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Date of publication : 21/6/2018 19:38
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बक़ी और क़ुद्स पर राजनीति क्यों?

एक यहूदी और मुसलमान के बीच मतभेद हुआ, यहूदी हक़ पर था यहूदी ने कहा पैग़म्बर स.अ. के पास चलते हैं जो फ़ैसला वह करें उसे मान लिया जाएगा लेकिन मुसलमान ने उसकी बात नहीं मानी क्योंकि वह जानता था कि पैग़म्बर स.अ. का फ़ैसला क्या होगा, इसीलिए यहूदी की बात न मान कर यहूदियों के सरदार काब इब्ने अशरफ़ के पास पहुंचा ताकि वह दोनों के बीच फ़ैसला करे क्योंकि उसे रिश्वत दे कर फ़ैसला अपने हक़ में चाहिए था, इधर मुसलमान ने यह चाल चली उधर आयत नाज़िल हुई कि कुछ लोग इस्लाम का दावा तो करते हैं लेकिन ताग़ूत के विरोध की जब बात आती है तो विरोध तो दूर फ़ैसला करने वाला ही उसे बना देते हैं।
विलायत पोर्टल :  सोशल मीडिया पर मेरी तरह आपकी निगाहों से भी इस तरह की पोस्ट गुज़री होंगी कि कहां गए क़ुद्स का प्रोग्राम मनाने वाले? कहां हैं फ़िलिस्तीन की आज़ादी के लिए धरना प्रदर्शन करने वाले? कहां हैं बैतुल मुक़द्दस के लिए जुलूस निकालने वाले? बक़ी वीरान है हमारे चार इमामों की क़ब्रें सुनसान हैं लेकिन न क़ुद्स के लिए जुलूस निकालने वालों की ख़बर है न फ़िलिस्तीन से दोस्ती ज़ाहिर करने वालों का पता है, क्या जन्नतुल बक़ी की अज़मत और मज़लूमियत बैतुल मुक़द्दस से कम है जो आज जन्नतुल बक़ी के इंहेदाम पर वह लोग ख़ामोश हैं जो क़ुद्स क़ुद्स करते घूमते हैं?
कोई शक नहीं बैतुल मुक़द्दस हो या जन्नतुल बक़ी दोनों की अहमियत अपनी अपनी जगह साबित है दोनों की पाकीज़गी अपनी जगह तय है और दोनों ही इस समय ज़ालिमों के क़ब्ज़े में हैं अगर एक हमारा पहला क़िबला है तो दूसरे का संबंध हमारे दिलों के क़िबले से है, न जन्नतुल बक़ी के दर्द और उसकी अहमियत को अनदेखा किया जा सकता है और ना ही बैतुल मुक़द्दस की ऐतिहासिक हैसियत को, एक नबी स.अ. की मेराज की यादगार है तो दूसरी इस्लाम की मेराज की, क्योंकि बक़ी में वह शख़्सियतें दफ़्न हैं जिनकी ज़िंदगी इस्लामी समाज को मेराज तक पहुंचाने में गुज़री है जिनकी तालीमात के चिराग़ों की रौशनी आज भी इंसानियत को बंदगी की मेराज तक पहुंचने की दावत दे रही है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि कुछ टेढ़ी फ़िक्र, शातिर दिमाग़ और आख़ेरत को भुला देने वाले लोगों ने इन दोनों मामलों को इगो का मामला बना दिया है, अजीब बात तो यह है कि क़ुद्स रैली में आगे आगे रहने वाले लोग तो आपको जन्नतुल बक़ी के सिलसिले में होने वाले समारोह में ज़रूर देखने को मिलेंगे लेकिन जन्नतुल बक़ी से संबंधित रैली और जलसा करने वाले क़ुद्स की रैलियों में बहुत कम दिखाई देंगे, इसकी एक छोटी सी मिसाल जो मेरे सामने है वह मुंबई शहर की है जहां क़ुद्स कमेटी और आई.आई.