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Date of publication : 23/4/2018 16:43
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मुनाजाते शाबानिया इमाम ख़ुमैनी र.ह. की निगाह में

इल्मे इरफ़ान की सभी वह बातें जिनको इरफ़ानी उलमा ने लंबी लंबी किताबों में बयान किया है उन सभी उलमा ने इसी मुनाजाते शाबानिया और इस जैसी और दुआओं से सीख लेते हुए लिखा है। यह वह दुआएं हैं जिनके अंदर ज़िक्र किए गए इलाही और इरफ़ानी मतालिब को देखते हुए हमारे कुछ बुज़ुर्ग उस्तादों (इमाम ख़ुमैनी र.ह. के इल्मे इरफ़ान के उस्ताद आयतुल्लाह मोहम्मद अली शाहाबादी) ने क़ुर्आन कहा है, कि जिस तरह से क़ुर्आन आसमान से ज़मीन की तरफ़ नाज़िल हुआ यह दुआएं ज़मीन से आसमान की तरफ़ जाती हैं।

विलायत पोर्टल : इमाम ख़ुमैनी र.ह. ख़ुद एक मुकम्मल आरिफ़ थे जिन्होंने अपने नफ़्स को दुनिया की मोहब्बत से रोक रखा था, आप आम जनता और हुकूमत की देखरेख में काम करने वालों से मुलाक़ात के समय भी इसी मुनाजात के क़ीमती हिस्सों की तिलावत कर के उस पर अमल की दावत देते थे। इसी तरह और भी दूसरी जगहों पर आपने इस मुनाजात की फ़ज़ीलत को बयान करते हुए लोगों से पढ़ने के लिए भी कहा है, जिस से पता चलता है कि इमाम ख़ुमैनी र.ह. को इस मुनाजात से बहुत लगाव था। इस लेख में माहे शाबान में दुआ और मुनाजाते शाबानिया की अहमियत को इमाम ख़ुमैनी र.ह. के बयान की रौशनी में पेश किया जा रहा है। माहे शाबान में दुआ की अहमियत यह जो अलग अलग महीनों और दिनों की दुआएं ज़िक्र हुई हैं विशेष कर रजब, शाबान और रमज़ान के महीनों की दुआएं, जो इंसान की रूह को मज़बूत बनाती हैं (अगर कोई उसके क़ाबिल हो हम लोग तो नहीं हैं) इसी तरह तरह इंसान के वुजूद को और ज़्यादा नूरानी बना देती हैं, और अगर कोई अंधेरों में ज़िंदगी गुज़ार रहा है तो यह दुआएं उसे अंधेरों से निकाल कर उजाले में खड़ा कर देती हैं, आप किसरवी जैसे लोगों के बहकावे में मत आईए जो दुआओं को कमज़ोर करने में लगे हैं, क्योंकि दुआओं को कमज़ोर करना इस्लाम को कमज़ोर करने के बराबर है ऐसे लोग जाहिल हैं।
यह लोग नहीं जानते इन (दुआ की) किताबों में क्या है, इन किताबों में वही क़ुर्आनी बातें हैं जिनको इमामों ने अपनी ज़ुबान में बयान कर दिया है, क़ुर्आन का अपना एक अलग लहजा है दुआओं का अपना एक अलग लहजा है और इसी तरह उलमा और ओरफ़ा का अलग लहजा है। वह चीज़ जो इंसान को अंधेरों से निकाल कर उजाले में खड़ा करती है और उसके नफ़्स की बीमारियों को दूर करती है वह यही दुआएं हैं जो इमामों से नक़्ल हुई हैं।
चूंकि हमारे अधिकतर इमामों ने हुकूमत की ओर से कड़ी निगरानी के बीच ज़िंदगी गुज़ारी और उन पर हुकूमत की ओर से सख़्त पाबंदियां थीं जिसकी वजह से जैसे वह चाह रहे थे उस तरह से तबलीग़ नहीं कर पा रहे थे जिसके चलते उन्होंने दुआ का इस्तेमाल करते हुए दीनी मआरिफ़ लोगों तक पहुंचाए। यही वह दुआएं थीं जिनको पढ़ कर लोग अपनी रूह और ईमान को मज़बूत कर रहे थे और शहादत को हंसी ख़ुशी गले लगाने के लिए तैयार रहते थे। माहे रजब और माहे शाबान की दुआएं इंसान को अल्लाह की मेहमानी के लिए तैयार करती हैं, वह महीना जिस में अल्लाह अपने दस्तरख़ान को सारे बंदों के लिए बिछा देता है जिसमें हमारी रूह की मेहमान नवाज़ी के लिए शबे क़द्र को रखा है जिसमें वह हमारी रूह की मेहमान नवाज़ी का इंतेज़ाम करता है। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 13, पेज 32-33)
आप एक दूसरी जगह फ़रमाते हैं कि वह दुआएं जो शाबान के मुबारक महीने और उसके बाद रमज़ान जैसे अज़ीम महीने के लिए नक़्ल हुई हैं उनको हम सब को पढ़ना चाहिए और उसमें फ़िक्र करना चाहिए। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 20, पेज 249-250) मुनाजाते शाबानिया इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने जगह जगह अपने बयान में मुनाजाते शाबानिया की अहमियत पर ज़ोर दिया है, आपने न केवल आम लोगों बल्कि सरकारी कर्मचारियों और उलमा को भी मुनाजाते शाबानिया को ध्यान दे कर पढ़ने की ताकीद करते हुए फ़रमाया, मैंने किसी और दुआ या मुनाजात के बारे में नहीं देखा कि जिसे सभी इमामों ने इतनी अहमियत दे कर पढ़ी हो, यह मुनाजाते शाबानिया हमें अल्लाह के मेहमानी के क़ाबिल बनाने के लिए है। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह. जिल्द 13, पेज 31)
