी बहादुरी और मज़बूत इरादों के चर्चे साम्राज्यवाद में ऐसे ही हैं जैसे उनके आक़ा और मौला के चर्चे दुश्मनों की फ़ौज में थे।
वह कर्बला के अलमदार की मारेफ़ते इमाम की मंज़िल थी जब दुश्मन की ओर से शिम्र अमान नामा लाया तो आपने यह कह कर वापस दिया कि तुझ पर भी लानत और तेरे अमान नामे पर भी लानत, यह इरादों की मज़बूती और हिम्मत केवल कर्बला तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उसकी झलक हम ने हालिया दिनों में भी देखी जब आज के युग के यज़ीदों की तरफ़ से एक ख़त हज़रत अब्बास अ.स. के ख़ादिम क़ुद्स ब्रिगेड के जनरल क़ासिम सुलेमानी को मिला तो आपने भी उसे खोल कर देखा तक नहीं बल्कि जैसे आया था उसे वैसे ही वापस कर दिया, बेशक आपकी निगाहों में सन् 61 हिजरी की कर्बला होगी जब मेरे मौला और आक़ा ने उस दौर की सबसे बड़ी ताक़त की ओर से आने वाले अमान नामे को क़ुबूल नहीं किया तो आज के दौर की कर्बला में उनका एक मामूली ख़ादिम आज की बड़ी ताक़त के ख़त को खोल कर क्या करेगा, न हुसैनियत का रंग बदला न यज़ीदियत का अंदाज़ बदला, न हुसैनियत का इरादा बदला न यज़ीदियत का कमीना पन बदला, अगर कुछ बदला है तो वह समय है और समय के बदलने से कूफ़ी और शामी अंदाज़ बदलते हैं हुसैन अ.स. वाले नहीं, कल मेरे आक़ा ने अमान नामे पर लानत भेज कर उसे वापस कर के अपने मज़बूत इरादे का सबूत दिया था आज उनके ख़ादिम ने उस ख़त को वापस भेज कर बता दिया कि कर्बला आज भी ज़िंदा है, और इमाम हुसैन अ.स. के आशिक़ों के इरादों की मज़बूती में न कल कोई कमी आई थी न आगे कभी किसी तरह की कमी आ सकती है। رَبَّنَآ اَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَّثَبِّتْ اَقْدَامَنَا وَانْصُرْنَا عَلَي الْقَوْمِ الْكٰفِرِيْنَ ख़ुदाया हमें सब्र से भर दे हमारे क़दमों में मज़बूती दे और कुफ़्फ़ार पर हमें कामयाबी अता कर। सूरए बक़रह, आयत 250)
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