एफ़. की आपसी मदद से क़ुद्स की रैली भी अच्छे से होती है और जन्नतुल बक़ी के इन्हेदाम पर भी समारोह होते रहते हैं, इसके विपरीत जन्नतुल बक़ी के सिलसिले में रैली या जलसा करने वाले अधिकतर क़ुद्स की रैली और उससे संबंधित समारोह से ग़ायब रहते हैं, मैं आम जनता की बात बिल्कुल भी नहीं कर रहा क्योंकि वही तो बेचारे दोनों समारोह की कामयाबी का राज़ हैं, बात तो उन लोगों की है जिनका संबंध उलमा से है या किसी इदारे या ट्रस्ट से जुड़े होने या अपने ख़ानदान और विरासत की वजह से ख़ास लोगों में शामिल हैं,
मेरा सवाल ऐसे ही ख़ास लोगों से है जो दोनों में से किसी एक को दूसरे से अहम बताते हैं और दूसरे प्रोग्राम में जाना भी नहीं पसंद करते आख़िर उनके इस अमल के पीछे क्या राज़ छिपा है, कहीं ऐसा तो नहीं कि जाने अंजाने में किसी एक प्रोग्राम को कमज़ोर कर के वह दुश्मन को मज़बूत कर रहे हैं? इन दोनों में से कोई एक भी चाहे जन्नतुल बक़ी हो या क़ुद्स अगर सियासत का शिकार हो कर अंजाने में दुश्मनों की धोखेबाज़ी के हत्थे चढ़ गए तो आज नहीं तो कल उसका धुआं हमारी आखों में भी जाएगा।
अगर किसी के दिमाग़ में यह ख़्याल है कि जन्नतुल बक़ी की मज़लूमियत और आले सऊद के ज़ुल्म तो मुसलमानों का आपसी मसला है तो वह इमाम ख़ुमैनी र.ह. के इन जुमलों पर ध्यान दे “अगर हम सद्दाम को माफ़ भी कर दें, क़ुद्स को भुला भी दें, अमेरिका की दरिंदगी को अनदेखा भी कर दें फिर भी आले सऊद को कभी नहीं माफ़ करेंगे, इंशा अल्लाह अपने दिलों के ज़ख़्मों की गर्मी को सही समय पर अमेरिका और आले सऊद से बदला ले कर ही ठंडा करेंगे" इसी तरह अगर कोई यह सोंचता है कि क़ुद्स तो अहले सुन्नत का मामला है फ़िलिस्तीन में शिया ही कहां हैं.... तो वह क़ुर्आन की इस आयत का जवाब क्या देंगे जिसमें इरशाद हो रहा है कि और तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह की राह में जंग नहीं करते और कमज़ोरों के लिए नहीं लड़ते जिनके मर्द बच्चे और औरतें फ़रियाद कर रहें हैं कि ऐ मालिक हमें इस बस्ती से निजात दे जो ज़ालिमों का ठिकाना है और हमारे लिए अपने पास से एक वली और मददगार क़रार दे जो हमारी मदद कर सके। (सूरए निसा, आयत 75) क्या बैतुल मुक़द्दस हमारी विरासत नहीं? क्या फ़िलिस्तीन के मज़लूम इस आयत के मिसदाक़ नहीं? क्या इस आयत का हुक्म अब नहीं रहा? क्या क़ुर्आन हमारे अलावा किसी और के लिए बयान कर रहा है? हम में से टेढ़ी सोंच और घटिया मानसिकता वाले कुछ लोग जिस बक़ी को क़ुद्स से टकराने की कोशिश में लगे हैं उसी क़ब्रिस्तान में सोने वाला अहलेबैत अ.स. के घराने का हर शख़्स दुनिया के मज़लूमों और फ़क़ीरों की पनाहगाह रहा है, क्या बक़ी और क़ुद्स को आपस में टकराने से उनकी रूहों को तकलीफ़ नहीं पहुंचती होगी जिन्होंने इंसानी आज़ादी के लिए अपने गले में तौक़ तक पहना लेकिन इंसानियत को ग़ुलामी से बचाने का नुस्ख़ा कर्बला की शक्ल में हमारे हवाले किया और आज हम में से ही कुछ उनके दिए हुए उस आज़ादी के नुस्ख़े से न केवल ग़ाफ़िल हैं बल्कि उसकी ग़लत तफ़सीर बयान कर रहे हैं....