आप एक दूसरी जगह फ़रमाते हैं कि मुनाजाते शाबानिया उन मुनाजात में से है जिसकी मिसाल बहुत कम नज़र आती है (यानी जिस तरह के इरफ़ानी मफ़हूम को इस दुआ में बयान किया गया है दूसरों में कम नज़र आता है) बिल्कुल उसी तरह जैसे दुआओं में अबू हमज़ा सुमाली जो इमाम सज्जाद अ.स. से नक़्ल हुई है उस जैसी इरफ़ान के मफ़ाहीम वाली दुआएं बहुत कम हैं, इसी तरह दुआए कुमैल जिसके पढ़ने की ताकीद शबे बरात (शबे 15 शाबान) में की गई है, इन दुआओं में ऐसे ऐसे राज़ छिपे हैं जिसका समझना आसान नहीं है, इनके अलावा और भी जो दुआएं इमामों से नक़्ल हुई हैं उनके तर्जुमे और उसके मफ़हूम पर ध्यान देना चाहिए, बुज़ुर्ग उलमा ने इन दुआओं की तफ़सीर लिखी हैं उसको पढ़ना चाहिए यह और बात है कि इन दुआओं के तर्जुमे और तफ़सीर का हक़ कोई भी अदा नहीं कर सकता। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 20, पेज 250)
उस अज़ीम आरिफ़ का मुनाजाते शाबानिया के बारे में कहना था कि यह मुनाजात अहम मुनाजातों में से एक है जिसमें इलाही मआरिफ़ को बेहतरीन तरीक़े से बयान किया गया है जिस किसी मे रूहानियत और मानवियत को समझने की क़ाबलियत होगी वह इन मआरिफ़ को अपनी क़ाबलियत के अनुसार समझेगा। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 17, पेज 456) या आपने फ़रमाया कि अगर मुनाजाते शाबानिया के अलावा कोई दूसरी दुआ न होती तो यही इलाही मआरिफ़ को समझने के लिए काफ़ी थी, क्योंकि हमारे बर हक़ इमामों ने इस दुआ की तालीम दी है।
 इल्मे इरफ़ान की सभी वह बातें जिनको इरफ़ानी उलमा ने लंबी लंबी किताबों में बयान किया है उन सभी उलमा ने इसी मुनाजाते शाबानिया और इस जैसी और दुआओं से सीख लेते हुए लिखा है। यह वह दुआएं हैं जिनके अंदर ज़िक्र किए गए इलाही और इरफ़ानी मतालिब को देखते हुए हमारे कुछ बुज़ुर्ग उस्तादों (इमाम ख़ुमैनी र.ह. के इल्मे इरफ़ान के उस्ताद आयतुल्लाह मोहम्मद अली शाहाबादी) ने क़ुर्आन कहा है, कि जिस तरह से क़ुर्आन आसमान से ज़मीन की तरफ़ नाज़िल हुआ यह दुआएं ज़मीन से आसमान की तरफ़ जाती हैं।
यह दुआएं इंसान को वाक़ई इंसान बनाने के लिए हैं क्योंकि अगर इस इंसान पर लगाम नहीं लगाई जाए तो यह वहशी जानवरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो जाता है, यह दुआएं जिनका कभी कभी मतलब भी हम नहीं समझ पाते यही हमारे हाथों को पकड़ कर मानवियत की बुलंदियों तक ले जाती हैं जिसको हम और आप समझ भी नहीं सकते। (सरीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह., जिल्द 13, पेज 31-32)
इसी तरह अगर कोई इंसान इस मुनाजात में डूब कर उसके मतलब और मफ़हूम को समझे तो ऐसे मक़ाम तक पहुंच जाएगा जिसके बारे में सोच भी नहीं सकता, जैसाकि रिवायतों में है कि सारे इमाम इस मुनाजात को पढ़ते थे जबकि हमारे सारे इमाम उस मक़ाम पर पहले से ही मौजूद हैं जहां तक पहुंचने के बारे में कोई सोंच भी नहीं सकता लेकिन फिर भी वह इस मुनाजात को उसी अंदाज़ में पढ़ते थे जैसे कोई गुनाहगार इंसान पढ़ता हो लेकिन फ़र्क़ इतना है कि आम इंसान अपने गुनाहों को देख कर गिड़गिड़ाता है लेकिन इमाम मासूम अ.स. अल्लाह की अज़मत के सामने ख़ुद को इतना कम समझते हैं कि उसकी बारगाह में आम इंसानों की तरह दुआ करते हैं क्योंकि इमाम अपने हर कमाल और फज़ीलत को अल्लाह का दी हुई ही समझता है, नबी भी ऐसे ही विचार रखते थे क्योंकि उन लोगों के सामने हक़ीक़तें ज़ाहिर हो चुकी थीं हमारे सामने क्योंकि पर्दे पड़े हैं इसलिए हम थोड़ी सी ही नेमत को अपनी जागीर समझते हुए शुक्र तो दूर उसकी इताअत जो अभी तक कर रहे थे वह भी छोड़ देते हैं, नबियों और इमामों की यही दुनिया से दिल न लगाने वाली सिफ़त थी जिसके कारण अल्लाह ने उनको यह मक़ाम दिया कि उनकी निगाहों से वह पर्दे हट गए जो हक़ीक़त को समझने में रुकावट होते हैं। (सहीफ़ए इमाम ख़ुमैनी र.ह. जिल्द 19, पेज 253)
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