जिस बक़ी के लिए आज हम अज़ादार हैं उसी बक़ी की क़सम बैतुल मुक़द्दस का मामला शिया सुन्नी मामला नहीं बल्कि यह बिल्कुल बक़ी की तरह दबे कुचले लोग और साम्राज्यवाद के बीच जंग का मामला है जिसे क़ुर्आन ने भी अहम जाना है,
जैसाकि एक बार एक यहूदी और मुसलमान के बीच मतभेद हुआ, यहूदी हक़ पर था यहूदी ने कहा पैग़म्बर स.अ. के पास चलते हैं जो फ़ैसला वह करें उसे मान लिया जाएगा लेकिन मुसलमान ने उसकी बात नहीं मानी क्योंकि वह जानता था कि पैग़म्बर स.अ. का फ़ैसला क्या होगा, इसीलिए यहूदी की बात न मान कर यहूदियों के सरदार काब इब्ने अशरफ़ के पास पहुंचा ताकि वह दोनों के बीच फ़ैसला करे क्योंकि उसे रिश्वत दे कर फ़ैसला अपने हक़ में चाहिए था, इधर मुसलमान ने यह चाल चली उधर आयत नाज़िल हुई कि कुछ लोग इस्लाम का दावा तो करते हैं लेकिन ताग़ूत के विरोध की जब बात आती है तो विरोध तो दूर फ़ैसला करने वाला ही उसे बना देते हैं। (सूरए निसा, आयत 60)
इस दास्तान में क़ुर्आन एक मुसलमान के अमल को रद्द करते हुए यहूदी को हक़ पर क़रार दे रहा है, यानी क़ुर्आन का साफ़ ऐलान है कि अगर मुसलमान होते हुए न्याय और इंसाफ़ के रास्ते से हट गए तो सबसे पहले जो तुम्हारे काम का विरोध करेगा वह ख़ुद क़ुर्आन होगा इसके विपरीत अगर कोई यहूदी होते हुए न्याय और इंसाफ़ का ख़्याल करे तो क़ुर्आन उसका समर्थन करेगा, बिल्कुल ऐसे ही जन्नतुल बक़ी और क़ुद्स का मामला है शिया होते हुए भी अगर हम मज़लूमों से ग़ाफ़िल हैं बल्कि ज़ायोनी और साम्राज्यवाद से इंसाफ़ की भीख मांग रहे हैं और बक़ी को क़ुद्स की बर्बादी की वजह बना रहे हैं तो ज़ाहिर है ऐसी हालत में जन्नतुल बक़ी में सोने वाले क़ुर्आन के वारिस हमसे नाराज़ हैं क्योंकि क़ुर्आन से ज़्यादा प्यारा उन्हें और कुछ नहीं, अब अगर उनके अपने मानने वाले क़ुर्आन के विरुध्द अमल करें तो वह कैसे बर्दाश्त करेंगे। आज पूरी लॉबी है जो इसी मिशन पर काम कर रही है कि क़ुद्स को अहले सुन्नत का मामला बना दिया जाए और बक़ी को शियों का बता दिया जाए, लेकिन क्या कहना हमारे उस इमाम अ.स. का जो सर पर गहरा ज़ख़्म होने के बाद भी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों में हमारे हाथ में एक कसौटी दे कर गए और फ़रमाया कि ज़ालिम के दुश्मन और मज़लूम के मददगार बन कर रहो, आपने यह नहीं कहा कि ज़ालिम कौन हो....
यह भी नहीं कहा मज़लूम कौन हो, हमने इमाम अली अ.स. की वसीयत से यही समझा है कि ज़ालिम कोई भी हो उससे संबंध रखना यह अलवी सीरत नहीं और मज़लूम जो भी हो उससे हमदर्दी ज़ाहिर करना अलवी किरदार है। बक़ी के ज़ख़्मों को संभाले आज जन्नतुल बक़ी के इन्हेदाम के मौक़े पर जिस तरह हम दुखी हैं वैसे ही फ़िलिस्तीन की आज़ादी और बैतुल मुक़द्दस से ज़ायोनी क़ब्ज़े के ख़ात्मे के लिए अल्लाह की बारगाह में दुआ करते हैं, ख़ुदाया अब हैदर अ.स. के वारिस को भेज दे क्योंकि दुनिया अंधेरों से भर चुकी है।


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